एशियाई शेयर बाजारों में बीते कुछ समय से लगातार उथल-पुथल जारी है और ये आगे भी देखने को मिलती रह सकती है. एचएसबीसी के मुख्य अर्थशास्त्री फ्रेडरिक न्यूमैन ने एशिया के लिए बड़े वित्तीय संकट की चेतावनी दी है, जो ठीक वैसा ही होगा, जैसा 1997 में देखने को मिला था. उन्होंने वर्तमान आर्थिक व्यवस्था और लगभग तीन दशक पहले क्षेत्रीय आर्थिक पतन को जन्म देने वाली परिस्थितियों के बीच समानताएं उजागर की हैं.
अपने नोट में दिग्गज इकोनॉमिस्ट ने अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में तेज उछाल, जापानी करेंसी येन की बेहद कमजोर स्थिति को देखते हुए कहा है कि आज एशियाई बाजारों को संचालित करने वाला वित्तीय परिदृश्य ठीक 1997 के विनाशकारी एशियाई वित्तीय संकट (Asian Financial Crisis) की से मिलता-जुलता है.
AI बन रहा सबसे बड़ा खतरा
बीते 31 अगस्त के एक नोट में एचएसबीसी के चीफ इकोनॉमिस्ट फ्रेडरिक न्यूमैन ने एशियाई बाजारों को लेकर ये बड़ी चेतावनी (Warning For Asian Markets) जारी की है. सीएनबीसी की रिपोर्ट में उनके हवाले से कहा गया कि जैसे-जैसे वैश्विक बाजार चेतावनी के संकेतों का आकलन कर रहे हैं, एशिया के लिए अंतिम खतरा कमजोर बैंकिंग प्रणालियों से हटकर अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई की तरफ अमेरिकी झुकाव पर पूर्ण निर्भरता में बदल गया है.
इस संकट को नजरअंदाज करना मुश्किल
न्यूमैन इस बात पर जोर देते हैं कि ऐतिहासिक समानताओं को नजरअंदाज करना मुश्किल है. 1997 के आर्थिक संकट से पहले अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड अक्टूबर 1993 में लगभग 5% से बढ़कर नवंबर 1994 में लगभग 8% हो गई थी और अप्रैल 1997 तक लगभग 7% के आसपास बनी रही. आज की स्थिति देखें, तो फरवरी से इसमें लगभग 80 बेसिस पॉइंट की वृद्धि हो चुकी है और यह लगभग 4.79% तक पहुंच गई है, जो अगस्त 2020 में देखे गए ऐतिहासिक 0.5% के निचले स्तर से काफी ऊपर है.
करेंसी मार्केट भी कर रहा अलर्ट
इकोनॉमिस्ट के मुताबिक, करेंसी मार्केट में जारी उतार-चढ़ाव एक और चेतावनी का संकेत देते हैं. अप्रैल 1995 और अप्रैल 1997 के बीच, जापानी येन अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 55% गिर गया था और 80 से फिसलकर सीधे 130 पर आ गया था. मौजूदा हालात में Japan Yen जनवरी 2021 में लगभग 103 प्रति डॉलर से गिरकर जुलाई में 163 के निचले स्तर पर आ गया, जिसमें 57% की गिरावट दर्ज की गई है.
'दोनों संकट में विलेन एक जैसे'
फ्रेडरिक न्यूमैन ने इन आंकड़ों को सामने रखते हुए कहा है कि दोनों ही मामलों में संकट का बड़ा कारण एक जैसा दिखा है. दरअसल, जहां 1990 के दशक के मध्य में इंटरनेट का उदय हुआ था, वहीं आज बाजार की गति एआई के बढ़ते प्रभाव पर टिकी नजर आ रही है. इन दोनों स्थितियों के विपरीत होने के बावजूद, न्यूमैन ने जोर दिया कि 1997 और आज के बीच संरचनात्मक अंतर समानताओं से कहीं अधिक हैं.
1990 के दशक में, एशियाई देश पूंजी आयातक थे और घरेलू निवेश के लिए विदेशी बचत पर निर्भर थे, जिससे वे भारी चालू खाता घाटे और कमजोर बैंकिंग व्यवस्थाओं का सामना कर रहे थे. जब उधार लेने की लागत में भारी बढ़ोतरी हुई, तो विदेशी पूंजी रातोंरात देश से निकल गई और इसके बाद थाईलैंड से लेकर दक्षिण कोरिया तक व्यापक स्तर पर बैंक विफल हुए थे. वहीं आज वही अर्थव्यवस्थाएं पूंजी निर्यातक हैं, जिनके पास विशाल विदेशी मुद्रा भंडार है. लेकिन एशिया एक नई कमजोरी का सामना कर रहा है.
दक्षिण कोरिया, जापान, ताइवान और सिंगापुर समेत प्रमुख क्षेत्रीय विनिर्माण केंद्रों में विकास, अमेरिकी प्रौद्योगिकी दिग्गजों द्वारा एआई इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी-भरकम खर्च के साथ ही इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर निर्यात पर काफी हद तक निर्भर हैं. न्यूमैन के मुताबिक, 1990 के दशक की तरह वित्तीय असुरक्षा के बजाय, एशिया को अब डिमांड से जुड़ी असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है.
ऐसे दिखेगा बड़ा असर
रिपोर्ट के मुताबिक, इकोनॉमिस्ट ने कहा है कि अगर अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी और उधारी लागत में वृद्धि के चलते अमेरिकी हाइपरस्केल कंपनियों को डेटा सेंटर पर खर्च कम करना पड़ता है, या येन की अस्थिरता बाजारों को अस्थिर करती है, तो एशिया के एक्सपोर्ट सेंटर्स पर सीधा और तत्काल प्रभाव पड़ सकता है. न्यूमैन का कहना है कि इसका असर बैंकों के ट्रेडिंग फ्लोर पर घबराहट के रूप में नहीं, बल्कि टॉप चिप निर्माताओं के ऑर्डर बुक में चुपचाप, लेकिन तेजी से गिरावट के रूप में सामने आएगा.
आजतक बिजनेस डेस्क