पाकिस्तान की राजनीति में सेना की भूमिका को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फजल) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को सीधी चुनौती देते हुए कहा, "अगर राजनीति करनी है तो वर्दी उतारकर चुनाव मैदान में आइए. तब पता चल जाएगा कि वर्दी वालों को कितने वोट मिलते हैं." उनके इस बयान को पाकिस्तान की सेना के राजनीतिक प्रभाव पर अब तक की सबसे खुली चुनौती माना जा रहा है.
मौलाना फजलुर रहमान का जन्म 19 जून 1953 को डेरा इस्माइल खान में हुआ था. वह मशहूर देवबंदी धर्मगुरु और पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती महमूद के बेटे हैं. पिता की मौत के बाद 1980 में उन्होंने जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम की कमान संभाली. बाद में पार्टी दो हिस्सों में बंट गई और उन्होंने जेयूआई-एफ का नेतृत्व किया. वह 1988 में पहली बार पाकिस्तान की संसद के लिए चुने गए और इसके बाद कई बार सांसद बने.
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फजलुर रहमान को लंबे समय से अफगान तालिबान का समर्थक माना जाता है. उनकी पार्टी के कई मदरसों से तालिबान के नेताओं ने शिक्षा हासिल की. उन्होंने 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले का विरोध किया और तालिबान के समर्थन में कई रैलियां निकालीं. 2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद भी उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अफगान सरकार को मान्यता देने की मांग की और कई बार तालिबान नेतृत्व से मुलाकात की.
हालांकि, वह पाकिस्तान में शरिया कानून लागू करने के पक्षधर रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि हथियारों के बल पर शरिया लागू करना इस्लाम के खिलाफ है. इसी वजह से वह कई बार तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की बजाय बातचीत की वकालत भी करते रहे हैं.
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दिलचस्प बात यह है कि मौलाना फजलुर रहमान कभी उन नेताओं में शामिल थे जिन्होंने 2022 में इमरान खान सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई. उसी राजनीतिक बदलाव के बाद आसिम मुनीर पाकिस्तान के सेना प्रमुख बने. लेकिन समय के साथ दोनों के रिश्ते बिगड़ गए. अब फजलुर रहमान सेना पर राजनीति में दखल देने, बलूचिस्तान में हालात बिगाड़ने और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप लगा रहे हैं.
मौलाना का यह बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान पहले से ही राजनीतिक अस्थिरता, बलोचिस्तान में बढ़ते विद्रोह और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है. ऐसे में सेना और एक प्रभावशाली इस्लामी नेता के बीच बढ़ता टकराव पाकिस्तान की राजनीति में नए समीकरण पैदा कर सकता है.