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भारत-अमेरिका डील के बाद रूस को तेल बेचने के लिए उठाना पड़ रहा ये कदम, बढ़ी पुतिन की टेंशन!

ब्लूमबर्ग समेत तेल का डेटा रखने वाली कई फर्म का दावा है कि भारत ने रूसी तेल की खरीद घटा दी है. इस बीच रूस के तेल टैंकर हिंद महासागर में भटक रहे हैं और अब वो सिंगापुर को अपना डेस्टिनेशन दिखा रहे हैं. लेकिन सिंगापुर रूसी तेल खरीदता ही नहीं है. हालांकि, उसके बंदरगाहों का इस्तेमाल तेल के खरीदारों का नाम छिपाने के लिए होता रहा है.

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चीन रूसी तेल की खरीद सतर्कता से बढ़ा रहा है (File Ph
चीन रूसी तेल की खरीद सतर्कता से बढ़ा रहा है (File Ph

अमेरिका के साथ ट्रेड डील के बाद भारत की रिफाइनरियों ने वेनेजुएला से कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी है जिससे रूसी तेल का आयात घटने की खबरें हैं. इससे रूस के पास भरोसमंद ग्राहक का संकट गहरा गया है और अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच चोरी-छिपे निकले तेल से भरे उसके जहाज हिंद महासागर में इधर-उधर भटक रहे हैं. ये टैंकर कहां जा रहे हैं यानी इनके असली डेस्टिनेशन को लेकर जानकारी छिपाई जा रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, कई सारे रूसी तेल टैंकर अपने असली डेस्टिनेशन को छिपाने के लिए फाइनल डेस्टिनेशन के रूप में सिंगापुर को दिखा रहे हैं.

ट्रेडर्स और LSEG (लंदन स्टॉक एक्सचेंज ग्रुप) के शिपिंग डेटा के मुताबिक, रूसी तेल टैंकरों का सिंगापुर को अपना डेस्टिनेशन दिखाना इस बात का संकेत है कि ये तेल भारत के बजाय चीन की तरफ शिफ्ट हो रहा है. हालांकि, पश्चिमी प्रतिबंधों की वजह से चीन भी रूसी तेल को लेकर सतर्क है.

LSEG के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी में करीब 14 लाख मीट्रिक टन रूसी कच्चा तेल लेकर टैंकर सिंगापुर के लिए रवाना हुए. हाल के सालों में सिंगापुर ने इतने बड़े पैमाने पर तेल का ऑर्डर नहीं किया है. प्रतिबंधों के डर से सिंगापुर रूसी तेल का आयात नहीं करता है. लेकिन इसके आसपास के समुद्री इलाकों का इस्तेमाल कभी-कभी शिप-टू-शिप ट्रांसफर के लिए किया जाता है.

खरीदार का नाम छिपाने के लिए हो रहा बड़ा खेल

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रेडर्स का कहना है कि सिंगापुर के आसपास के समुद्री इलाकों से कई जहाज मलेशिया पहुंचते हैं. वहां अपना कार्गो उतारते हैं या तेल को फ्लोटिंग स्टोरेज यूनिट्स में ट्रांसफर कर देते हैं. इस तरह से अंतिम खरीदारों को छिपाने के लिए सिंगापुर को अक्सर एक 'प्लेसहोल्डर' डेस्टिनेशन के तौर पर दिखाया जाता है.

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रूस की राजधानी मॉस्को स्थित एक ऑयल ट्रेडर ने कहा, 'सिंगापुर, स्वेज या पोर्ट सईद जैसी जगहों को डेस्टिनेशन के रूप में दिखाने वाले टैंकरों की संख्या में बढ़ोतरी यह दिखाती है कि रूस को तेल बेचने में दिक्कतें बढ़ रही हैं और भरोसेमंद खरीदारों का दायरा सिमट रहा है.'

चीन भी सावधानी से कर रहा तेल खरीद

अमेरिका के साथ व्यापार समझौते के बाद भारत के रूस से तेल खरीद कम करने की खबरें हैं. हालांकि, भारत ने आधिकारिक रूप से रूस से तेल खरीद बंद करने से इनकार किया है.

चीन रूसी तेल का मुख्य ग्राहक है लेकिन चीन की सरकारी तेल कंपनियां भी प्रतिबंधों के रिस्क के चलते स्पॉट कार्गो खरीदने में सतर्कता बरत रही हैं. इससे रूस के निर्यात के ऑप्शन और कम हो रहे हैं.

ट्रेडर्स के अनुसार, पहले भारत जाने वाले टैंकर अक्सर मिस्र के पोर्ट सईद या स्वेज नहर को अपना डेस्टिनेशन बताते थे. लेकिन अब सिंगापुर जैसी फर्जी डेस्टिनेशन बताने और असली मंजिल छिपाने के ट्रेंड में और बढ़ोतरी आई है.

तेल खरीदने वाली कंपनियां प्रतिबंधों के रिस्क को कम करने के लिए अपना नाम छिपाकर रूसी तेल खरीद रही हैं. रूसी कार्गो पर फाइनल डेस्टिनेशन सिंगापुर, स्वेज या पोर्ट सईद जैसे नाम दर्ज होते हैं जबकि तेल वास्तव में कहीं और उतारा या ट्रांसफर किया जाता है.

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रूस को हो रहा नुकसान?

यूक्रेन से युद्ध के दौरान रूस ने अपना तेल और गैस बेचकर काफी पैसा कमाया और इसी से उसकी अर्थव्यवस्था को सहारा मिला है. युद्ध को अब चार साल होने को हैं और अब रूसी तेल की बिक्री से होने वाली कमाई घटती जा रही है.

यह गिरावट अमेरिका और यूरोपीय संघ के रूसी तेल और गैस पर नए प्रतिबंधों, भारत-अमेरिका की ट्रेड डील और रूसी तेल ढोने वाले टैंकरों पर अमेरिकी प्रतिबंधों का नतीजा है.

राजस्व में कमी के कारण रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को रूसी बैंकों से कर्ज लेना पड़ रहा है और टैक्स बढ़ाने पड़ रहे हैं.

अमेरिकी ब्रॉडकास्टर एबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी में तेल और गैस उद्योग पर टैक्स से रूस की सरकारी आय घटकर 393 अरब रूबल (करीब 5.1 अरब डॉलर) रह गई. यह दिसंबर में 587 अरब रूबल (7.6 अरब डॉलर) और जनवरी 2025 में 1.12 खरब रूबल (14.5 अरब डॉलर) से काफी कम है. 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 21 नवंबर से रूस की दो सबसे बड़ी तेल कंपनियों- रोसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंध लगा दिया था. इसका मतलब है कि जो भी जहाज इन कंपनियों से तेल लेगा या उसकी शिपिंग करेगा,  उसे अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम से बाहर किया जा सकता है. इस वजह से शिपिंग कंपनियां भी रूसी तेल ढोने में सतर्कता बरत रही हैं.

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