35 साल पहले आज ही के दिन लिया गया था ये ऐतिहासिक फैसला, बदल डाला देश!

साल 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार इतना घट चुका था कि उससे महज दो हफ्तों का ही आयात किया जा सकता था. खासकर कच्चा तेल और जरूरी सामान खरीदने के लिए पैसे खत्म हो रहे थे.

Advertisement
1991 के बजट से देश में आर्थिक बदलाव. (Photo: ITG) 1991 के बजट से देश में आर्थिक बदलाव. (Photo: ITG)

आजतक बिजनेस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 24 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 3:17 PM IST

तारीख 24 जुलाई 1991. यानी आज से 35 साल पहले, भारतीय अर्थव्यवस्था में एक ऐसा ऐतिहासिक मोड़ आया. जिसने भारत की तकदीर बदल दी. दरअसल, आज से ठीक 35 साल पहले तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में संसद में ऐसा दूरदर्शी बजट पेश किया था, जिसने मझधार में फंसी भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहर निकालकर वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर ला खड़ा किया. 

Advertisement

साल 1990-91 के दौरान भारत आर्थिक संकट से जूझ रहा था. विदेशी कर्ज बढ़ता जा रहा था. विदेशी मुद्रा भंडार इतना घट चुका था कि उससे महज दो हफ्तों का ही आयात किया जा सकता था. खासकर कच्चा तेल और जरूरी सामान खरीदने के लिए पैसे खत्म हो रहे थे. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डिफॉल्ट होने का खतरा मंडरा रहा था. ऐसी स्थिति में तत्कालीन सरकार ने लीक से हटकर सख्त, साहसिक और परिवर्तनकारी आर्थिक सुधारों का रास्ता चुनने का फैसला लिया. 

मनमोहन सिंह ने चुना था 'LPG मॉडल'
तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 1991-92 के बजट में उदारीकरण (Liberalisation), निजीकरण (Privatisation) और वैश्वीकरण (Globalisation) यानी 'LPG मॉडल' की मजबूत नींव रखी. 

लाइसेंस-परमिट राज का अंत 
पहले भारत में कोई भी नया कारोबार शुरू करने या दुकान-फैक्ट्री लगाने के लिए सरकार से बहुत सारे लाइसेंस लेने पड़ते थे. सरकार ने इस लालफीताशाही नियमों को खत्म कर दिया. उद्योगों और व्यवसायों को सरकारी परमिट, लालफीताशाही के नियंत्रण से मुक्त किया गया, जिससे देश में व्यापार करना आसान हुआ.

Advertisement

उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में 51% तक विदेशी इक्विटी को स्वचालित मंजूरी दी गई और विदेशी प्रौद्योगिकी समझौतों के रास्ते खोले गए. विदेशी कंपनियों को भारत में पैसा लगाने (FDI) और अपनी दुकानें या फैक्ट्रियां खोलने की छूट दी गई.

अकुशल सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) का पुनर्मूल्यांकन शुरू किया गया और विनिवेश की नीतियों को अपनाया गया. सीमा शुल्क और आयात दरों में भारी कटौती करके भारतीय बाजार को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए खोला दिया गया. 

इसी दौरान 24 जुलाई 1991 के बजट भाषण में डॉ. मनमोहन सिंह ने विक्टर ह्यूगो की लाइन का जिक्र किया था, 'दुनिया में ऐसी कोई ताकत नहीं है, जो उस विचार को रोक सके जिसका समय आ चुका है. भारत का एक प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में उभरना ऐसा ही विचार है.'

1991 में बोए गए आर्थिक सुधारों के बीज ने बीते 35 वर्षों में भारत का आर्थिक तस्वीर पूरी तरह से बदल दी है. उदारीकरण के कारण भारत का सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और सर्विस सेक्टर वैश्विक स्तर पर अपनी धाक जमाने में सफल रहा. 

देश में मोबाइल, कंप्यूटर और आईटी सेक्टर आया, जिससे लाखों युवाओं को अच्छी नौकरियां मिलीं. पहले देश में कार, टीवी या सामान खरीदने के एक-दो ही विकल्प होते थे. लेकिन उदारीकरण के बाद बाजार में ढेरों अंतरराष्ट्रीय विकल्प और ब्रांड आ गए. 

Advertisement

विदेशी मुद्रा भंडार में ऐतिहासिक बढ़ोतरी 
जो विदेशी मुद्रा भंडार कभी महज दो हफ्तों का बचा था, वह आज सैकड़ों अरब डॉलर के सुरक्षित स्तर पर पहुंच चुका है. इन नीतियों ने करोड़ों लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला और देश में एक मजबूत, उपभोक्तावादी मध्यम वर्ग का निर्माण किया. आज जब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है, तो 24 जुलाई 1991 को दिया गया वह बजटीय भाषण का जिक्र हो रहा है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »