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'नमाज पढ़ रहे थे तभी हुआ धमाका, जलते दोस्तों को बचा नहीं सके...', काबुल में पाकिस्तानी क्रूरता की कहानी

रमजान के महीने में अफगानिस्तान के एक अस्पताल पर हुआ ये पाकिस्तानी हमला हैवानियत की हद है. कई लोग नमाज पढ़ रहे थे तभी बम आकर गिरा, तो कुछ ने अपने दोस्तों को आग के गोले में जलते देखा. अफगानिस्तान अपने रफ्तार से अपने संसाधनों के जरिये अस्पताल से मलबा हटा रहा है, लेकिन यहां कुछ आंखें अभी भी उम्मीद में हैं कि अंदर कोई जीवित हो सकता है.

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काबुल में अस्पताल के पास परिजनों को खोजती एक बच्ची और एक महिला. (Photo: AP)
काबुल में अस्पताल के पास परिजनों को खोजती एक बच्ची और एक महिला. (Photo: AP)

काबुल का ड्रग रिहैबिलिटेशन अस्पताल मलबे में तब्दील हो गया है. लेकिन इसी मलबे में जिंदगी की कुछ उम्मीदें अभी भी बची हैं. जंग, गृह युद्ध, लाचारी और बेबसी से घिरे इस मुल्क में ये अस्पताल आशाओं का टिमटिमाता सितारा था. जहां से इलाज के बाद अक्सर लोग जिंदगी की नई किस्त लेकर निकलते थे. सेहतमंद होकर. लेकिन रमजान के महीने में एक कमजोर पड़ोसी पर पाकिस्तान बेदर्दी से टूट पड़ा.

पाकिस्तान के इस हमले में अबतक 400 लोगों की मौत हो गई है जबकि 250 लोग जख्मी है. यह अस्पताल उन युवाओं का आशियाना था जो नशे की गिरफ्त से बाहर निकलकर नई जिंदगी की शुरुआत करने आए थे. लेकिन एक रात में सब कुछ मलबे में बदल गया. अफगानिस्तान के टोलो न्यूज के अनुसार हवाई हमले में पुनर्वास परिसर के पांच ब्लॉक नष्ट हो गए, जहां 3,000 तक मरीजों का इलाज चल रहा था. 

टोलो न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार हॉस्पिटल के मलबे में अभी दर्जनों लोग दबे हुए हैं. 

अस्पताल के बाहर, धूल और धुएं से घिरे परिजन अभी भी इंतजार कर रहे हैं. उनके आंखों में आंसू है. लेकिन लगता है कि कोई चमत्कार होगा. 

काबुल के वजीर मुहम्मद अकबर खान अस्पताल और इमरजेंसी अस्पताल में अपने प्रियजनों की तलाश में जमा हुए हैं; इनमें से कई लोग अभी भी उन्हें ढूंढ नहीं पाए हैं.

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मंगलवार को घटनास्थल पर काम कर रही बचाव टीम के एक सदस्य अल्लाह मोहम्मद फारूक ने बताया कि सैकड़ों लोग मारे गए हैं.

उन्होंने कहा, "जब हम यहां पहुंचे तो हर कोई मलबे के नीचे दबा हुआ था." "फिर हमने उन्हें बाहर निकालने के लिए क्रेन का इस्तेमाल किया. ज़्यादातर लोग मर चुके थे और कई अभी भी मलबे के नीचे फंसे हुए हैं."

घटनास्थल के बाहर बैठे एक व्यक्ति की आंखों में आंसू आ गए. इस शख्स ने कहा, "हमें कोई जानकारी नहीं है कि कौन ज़िंदा है और कौन मलबे के नीचे दबा हुआ है." "सिर्फ अल्लाह जानता है कि कौन बच पाया होगा और कौन घायल हुआ होगा. अब तक हमें कोई भी ख़बर नहीं मिली है."

काबुल में अस्पताल की आग बुझाते रेस्क्यू वर्कर (Photo: AP)

फोरेंसिक मेडिसिन विभाग के प्रमुख, नजीबुल्लाह फारूकी ने बताया कि हमले के बाद अब तक 98 शव विभाग में लाए गए हैं, जिनमें से अधिकांश की पहचान कर ली गई है.

उन्होंने आगे कहा कि शवों को वापस हमले वाली जगह पर ले जाया जाएगा और फिर उनके परिवारों को सौंप दिया जाएगा.

कुछ शवों को घटना के बाद पिछली रात ही उनके परिवार के सदस्य अपने साथ ले गए थे.

अफगान के डिप्टी होम मिनिस्टर नबी ओमारी ने कहा कि पाकिस्तान को "अफगानों को मारने का एक प्रोजेक्ट मिला है." उन्होंने आगे कहा कि अफ़गान सरकार में इन हमलों का जवाब देने और अपने लोगों की रक्षा करने की क्षमता है. 

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नबी ओमारी ने पीड़ितों के परिवारों से अपील की है कि वे मृतकों को एक ही कब्रिस्तान में दफनाएं, ताकि यह उस चीज का एक स्थायी प्रतीक बन सके. इसे उन्होंने "एक इस्लामी देश की क्रूरता" बताया है. 

पाकिस्तान का इनकार

इस्लामाबाद में सूचना मंत्री अत्ताउल्लाह तरार ने अफगानिस्तान के उन आरोपों को खारिज कर दिया कि उसके हवाई हमले में किसी अस्पताल को निशाना बनाया गया था. 

तरार ने एक बयान में कहा कि "अफगान तालिबान शासन एक और झूठ फैला रहा है," और पाकिस्तान ने केवल सैन्य और आतंकी ठिकानों को ही निशाना बनाया था. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने उन ठिकानों को निशाना बनाया था जिनका "प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान के अंदर आतंकवादी हमलों की योजना बनाने, उन्हें सुविधा देने, पनाह देने, प्रशिक्षण देने या उनमें मदद करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था."

...जैसे कयामत आ गई हो

न्यूज एजेंसी रायटर्स ने गवाहों के हवाले बताया है कि उन्होंने तीन बम धमाकों की आवाज सुनी, ठीक उसी समय जब सेंटर में मौजूद लोग अपनी शाम की नमाज पूरी कर रहे थे. और उनमें से दो बम कमरों और मरीजों के एरिया में आकर गिरे. 

"पूरी जगह में आग लग गई. ऐसा लग रहा था जैसे कयामत आ गई हो," 50 साल के अहमद ने कहा. उन्होंने बताया कि वे उस सेंटर में अपना इलाज करवा रहे थे और उन्होंने अपना सिर्फ़ पहला नाम बताया. "मेरे दोस्त आग में जल रहे थे और हम उन सभी को नहीं बचा पाए."

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अफगानिस्तान में ये रमजान की 28वीं रात थी. यहां सुकून की दुआएं मांगी जा रही थी लेकिन पाकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय मर्यादाओं को तार-तार करते हुए 400 लोगों को मौत की नींद सुला दी. 

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