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'खामेनेई से भी कट्टर...', मोजतबा के सुप्रीम लीडर बनने पर बोले एक्सपर्ट- उल्टा न पड़ जाए ईरान का दांव

ईरान की सत्ता में बड़ा बदलाव हो गया है. अली खामेनेई की मौत के बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर बना दिया गया है. विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला अमेरिका से समझौते नहीं, बल्कि टकराव की राह चुनने का संकेत है. माना जा रहा है कि इससे मिडिल ईस्ट में जारी जंग और तेज हो सकती है.

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मोजतबा खामेनेई पर अमेरिका ने 2019 में बैन भी लगाया था (फाइल फोटो)
मोजतबा खामेनेई पर अमेरिका ने 2019 में बैन भी लगाया था (फाइल फोटो)

ईरान के मौजूदा नेतृत्व ने अली खामेनेई के उत्तराधिकारी के रूप में मोजतबा खामेनेई की नियुक्ति कर दी है. मोजतबा को सुप्रीम लीडर बनाने का दांव साफ तौर पर बताता है कि ईरान ने अमेरिका के साथ समझौते के बजाय टकराव का रास्ता चुना है.

बता दें कि ईरान में सर्वोच्च नेता के पास विदेश नीति और देश के परमाणु कार्यक्रम सहित सभी मामलों में सर्वोच्च अधिकार होता है, साथ ही वह निर्वाचित राष्ट्रपति और संसद का मार्गदर्शन भी करता है. मतलब राष्ट्रपति से ज्यादा शक्तियां सुप्रीम लीडर के पास हैं.

ईरान के फैसले को एक्सपर्ट डोनाल्ड ट्रंप के लिए झटका मान रहे हैं. क्योंकि उन्होंने मोजतबा को 'कमजोर नेता' बताते हुए खारिज कर दिया था. इसके अलावा ट्रंप चाहते थे कि सुप्रीम लीडर चुनने में उनकी राय भी शामिल हो.

बता दें कि जंग की शुरुआत में अमेरिका और इजरायल के हमले में सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई थी.

अब ईरान द्वारा मोजतबा को उनके उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्त करने से तेहरान में कट्टरपंथियों का नियंत्रण मजबूत हो गया है. यह एक ऐसा दांव है जो अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान के युद्ध को नया रूप दे सकता है और मिडिल ईस्ट से कहीं आगे तक इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं.

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'अमेरिका के लिए ये बेइज्जती जैसा'

मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो एलेक्स वटांका ने कहा, 'इस पैमाने पर अभियान चलाना, इतना जोखिम उठाना और अंत में 86 वर्षीय व्यक्ति को मार डालना, और फिर उसकी जगह उसके कट्टरपंथी बेटे को नियुक्त करना, संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए एक बड़ा अपमान है.'

विश्लेषकों का कहना है कि मोजतबा का चुनाव, जो एक कट्टरपंथी मौलवी हैं और जिनकी पत्नी, मां और परिवार के अन्य सदस्य भी अमेरिकी-इजरायली हमलों में मारे गए थे, एक साफ संदेश देता है. मतलब, कोई समझौता नहीं, बस बदला.

रॉयटर्स की खबर के मुताबिक, मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो पॉल सलेम ने कहा कि मोजतबा के नेतृत्व में ईरान के कठिन दिन आने वाले हैं. क्योंकि मोजतबा ऐसी शख्सियत नहीं जो अमेरिका के साथ कोई समझौता कर सकें या कूटनीतिक रूप से अपनी रणनीति बदल सकें. उन्होंने कहा कि मोजतबा को चुनना आक्रामक रुख है, जो कि आक्रामक वक्त में लिया गया है.

पूर्व अमेरिकी राजनयिक और ईरान विशेषज्ञ एलन आयर ने कहा, 'मोजतबा अपने पिता से भी ज्यादा क्रूर और कट्टरपंथी हैं. वह गार्ड्स (IRGC) के पसंदीदा उम्मीदवार थे.'

56 वर्षीय धर्मगुरु मोजतबा पश्चिम के साथ संबंध स्थापित करने की वकालत करने वाले सुधारवादी समूहों का विरोध करते रहे हैं. विश्लेषकों का तो ये भी कहना है कि खामेनेई के रहते मोजतबा ने 'मिनी-सर्वोच्च नेता' के रूप में काम किया.

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मोजतबा ने शिया धर्म से जुड़ी शिक्षा के केंद्र कोम के मदरसों में रूढ़िवादी मौलवियों के पास रहकर पढ़ाई की है. उन्हें हुज्जतुल इस्लाम (Hujjat al-Islam) शिया इस्लाम में एक उच्च-स्तरीय धार्मिक उपाधि मिली हुई है.

अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने 2019 में मोजतबा पर प्रतिबंध लगा दिया था. अमेरिका का आरोप था कि मोजतबा खामेनेई किसी चुने हुए या औपचारिक सरकारी पद पर नहीं होने के बावजूद अपने पिता के प्रतिनिधि की तरह काम करते हैं और सत्ता के फैसलों पर असर डालते हैं.

बता दें कि ईरान एक जर्जर अर्थव्यवस्था, बढ़ती मुद्रास्फीति, मुद्रा के पतन और बढ़ती गरीबी से जूझ रहा था, साथ ही दमनकारी नीतियों में भी सख्ती बरती जा रही थी जिसने जनता के गुस्से और विरोध प्रदर्शनों को हवा दी थी. आगे मोजतबा के पास कठोर रुख अपनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा. भले ही युद्ध समाप्त हो जाए.

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