Global Oil Crisis: तेल के तीन रास्ते... तीनों बंद, दुनिया में फिर से मचने वाला है कोहराम?

Global Oil Crisis Signal: दुनिया पर फिर बड़ा संकट मंडरा रहा है और इसका असर दिखना भी शुरू हो गया है. तेल के तीन प्रमुख समुद्री रूट्स में रुकावट के चलते कच्चे तेल की कीमतों में आग लगी है. इसमें और बढ़ोतरी से Oil Import पर निर्भर देशों में कोहराम मच सकता है.

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दुनिया में फिर से गहराने लगा तेल संकट. (Photo: AP) दुनिया में फिर से गहराने लगा तेल संकट. (Photo: AP)

आजतक बिजनेस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 14 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 12:44 PM IST

अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते दुनिया की कुल तेल जरूरत का 20% पूरा करने वाला प्रमुख होर्मुज स्ट्रेट पहले से ही बंद है. दूसरी ओर हूती विद्रोही भी ताबड़तोड़ हमलों के साथ बाब अल मंदेब पर कंट्रोल के कगार पर पहुंच चुके हैं, तो वहीं सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर ड्रोन हमलों के लते देश का प्राइमरी बाईपास ऑयल रूट भी बंद हो गया है. इन तीनों जरूरी तेल के रास्तों का बंद होना दुनिया के लिए बुरी खबर है, क्योंकि पहले से रुकावट झेल रहे तेल-गैस की सप्लाई और भी बाधित हो सकती है. रिपोर्ट्स में भी इस बड़े संकट के बारे में अनुमान जाहिए किए जा रहे हैं. 

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सऊदी से नया ग्लोबल संकट
Hormuz Strait-बाब-अल-मंदेब के बाद ताजा अपडेट की बात कें, तो सऊदी अरब की पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन पर ड्रोन हमले के कारण देश का प्राथमिक बाईपास मार्ग बंद हो गया. रॉयटर्स की एक रिपोर्ट देखें, तो इससे दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश Oil Export Reserve खत्म होने से महज 5-7 दिन दूर रह गया है. रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि इस संकट से संभावित रूप से वैश्विक तेल आपूर्ति (Global Oil Supply) का 4% बाधित हो सकता है.

एनर्जी मार्केट के लिए बड़ा झटका
सउदी अरब की ये मुख्य पाइपलाइन लगभग 1,200 किलोमीटर लंबी है, जिसे आपातकालीन स्थिति में बंद करना पड़ा है. ये अरब प्रायद्वीप के पार लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक रोजाना करीब 40 लाख बैरल तेल की आपूर्ति करती है. दुनिया के ऊर्जा बाजारों (Global Energy Markets) के लिए यह एक बड़ा झटका है, जो पहले से ही मिडिल ईस्ट युद्ध के चलते होर्मुज में रुकावट और फिर बाब-अल-मंदेब बंद होने की समस्या से जूझ रहे हैं. 

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बड़ा इशारा कर रहे ये आंकड़े
11 सितंबर को ओपेक (OPEC) को ब्रिटेन की ओर से पेश किए गए ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि तेल उत्पादन में महीने-दर-महीने लगभग 19 लाख बैरल प्रति दिन की भारी गिरावट दर्ज की गई है. ये जुलाई में 81 लाख बैरल प्रति दिन थी. ऑयल प्रोडक्शन में  अचानक आई इस बड़ी गिरावट ने जून में उत्पादन में आई शॉर्ट टर्म बढ़ोतरी को भी खत्म कर दिया है, जब तेल उत्पादन 71 लाख बैरल प्रति दिन रिकॉर्ड किया गया था.

1990 के बाद सबसे बुरा हाल
सऊदी अरब में तेल उत्पादन 1990 के बाद से सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है और ये ग्लोबल टेंशन बढ़ाने वाली खबर है. अगस्त में सऊदी अरब का कच्चा तेल उत्पादन घटकर 62.40 लाख बैरल प्रति दिन हो गया, जो 1990 के बाद से दर्ज किया गया सबसे निचला स्तर है. इसके पीछे बड़ी वजह US-Iran War है, जिसके बढ़ने से पूरे क्षेत्र में प्रमुख ऊर्जा स्रोतों को व्यवस्थित रूप से अवरुद्ध किया जा रहा है. 

इस संकट के बीच यानबू के पास अपनी अनुमानित 3.5 करोड़ बैरल तेल क्षमता में से केवल पांच से सात दिनों का निर्यात स्टॉक बचा ही है. वहीं मिस्र के ऐन सुखना और सिदी केरीर बंदरगाहों पर सऊदी अरब के अतिरिक्त रिजर्व से केवल कुछ अतिरिक्त दिनों का बफर ही उपलब्ध है. हालांकि, अभी रियाद की ओर से नुकसान की पूरी जानकारी शेयर नहीं की गई है और इससे भी ऊर्जा बाजारों में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है.

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दुनिया में मचने वाला है कोहराम!
तेल के तीनों रास्तों में रुकावट का असर अभी से देखने को मिलने लगा है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का सिलसिला जारी है. सोमवार को Brent Crude Price 109 डॉलर प्रति बैरल, WTI Crude Price 103 डॉलर प्रति बैरल, Murban Crude Price 120 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ट्रेड कर रहा था. तो वहीं नेचुरल गैस की कीमतों में भी करीब 2 फीसदी की बढ़ोतरी (Natural Gas Price Hike) देखने को मिली. 

होर्मुज और बाब अल मंदेब के बाद सऊदी अरब के वैकल्पिक मार्ग के अचानक बंद होने का संबंध कच्चे तेल की कीमतों में आई तीव्र वृद्धि से है, जिससे वैश्विक ईंधन लागत रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई है. ये ग्लोबल महंगाई को बढ़ाने वाली है. बता दें कि अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड 2008 के वित्तीय संकट के बाद से अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच चुकी है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी का अनुमान है कि इस साल कुल वैश्विक तेल आपूर्ति में 57 लाख बैरल प्रति दिन की कमी देखने को मिल सकती है. और ये भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत तेल आयात करने वाले तमाम देशों में रणनीतिक तेल भंडार की गंभीर कमी के बीच प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को कमजोर बना सकती है. 

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