पिता का सपना, बेटे का हौसला: 36 महीनों में खड़ा हुआ जामनगर

धीरूभाई अंबानी ने भारत में एक बड़ी रिफाइनरी बनाने का सपना देखा था, जिसे उनके बेटे मुकेश अंबानी ने हकीकत में बदला. गुजरात के जामनगर में बनी रिलायंस की रिफाइनरी महज 36 महीनों में तैयार हुई.

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जब मुकेश अंबानी पिता का सपना पूरा करने स्टैनफ़ोर्ड से लौटे (Photo-ITG) जब मुकेश अंबानी पिता का सपना पूरा करने स्टैनफ़ोर्ड से लौटे (Photo-ITG)

आजतक बिजनेस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 14 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 6:48 PM IST

हर बड़ी इमारत किसी के सपने से शुरू होती है, कभी वह सपना एक इंसान देखता है और उसे पूरा करने का काम दूसरे के हिस्से आता है, रिलायंस की जामनगर रिफ़ाइनरी की कहानी ऐसी ही है. इसमें एक पिता का सपना है और एक बेटे का फ़ैसला, इसमें वह रफ़्तार भी है जिसने देश के औद्योगिक नक़्शे को नए सिरे से लिख दिया.

एक पिता की बड़ी महत्वाकांक्षा
 

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धीरूभाई अंबानी का एक बड़ा सपना था: रिफ़ाइनरी बनाना, यह सपना उनके मन में गहरे बैठा था, पर हर सपना उसी इंसान के हाथों पूरा हो, यह ज़रूरी नहीं होता. कई बार एक पीढ़ी सपना देखती है और अगली पीढ़ी उसे हक़ीक़त बनाती है. धीरूभाई की यह महत्वाकांक्षा आगे चलकर उनके बेटे मुकेश अंबानी की अगुवाई में साकार हुई.

जब मुकेश अंबानी स्टैनफ़ोर्ड से लौटे

इस कहानी में एक बहुत दिलचस्प मोड़ है, मुकेश अंबानी उस समय स्टैनफ़ोर्ड में अपना कोर्स कर रहे थे. पर कोर्स के बीच में ही वे लौट आए. सोचिए, पढ़ाई के बीच में सब कुछ छोड़कर लौटना कितना बड़ा फ़ैसला होता है. यह फ़ैसला उनके लिए आसान रहा होगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता, पर उनके सामने एक बड़ा काम था, पिता के सपने को ज़मीन पर उतारना.

36 महीने: एक रिकॉर्ड
 

और फिर शुरू हुआ जामनगर रिफ़ाइनिंग कॉम्प्लेक्स का निर्माण, इसे रिकॉर्ड समय में, यानी सिर्फ़ 36 महीनों में तैयार किया गया, जब हम किसी बहुत बड़े प्रोजेक्ट के बारे में सोचते हैं, तो अक्सर लगता है कि उसे बनने में बरसों-बरस लगेंगे, पर जामनगर ने रफ़्तार की एक नई मिसाल पेश की, 36 महीने यानी सिर्फ़ तीन साल, इतने कम वक़्त में इतना बड़ा सपना पूरा करना आसान नहीं होता, इसके लिए सिर्फ़ मेहनत नहीं, साफ़ सोच, पक्का इरादा और बड़ी हिम्मत चाहिए.

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भारत की सबसे बड़ी रिफ़ाइनरी
 

जामनगर में बनी यह रिफ़ाइनरी भारत की सबसे बड़ी रिफ़ाइनरी है, इस प्रोजेक्ट को उस औद्योगिक महत्वाकांक्षा की मिसाल माना जाता है जिसे रिलायंस आगे चलकर अपनी पहचान बनाने वाला था.

तीन बातें जो रिलायंस की पहचान बनीं
 

जामनगर की कहानी तीन बातों को सामने रखती है:
लंबी सोच: आज की नहीं, आने वाले कल की सोच.

बड़े पैमाने पर निर्माण: छोटा नहीं, बहुत बड़ा सोचकर काम करना.

ऐसे प्रोजेक्ट हाथ में लेना, जो भारत की औद्योगिक क्षमताओं को नया रूप दें.

ये तीनों बातें रिलायंस के काम करने के तरीक़े में आज भी दिखती हैं.

भारत से दुनिया तक
 

जामनगर तो सिर्फ़ शुरुआत थी, रिलायंस की यात्रा औद्योगिक नींव से आगे बढ़कर डिजिटल और टेक्नोलॉजी की दुनिया तक पहुंची, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉजी और अगली पीढ़ी की क्षमताओं में किए गए निवेश के पीछे एक बड़ा इरादा है, भारत से ऐसे कारोबार खड़े करना जो दुनिया में मुक़ाबला कर सकें.

सवाल यह भी है कि भारतीय उद्यम देश की आर्थिक और तकनीकी आकांक्षाओं में क्या योगदान दे सकते हैं, रिलायंस की यात्रा इसी सवाल का जवाब तलाशती रही है.

सपनों का अगला पड़ाव
पिता के सपने को हक़ीक़त बनाने के बाद रिलायंस के सामने एक नया सवाल था, जब देश की सबसे बड़ी रिफ़ाइनरी बन चुकी है, तो अगला बड़ा सपना क्या होगा? जवाब था: संचार को हर भारतीय के लिए आसान और सस्ता बनाना. इस जवाब का नाम था Jio।

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जामनगर रिफाइनरी के बाद रिलायंस ने एक और बड़ा सपना देखा- इंटरनेट को हर भारतीय तक सस्ता और आसान बनाना. 2016 में Jio की एंट्री ने टेलीकॉम बाजार की तस्वीर कैसे बदली और कैसे डेटा वड़ा पाव के दाम पर मिलने लगा, जानिए इस कहानी के अगले अध्याय में.

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