ईरान के साथ इस टकराव के इस दौर में बढ़त ईरान के पक्ष में जाती दिख रही है. शनिवार को डोनॉल्ड ट्रंप ने 48 घंटे के भीतर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने की चेतावनी देते हुए ईरान के पावर प्लांट्स को 'तबाह' करने की धमकी दी थी, लेकिन उन्होंने इसकी हमले की टाइम लिमिट खत्म होने से पहले ही अपना रुख नरम कर लिया.
उन्होंने पांच दिन के लिए हमलों को टाल दिया और दावा किया कि अमेरिका और ईरान के बीच 'पूरी तरह से संघर्ष समाप्त करने' को लेकर बातचीत हुई है. हालांकि, ईरान ने ऐसी किसी भी बातचीत से इनकार किया. इससे पहले तेहरान ने चेतावनी दी थी कि वह जवाबी कार्रवाई करते हुए खाड़ी क्षेत्र में अहम ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाएगा, जिससे वैश्विक तेल कीमतें और बढ़ सकती थीं और शेयर बाजार गिर सकते थे.
ईरान के इनकार के बावजूद ट्रंप पीछे हटते नहीं दिखे. वे इस युद्ध को जल्द खत्म करना चाहते हैं, इससे पहले कि यह अमेरिका और उनके लिए बड़ी राजनीतिक परेशानी बन जाए. सोमवार को उन्होंने दावा किया कि बातचीत में '15 बिंदुओं' पर सहमति बनी है, जिनमें ईरान से यूरेनियम इनरिचमेंट रोकने और अपने यूरेनियम भंडार खत्म करने की मांग शामिल है, जिन्हें ईरान पहले ही खारिज कर चुका है.
बताया जा रहा है कि इजराइल भी इस प्रक्रिया में शामिल है, हालांकि उसके हमले जारी हैं. अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ और उनके दामाद जेरेड कुशनर ने ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद गालिबॉफ से संपर्क किया था. गालिबाफ ने इसे खारिज करते हुए कहा कि यह अमेरिका की 'बाजार को प्रभावित करने' और 'फंसी हुई स्थिति से निकलने' की कोशिश है.

पाकिस्तान की भूमिका
अगर ट्रंप के दावे को सही माना जाए, तो इन बातचीतों में पाकिस्तान की भूमिका भी सामने आती है, जो इस हफ्ते दोनों पक्षों की बैठक की मेजबानी कर सकता है. पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के नेताओं से बातचीत की है. हालांकि, पाकिस्तान और ईरान के संबंध बहुत भरोसेमंद नहीं माने जाते. हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच तनाव और सैन्य टकराव भी देखने को मिला है, जिससे तेहरान के लिए इस्लामाबाद को मध्यस्थ के रूप में स्वीकार करना आसान नहीं होगा.
ट्रंप क्यों चाहते हैं बाहर निकलना
ट्रंप इस युद्ध में बिना स्पष्ट रणनीति के शामिल हुए. शुरुआत में उन्होंने न तो स्पष्ट लक्ष्य तय किए और न ही बाहर निकलने की योजना बनाई. वे शायद वेनेजुएला की तरह सफलता दोहराना चाहते थे, लेकिन ईरान उससे कहीं बड़ा और अलग देश है.
ईरान ने अपेक्षा से ज्यादा मजबूती दिखाई है. लगातार हमलों और नेतृत्व को निशाना बनाए जाने के बावजूद, वह न सिर्फ टिका हुआ है बल्कि जवाबी हमले भी कर रहा है और संघर्ष को सीमाओं से बाहर तक ले जा रहा है.
आर्थिक असर
'होर्मुज़ को प्रेशर क्रिएट करने के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल करने ईरान की रणनीति ने ट्रंप प्रशासन के समीकरणों को बिगाड़ दिया है. युद्ध शुरू होने के बाद से तेल और गैस की कीमतों में 50% से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक, यह संकट 1973 और 1979 के तेल संकटों से भी गंभीर हो सकता है. इस युद्ध का असर खाद्य आपूर्ति पर भी पड़ा है. खाड़ी क्षेत्र में बनने वाली खाद का बड़ा हिस्सा प्रभावित हुआ है, जिससे दुनिया भर के किसानों, खासकर अमेरिका में, चिंता बढ़ गई है.
घरेलू राजनीति पर असर
अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें तीन साल के हाई लेवल पर पहुंच गई हैं, जो ट्रंप के लिए राजनीतिक नुकसान का कारण बन रही हैं. पहले से ही इस युद्ध को लेकर अमेरिकी जनता में समर्थन कम था, और अब उनके अपने समर्थकों में भी विरोध बढ़ रहा है.
'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' (MAGA) खेमे में भी मतभेद सामने आए हैं. कुछ बड़े नाम, जैसे टकर कार्लसन और मार्जोरी टेलर ग्रीन ने इस युद्ध का विरोध किया है. उनका कहना है कि यह ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के खिलाफ है और इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के प्रभाव में लिया गया फैसला है.
ईरान क्यों हिचक रहा है?
ईरान की हिचकिचाहट की वजह उसका पिछला अनुभव है. ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में परमाणु समझौते से बाहर निकलने के बाद बातचीत के दौरान भी हमले किए थे. हाल ही में इस्फहॉन में गैस से जुड़े ठिकानों पर हमलों के आरोप भी लगे हैं, जिससे भरोसे का संकट और गहरा गया है.
जमीनी हमले की आशंका
ईरान को शक है कि ट्रंप समय ले रहे हैं ताकि जमीनी हमला तैयार किया जा सके. अमेरिका ने हजारों सैनिक खाड़ी क्षेत्र में भेजे हैं और ईरान के तेल निर्यात के अहम केंद्र खार्ग द्वीप पर कब्जे की चर्चा भी हुई है. एक्सपर्ट की मानें तो जमीनी हमला अमेरिका के लिए बेहद महंगा साबित हो सकता है. ईरान आसानी से हार नहीं मानेगा और लंबे समय तक संघर्ष जारी रह सकता है.
ट्रंप इस युद्ध को जल्द खत्म करना चाहते हैं, लेकिन ईरान फिलहाल समझौते के मूड में नहीं दिख रहा. मौजूदा हालात में सिर्फ हमलों से बच जाना ही ईरान के लिए एक तरह की जीत है. ऐसे में इस संघर्ष को खत्म करने के लिए बातचीत जरूरी होगी, लेकिन फिलहाल साफ है कि इस युद्ध ने बातचीत की टेबल पर ईरान की स्थिति को और मजबूत कर दिया है.
(नरेश कौशिक बीबीसी और AP के पूर्व संपादक रह चुके हैं. वह लंदन बेस्ड पत्रकार हैं)