देश के सबसे बड़े कारोबारी घरानों में शामिल टाटा ग्रुप (TATA Group) के अंदर चल रही खींचतान अब चर्चा का बड़ा विषय बन गई है. टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच मतभेद पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि टाटा ग्रुप भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है और दोनों पक्षों को अपना विवाद जल्द से जल्द आपसी बातचीत से सुलझाना चाहिए. वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि इस तरह के मतभेद सार्वजनिक नहीं होने चाहिए. नेतृत्व को समझदारी दिखाते हुए जल्द सामान्य स्थिति बहाल करनी चाहिए.
टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच विवाद
यह पूरा मामला टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस (TATA Sons) और उसकी सबसे बड़ी शेयरहोल्डर टाटा ट्रस्ट्स (TATA Trusts) के बीच चल रहे मतभेदों से जुड़ा है. टाटा संस की अगुवाई एन चंद्रशेखरन करते हैं, जबकि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा हैं. पिछले कुछ महीनों से दोनों पक्षों के बीच तनाव की खबरें सामने आ रही थीं. 17 सितंबर 2026 को टाटा संस के बोर्ड की बैठक में यह मतभेद खुलकर सामने आ गए. इस बैठक में दो बड़े फैसले लिए गए. पहला, टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का फैसला हुआ और दूसरा, एन चंद्रशेखरन को फिर से कंपनी का चेयरमैन नियुक्त किया गया.
नोएल टाटा ने दोनों फैसलों का किया विरोध
टाटा संस के बोर्ड में हुए मतदान के दौरान नोएल टाटा ने दोनों फैसलों के खिलाफ वोट दिया. वह बैठक में अकेले ऐसे सदस्य थे, जिन्होंने इन फैसलों का विरोध किया. वहीं, टाटा ट्रस्ट्स की ओर से बोर्ड में शामिल दूसरे प्रतिनिधि वेणु श्रीनिवासन ने बहुमत के पक्ष में वोट किया. इससे टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच मतभेद और गहरे होने की चर्चा शुरू हो गई. टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में सबसे बड़ी हिस्सेदारी है, इसलिए दोनों के बीच तालमेल को समूह के भविष्य के लिए अहम माना जा रहा है.
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RBI के फैसले से क्यों बढ़ा मामला?
इस विवाद के पीछे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का एक फैसला भी अहम है. बोर्ड की बैठक से करीब एक सप्ताह पहले RBI ने टाटा संस के उस अनुरोध को खारिज कर दिया था, जिसमें उसने मुख्य निवेश कंपनी (Core Investment Company) के तौर पर अपना रजिस्ट्रेशन खत्म करने की मांग की थी. टाटा संस रिजर्व बैंक के नियमों के तहत अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) के दायरे में आती है. ऐसे में उस पर शेयर बाजार में लिस्टिंग से जुड़े नियम लागू होते हैं. RBI के फैसले के बाद टाटा संस के बोर्ड ने लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया.
डेरियस खंबाटा ने भी उठाए सवाल
टाटा ग्रुप के अंदर चल रहे मतभेदों के बीच सीनियर एडवोकेट डेरियस खंबाटा का मामला भी चर्चा में आया. उन्होंने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट में ट्रस्टी के तौर पर दोबारा नियुक्ति स्वीकार करने से इनकार कर दिया. उन्होंने टाटा संस के बोर्ड की 17 सितंबर को हुई बैठक के तरीके पर भी सवाल उठाए. नोएल टाटा और ट्रस्ट्स के CEO सिद्धार्थ शर्मा को लिखे पत्र में खंबाटा ने कहा कि अगर रतन टाटा जीवित होते, तो क्या बोर्ड इस तरह फैसले लेता? उन्होंने टाटा संस की प्रस्तावित लिस्टिंग का भी विरोध किया. उनके मुताबिक, 17 सितंबर की घटनाओं से टाटा संस की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है और इसका असर पूरे कॉरपोरेट जगत की छवि पर पड़ सकता है.
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वित्त मंत्री ने क्यों जताई टाटा विवाद पर चिंता?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2 नवंबर को एक बिजनेस न्यूजपेपर के कार्यक्रम में इस विवाद पर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि टाटा ग्रुप भारतीय अर्थव्यवस्था का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसलिए दोनों पक्षों को आपस में बैठकर बातचीत करनी चाहिए और जल्द से जल्द विवाद खत्म करना चाहिए. उन्होंने कहा कि इस तरह के मतभेद सार्वजनिक नहीं होने चाहिए. नेतृत्व की परिपक्वता इसी में है कि वह आपसी समझ और कारोबारी सूझबूझ से मामले को सुलझाए. हालांकि, सरकार दोनों पक्षों को बातचीत के लिए बुलाने या इस मामले में दखल देने की कोई कोशिश करेगी या नहीं, इस पर उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. उन्होंने इसे संवेदनशील मामला बताया. वित्त मंत्री ने टाटा ग्रुप को एक वैश्विक ब्रांड बनाने में पारसी समुदाय के योगदान की भी सराहना की. उन्होंने कहा कि समूह का कारोबार कई क्षेत्रों में फैला हुआ है और भारतीय अर्थव्यवस्था में इसकी अहम भूमिका है.
विदेशी निवेश में गिरावट पर भी बोलीं सीतारमण
कार्यक्रम के दौरान वित्त मंत्री ने शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली और देश में पूंजी निवेश को लेकर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि सरकार बाजार से जुड़े लोगों और छोटे निवेशकों की चिंताओं को समझती है. सीतारमण के मुताबिक, साल 2023-24 में टैक्स का ढांचा लगभग ऐसा ही था, जब भारत में विदेशी निवेश का सबसे ज्यादा पैसा आया था. लेकिन अब हालात बदल गए हैं और विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि विदेशी निवेश का पैसा फिर से आना शुरू हुआ है. वित्त मंत्री ने कहा कि भारत की आर्थिक विकास दर को सात फीसदी से ऊपर बनाए रखने के लिए पूंजी और खासकर इक्विटी निवेश की जरूरत है. सरकार बाजार से जुड़े लोगों की चिंताओं पर ध्यान देगी.
आजतक बिजनेस डेस्क