जन्माष्टमी का त्योहार आता है तो उत्तर भारतीय लोग इसे श्रीकृष्ण की जीवन झांकी के तौर पर देखते हैं. घरों में श्रीकृष्ण की कहानियों और उनकी लीलाओं से जुड़ी घटनाओं-प्रसंगों की मूर्तियां, चित्र वगैरह सजाए जाते हैं. श्रीकृष्ण से जुड़े मंदिरों में भी यही परंपरा देखने को मिलती है, जहां खास तौर पर नवजात शिशु का पालना मुख्य झांकी होती है. इसके अलावा आधी रात को 12 बजे बाल कृष्ण का अभिषेक किया जाना खास तौर पर शामिल होता है.
लेकिन जब इसी त्योहार को साथ लेकर हम भारत की दक्षिणी सिरे को बढ़ते हैं तो परंपराएं बदलती सी नजर आती हैं. वहां यह त्योहार स्थानीय भाषाओं, मंदिर परंपराओं और भक्ति आंदोलनों के साथ मिलकर कई अलग-अलग रूप धारण कर लेता है. कहीं इसे गोकुलाष्टमी, कहीं कृष्णाष्टमी और कहीं रोहिणी अष्टमी भी कहा जाता है.
नई दिल्ली के मयूर विहार में केरल की परंपरा का 'उत्तरागुरुवायुरप्पन मंदिर' है, जहां इस जन्माष्टमी के मौके पर रोहिणी अष्टमी का आयोजन किया जा रहा है. मंदिर से जुड़े सदस्य बताते हैं कि यह नाम उस नक्षत्र (रोहिणी) से आया है, जिसमें श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था.
जन्माष्टमी के मौके पर तमिलनाडु और तेलुगु परंपराओं में घर के दरवाजे से पूजा स्थल तक बाल कृष्ण के छोटे-छोटे पैरों के निशान बनाए जाते हैं. ये ठीक वैसा ही है, जैसा कि उत्तर भारत में दिवाली के दिन कई जगहों पर देवी लक्ष्मी के पैरों के चिह्न बनाए जाते हैं. कर्नाटक के उडुपी में जन्माष्टमी के साथ 'विट्टल पिंडी' की खास परंपरा भी दिखाई देती है.
तमिलनाडुः यहां श्रीजयंती पर जन्म लेते हैं श्रीकृष्ण
तमिलनाडु में जन्माष्टमी को गोकुलाष्टमी या श्री जयंती कहा जाता है. इस मौके पर घर के प्रवेश द्वार से पूजा कक्ष तक चावल के आटे के घोल से छोटे-छोटे पदचिह्न बनाए जाते हैं. भाव यह है कि बाल कृष्ण खुद घर में प्रवेश कर रहे हैं. दरवाजे और आंगन में चावल के आटे से कोलम बनाए जाते हैं. घर में कृष्ण की पूजा होती है, भगवद्गीता का पाठ और भक्ति गीत गाने की परंपरा भी मिलती है. इस अवसर पर मीठे में सीडई, वेरकडलाई, उरुंडई जैसे विशेष पकवान भी तैयार किए जाते हैं.
सीडई चावल के आटे और गुड़ से बनी मिठाई है. वेरकडलाई मूंगफली की चिक्की जैसा होता है और उरुंडई लड्डू को कहते हैं.
तमिलनाडु की कृष्ण भक्ति आलवार संतों की परंपरा से भी निकली है. छठी से नौवीं शताब्दी के आसपास विकसित तमिल वैष्णव भक्ति ने विष्णु और कृष्ण को संस्कृत के धार्मिक संसार से निकालकर तमिल जनजीवन और भक्तिकाव्य का हिस्सा बनाया. पेरियालवार और आंडाल की रचनाओं में बाल कृष्ण और उनके लिए वात्सल्य का भाव मिलता है. यही लंबी वैष्णव परंपरा आगे मंदिरों और घरेलू उत्सवों में कृष्ण भक्ति की मजबूत जमीन बनाती है.
केरल में जन्माष्टमी बनी 'रोहिणी अष्टमी'
केरल में कृष्ण जन्मोत्सव को 'रोहिणी अष्टमी' कहा जाता है. यहां रोहिणी नक्षत्र का विशेष महत्व है. मलयालम कैलेंडर के चिंगम महीने में रोहिणी नक्षत्र से जुड़ा यह उत्सव कृष्ण जन्म के रूप में मनाया जाता है. इस दिन केरल के कई कृष्ण मंदिरों में विशेष पूजा होती है, लेकिन सबसे प्रमुख केंद्र गुरुवायूर है. गुरुवायूरप्पन के रूप में कृष्ण-विष्णु की भक्ति ने केरल में एक विशिष्ट धार्मिक संस्कृति विकसित की. गुरुवायूर के अलावा अंबालप्पुझा श्रीकृष्ण मंदिर जैसे प्राचीन मंदिर भी इस परंपरा के महत्वपूर्ण केंद्र हैं.
अष्टमी रोहिणी के अवसर पर कई स्थानों पर बच्चों को कृष्ण और राधा के रूप में सजाकर शोभायात्राएं निकाली जाती हैं. कृष्ण जीवन की झांकियां, भजन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सत्संग भी आयोजित होते हैं. केरल में 16वीं सदी में मेलपत्तूर नारायण भट्टतिरि ने गुरुवायूर भगवान को संबोधित करते हुए संस्कृत में प्रसिद्ध 'नारायणीयम्' की रचना की. इस तरह भागवत परंपरा और केरल की स्थानीय मंदिर संस्कृति ने मिलकर रोहिणी अष्टमी मलयाली जामा पहनाया है.
कर्नाटक में 'विट्टल पिंडी'
कर्नाटक में जन्माष्टमी पर उडुपी अलग ही रंग में रंगा नजर आता है. उडुपी श्रीकृष्ण मंदिर की परंपरा 13वीं शताब्दी के वैष्णव दार्शनिक माधवाचार्य से जुड़ी है. द्वैत वेदांत और कृष्ण भक्ति की इस परंपरा ने उडुपी को दक्षिण भारत को कृष्ण भक्ति के एक दिलचस्प केंद्र में बदल दिया है. यहां कृष्ण जन्मोत्सव के साथ विट्टल पिंडी विशेष आकर्षण है. उत्सव में कृष्ण की बाल लीलाओं की स्मृति से जुड़ी लोक परंपराएं दिखाई देती हैं. दही-दूध आदि से भरे मटके ऊंचाई पर लटकाने और उन्हें तोड़ने जैसी गतिविधियां उत्तर भारत की दही-हांडी की याद भी दिलाती हैं.
उधर, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी जन्माष्टमी के मौके पर घर में कृष्ण का हिंडोला सजाया जाता है, भजन और श्लोक पढ़े जाते हैं और आधी रात को जन्मोत्सव मनाया जाता है. तेलुगु परंपरा में इस उत्सव को कृष्णुनी पादालु भी कहा जाता है. इसमें भी चावल के आटे से छोटे पैरों के निशान दरवाजे से भीतर की ओर बनाए जाते हैं. इसका प्रतीकात्मक अर्थ है कि कृष्ण जन्म लेकर भक्त के घर आ गए हैं.
दक्षिण भारत की जन्माष्टमी बताती है कि कोई धार्मिक पर्व अलग-अलग भूगोल में पहुंचकर किस तरह स्थानीय संस्कृति का हिस्सा बनता जाता है. यानी कथा वही है, जिसमें श्रीकृष्ण भाद्रपद महीने की अष्टमी की आधी रात को जन्म लेते हैं, लेकिन भाषा, भोजन, भजन और पूजा की परंपरा बदलते ही उत्सव का रूप बदल जाता है, लेकिन इसके मूल में वही नारा वही संदेश छिपा होता है, जिसमें बड़े आनंद-उत्साह से कहा जाता है- 'नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की, हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की'
विकास पोरवाल