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...तो ईरान छेड़ देगा वर्ल्ड वॉर? ट्रंप की धमकियों के बीच IRGC की डराने वाली वॉर्निंग

अमेरिका और इजरायल की नई सैन्य कार्रवाई की चर्चाओं के बीच ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने बेहद कड़ी चेतावनी दी है. IRGC ने कहा है कि अगर ईरान पर फिर हमला हुआ तो जंग सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगी.

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IRGC ने चेतावनी दी है कि इस बार जंग क्षेत्र से बाहर जाएगी. (File Photo)
IRGC ने चेतावनी दी है कि इस बार जंग क्षेत्र से बाहर जाएगी. (File Photo)

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने एक बार फिर दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई धमकियों और इजरायल में ईरान पर फिर से हमले की मांगों के बीच ईरान की ताकतवर सेना इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC ने बेहद सख्त चेतावनी जारी की है.

IRGC ने अपने आधिकारिक प्लेटफॉर्म सेपाह न्यूज पर जारी बयान में कहा कि अगर ईरान के खिलाफ दोबारा हमला किया गया, तो "वादा की गई क्षेत्रीय जंग" अब मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इससे कहीं आगे फैल जाएगी. गार्ड्स ने चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान के "विनाशकारी हमले" दुश्मनों को कुचल देंगे.

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यह बयान ऐसे समय आया है जब तीन महीने पहले शुरू हुए अमेरिका-इजरायल और ईरान संघर्ष के बाद हालात अब भी बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं. फरवरी 2026 में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के परमाणु ठिकानों, सैन्य ठिकानों और शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाकर बड़े हवाई हमले किए थे. इसके जवाब में ईरान ने इजरायल पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिसके बाद पूरा पश्चिम एशिया युद्ध की आग में झुलस गया.

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सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन, कुवैत और जॉर्डन तक में हमले

इस संघर्ष का असर सिर्फ ईरान और इजरायल तक सीमित नहीं रहा. इजरायल ने दक्षिणी लेबनान में हिज्बुल्लाह़ के खिलाफ बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया, जबकि ईरान समर्थित गुटों ने सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन, कुवैत और जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों और ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाया. हाल ही में यूएई के एक न्यूक्लियर प्लांट पर ड्रोन हमला भी हुआ था, जिसने वैश्विक चिंता और बढ़ा दी.

इसी बीच होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी गतिरोध बना हुआ है. अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों और तेल व्यापार पर ब्लॉकेड लगा रखा है, जबकि ईरान भी इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर अपनी पकड़ बनाए हुए है. दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है. ऐसे में किसी भी बड़े टकराव का असर सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है.

ईरान अपनी रेड लाइन से पीछे हटने को नहीं तैयार

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी अधिकारियों ने साफ कहा है कि उनका मिसाइल कार्यक्रम, परमाणु क्षमताएं और होर्मुज पर नियंत्रण कोई "नीतिगत विकल्प" नहीं, बल्कि इस्लामिक रिपब्लिक की वैचारिक और रणनीतिक पहचान का हिस्सा हैं. ईरान का मानना है कि इन मुद्दों पर झुकना समझौता नहीं बल्कि "सरेंडर" होगा.

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यही वजह है कि लगातार सैन्य दबाव और आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद तेहरान अपनी रेड लाइन से पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा. अमेरिका और इजरायल में अब फिर से सैन्य कार्रवाई की मांगें उठ रही हैं. कुछ अधिकारियों का मानना है कि ज्यादा दबाव डालकर ईरान को बातचीत की मेज पर मजबूर किया जा सकता है.

हालांकि, पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई कई दौर की अप्रत्यक्ष वार्ताओं के बावजूद अब तक कोई बड़ा समाधान नहीं निकल पाया है. दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं. इसी कारण दुनिया भर के रणनीतिक विशेषज्ञों को डर है कि अगर वॉशिंगटन या तेहरान की तरफ से कोई गलत कदम उठा, तो यह संघर्ष एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध या उससे भी व्यापक टकराव में बदल सकता है.

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