
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन लंबे समय से खुद को एक मजबूत और फिट नेता के तौर पर पेश करते रहे हैं. कभी घुड़सवारी, कभी आइस हॉकी और कभी शर्टलेस तस्वीरों के जरिए उन्होंने अपनी ताकतवर छवि बनाई. लेकिन अब सामने आई एक रिपोर्ट बताती है कि पुतिन सिर्फ फिट रहने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उम्र को मात देने और इंसानी जीवन को लंबा करने की वैज्ञानिक कोशिशों में भी गहरी दिलचस्पी रखते हैं.
वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस ने 2024 में "न्यू हेल्थ प्रिजर्वेशन टेक्नोलॉजीज" नाम से करीब 26 अरब डॉलर का राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया है. इसका मकसद ऐसी तकनीकें विकसित करना है जो इंसानों की उम्र बढ़ा सकें और शरीर के खराब हो चुके अंगों को बदलने में मदद करें.

पिछले साल चीन में एक सैन्य परेड के दौरान पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बातचीत ने इस दिशा में उनकी सोच की झलक भी दिखाई थी. पुतिन ने कहा था, "मानव अंगों का लगातार ट्रांसप्लांटेशन किया जा सकता है, जिससे लोग जवान हो सकते हैं और शायद अमर भी." इस पर शी जिनपिंग ने जवाब दिया था कि सदी के अंत तक इंसानों की उम्र 150 साल तक पहुंच सकती है.
क्या रिसर्च कर रहे रूस के साइंटिस्ट?
रूस के इस प्रोजेक्ट में दो प्रमुख तकनीकों पर सबसे ज्यादा काम हो रहा है. पहली है बायोप्रिंटिंग, यानी 3डी प्रिंटर की मदद से जीवित ऊतकों और अंगों का निर्माण. वैज्ञानिकों का दावा है कि वे मानव कार्टिलेज और चूहे की थायरॉयड ग्रंथि जैसी संरचनाएं तैयार कर चुके हैं. दूसरी तकनीक है जीन संशोधित मिनी-पिग्स के अंदर मानव अंग विकसित करना, ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर इन्हें ट्रांसप्लांट किया जा सके.

रूसी सरकार का लक्ष्य 2030 तक मानव अंगों के ट्रांसप्लांटेशन को व्यावहारिक रूप देना है. हाल ही में रूस ने एक नई जीन थेरेपी पर भी काम शुरू किया है, जिसका मकसद कोशिकाओं की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करना है.
रिसर्च प्रोग्राम की देखरेख कर रहीं पुतिन की बेटी
इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम का नेतृत्व दो ऐसे लोग कर रहे हैं जो पुतिन के बेहद करीबी माने जाते हैं. इनमें उनकी बेटी मारिया वोरोंतसोवा शामिल हैं, जो एंडीक्रोनोलॉजिस्ट एंड मेडिकल रिसर्च से जुड़े सरकारी कार्यक्रमों की निगरानी कर रही हैं. दूसरे प्रमुख चेहरे हैं मिखाइल कोवाल्चुक, जिन्हें रूस की दीर्घायु रणनीति का प्रमुख वास्तुकार माना जाता है.
हालांकि इस पूरे प्रोजेक्ट को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं. रूस छोड़ चुके वैज्ञानिक एलेक्जेंडर ओस्त्रोवस्की का कहना है कि अगर इन दावों से जुड़ी वैज्ञानिक रिसर्च और प्रकाशित नतीजे सामने नहीं आते, तो इन्हें उपलब्धि के बजाय सिर्फ महत्वाकांक्षी सपने ही माना जाएगा. उनका आरोप है कि कई वैज्ञानिक फंडिंग हासिल करने के लिए पुतिन को वही बातें बता रहे हैं जो वह सुनना चाहते हैं.