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चीन ज्यादा बड़ा खतरा, इसलिए रूस-यूक्रेन की जंग में नहीं कूदा अमेरिका?

रूस और अमेरिका के बीच जारी युद्ध में अमेरिका की भूमिका पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं. लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं कि एक सोची-समझी रणनीति की वजह से अमेरिका इस युद्ध में ज्यादा सक्रिय नहीं हो रहा है.

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राष्ट्रपति जो बाइडेन
राष्ट्रपति जो बाइडेन
स्टोरी हाइलाइट्स
  • रूस की तुलना में चीन की अर्थव्यवस्था 10 गुना बड़ी
  • चीन के पास मौजूद है दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना

रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग में अमेरिका को भी एक विलेन के रूप में देखा जा रहा है. कहा जा रहा है कि अमेरिका की तरफ से सिर्फ बयानबाजी की गई और जमीन पर ना रूस को रोकने के लिए कुछ हुआ और ना ही यूक्रेन को कोई सहायता दी गई. ऐसे में सवाल उठता है कि रूस-यूक्रेन के बीच जारी युद्ध में अमेरिका शांत क्यों पड़ गया है, वो सक्रिय भूमिका निभाने से क्यों बच रहा है?

अब एक्सपर्ट्स के मुताबिक अमेरिका को इस बात का अहसास है कि उसका असल दुश्मन रूस नहीं बल्कि चीन है. वहीं चीन जिससे इस समय उसकी कई मोर्चों पर तनातनी चल रही है. कभी ट्रेड वॉर देखने को मिल जाता है तो कभी हिंद महासागर में भी दोनों का टकराव होता है. इसके अलावा चीन के जो महत्वाकांक्षी सपने हैं, वो अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं. रूस तो सिर्फ यूक्रेन तक हमला कर शांत है, लेकिन चीन दुनिया की महाशक्ति बनना चाहता है. वो अमेरिका को हटा खुद सुपरपॉवर बनना चाहता है. वो वर्ल्ड ऑडर को बदलने की पूरी तैयारी कर रहा है.

इसी वजह से कहा जा रहा है कि अमेरिका, रूस के खिलाफ अपनी ज्यादा ऊर्जा नहीं लगाना चाहता है. ऐसा होने पर चीन उस स्थिति को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सकता है. वैसे अमेरिका की चिंता गलत नहीं है क्योंकि हर मामले में चीन, रूस की तुलना में काफी शक्तिशाली है. बात जब चीन की अर्थव्यवस्था की आती है तो ये रूस की तुलना में 10 गुना ज्यादा बड़ी है, वहीं जब दोनों की सैन्य शक्ति को भी देखा जाता है तो चीन इस मोर्चे पर भी चार गुना ज्यादा खर्च करता है. इस समय चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना मौजूद है और मैन्युफैक्चरिंग का भी वो बड़ा हब बन गया है. ऐसे में अमेरिका किसी भी कीमत पर चीन को आगे निकलने का मौका नहीं दे सकता है.

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एक्सपर्ट ये भी मानते हैं कि अमेरिका ऐसी स्थिति में नहीं है कि वो अभी रूस से युद्ध कर सके या फिर उसके खिलाफ किसी तरह की सैन्य कार्रवाई करे. यही कारण है कि अमेरिका इस बार खुद को सिर्फ 'निंदा करने' और 'प्रतिबंध' लगाने तक सीमित रख रहा है.     

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