जिन परिवारों का रसोई का बजट पहले से ही दबाव में है, उनके लिए चावल अब और महंगा होता जा रहा है. बासमती और गैर-बासमती, दोनों तरह के चावल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है. द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते कई देश अपनी खाद्य जरूरतों को सुरक्षित करने के लिए चावल की ज्यादा खरीद कर रहे हैं, जिससे दुनियाभर में मांग बढ़ गई है.
वहीं, दक्षिण भारत में बारिश कम होने से घरेलू बाजार पर भी दबाव बढ़ा है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में बासमती चावल की कीमत पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 15-20% बढ़ी है, जबकि गैर-बासमती चावल 20-25% महंगा हुआ है. कारोबारियों और निर्यातकों का कहना है कि अक्टूबर-नवंबर में नई फसल आने तक कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं. ऐसे में उपभोक्ताओं को जल्द राहत मिलने की उम्मीद कम है.
खाड़ी देशों में हो रही खरीद
रिपोर्ट्स के मुताबिक खाड़ी देशों से भारत के चावल की बड़ी मात्रा में खरीद हो रही है. बढ़ी हुई मांग का असर बासमती चावल पर भी पड़ा है, जिसका इस्तेमाल बिरयानी जैसी डिश में काफी होता है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में बासमती चावल की कीमत करीब 100 रुपये प्रति किलो पहुंच गई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह करीब 85 रुपये प्रति किलो थी. गैर-बासमती चावल की कीमतों में भी इसी तरह बढ़ोतरी हुई है, जिससे घरों का बजट प्रभावित हो रहा है. सोना मसूरी चावल, जो पिछले साल 51-52 रुपये प्रति किलो था, अब 63-64 रुपये प्रति किलो बिक रहा है. आने वाले समय में कीमतों में जल्द कमी की संभावना नहीं है, क्योंकि बाजार में मांग ज्यादा और नई आपूर्ति सीमित है.
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वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 154 देशों को रिकॉर्ड 65.2 लाख टन बासमती चावल भेजा. सऊदी अरब भारत के चावल का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है, जबकि पश्चिम एशिया से भी लगातार मांग आ रही है. हालांकि, खाड़ी क्षेत्र में भुगतान और शिपिंग से जुड़ी दिक्कतों के कारण चावल की खेप भेजने की रफ्तार कुछ धीमी हुई है. इससे मांग कम नहीं हुई, बल्कि आपूर्ति में देरी के कारण लंबित मांग बढ़ गई है.
घरेलू बाजार पर सरकारी खरीद और असमान बारिश का भी असर पड़ रहा है. राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बीवी कृष्णा राव ने कहा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए सरकार की खरीद से भी चावल की कीमतें बढ़ी हैं. तेलंगाना में राज्य सरकार पीडीएस के जरिए गैर-बासमती चावल उपलब्ध करा रही है. वहीं, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में कम बारिश ने भी कीमतों को ऊंचा बनाए रखा है.
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