
मध्य पूर्व में जारी युद्ध के बीच एक नया और बेहद खतरनाक खतरा सामने आया है. अमेरिकी और इजरायली हमलों के बीच एक ईरानी सैन्य अधिकारी ने स्थानीय न्यूज एजेंसी से बातचीत में कहा है कि अगर अमेरिका और इजरायल ईरान में "रेजीम चेंज" यानी सत्ता बदलने की कोशिश करते हैं, तो ईरान अपने "आखिरी प्रभावी मिसाइलों" से इजरायल के डिमोना परमाणु रिएक्टर को निशाना बना सकता है.
ईरानी अधिकारी के मुताबिक, पूरे मध्य पूर्व के ऊर्जा ढांचे को भी टारगेट किया जा सकता है. ईरान के इस बयान ने दुनिया भर में चिंता बढ़ा दी है. वजह यह है कि ईरान के पास भले ही परमाणु बम नहीं है, लेकिन अगर डिमोना परमाणु रिएक्टर पर हमला हुआ, तो उसका असर किसी परमाणु बम के हमले से कम नहीं हो सकता.
डिमोना रिएक्टर क्या और कहां है?
इजरायल का परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से दुनिया के लिए रहस्य बना हुआ है. डिमोना में स्थित शिमोन पेरेस नेगेव न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर इजरायल का सबसे संवेदनशील परमाणु ठिकाना माना जाता है. इस परमाणु रिएक्टर का निर्माण 1958 में शुरू हुआ था. उस समय फ्रांस ने गुप्त रूप से इजरायल की मदद की थी.
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जब अमेरिका ने इस निर्माण को लेकर सवाल उठाए, तो इजरायल ने कहा था कि यह एक टेक्सटाइल यानी कपड़ा फैक्ट्री है, लेकिन कुछ सालों बाद इसी न्यूक्लियर साइट में काम करने वाले एक टेक्नीशियन ने इजरायली प्लान का खुलासा कर दिया. इससे साफ हो गया कि वहां परमाणु रिएक्टर बनाया जा रहा था.

1962 से 1964 के बीच यह रिएक्टर सक्रिय हो गया और 1967 तक इजरायल ने अपने पहले परमाणु हथियार तैयार कर लिए थे. हालांकि आज तक इजरायल ने आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार नहीं किया है कि उसके पास परमाणु हथियार हैं. उसकी यह नीति नई नहीं है. इजरायल हमेशा से ऐसा ही करता आया है. वह न तो किसी आरोप को स्वीकार करता है और न ही पूरी तरह से इनकार. लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और विशेषज्ञों का मानना है कि इजरायल दुनिया के उन 9 देशों में शामिल है जिनके पास परमाणु हथियार हैं.
डिमोना न्यूक्लियर साइट पर क्या होता है?
इजरायल की स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो डिमोना रिएक्टर से अब तक लगभग 800 किलोग्राम हथियार-ग्रेड प्लूटोनियम तैयार किया जा चुका है. इसके अलावा छह दशक से जमा हुआ परमाणु कचरा और अन्य रेडियोएक्टिव मटेरियल भी वहां मौजूद हैं.
यह रिएक्टर नेगेव रेगिस्तान में डिमोना शहर से करीब 13 किलोमीटर दूर स्थित है. इसके आसपास का हवाई क्षेत्र पूरी तरह बंद रहता है. यहां तक कि 1967 के युद्ध के दौरान इसी इलाके में उड़ रहे एक अपने ही फाइटर जेट को इजरायल ने गलती से मार गिराया था. डिमोना जॉर्डन की सीमा से लगभग 25 किलोमीटर, मिस्र से 75 किलोमीटर और यरुशलम से करीब 85 किलोमीटर दूर है. यही वजह है कि अगर यहां कोई बड़ी दुर्घटना होती है, तो उसका असर कई देशों तक फैल सकता है.
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जून 2025 में स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) ने अपनी रिपोर्ट में इजरायल को परमाणु हथियार रखने वाले देशों की लिस्ट में शामिल किया था. इस रिपोर्ट के मुताबिक इजरायल के पास 80 से ज्यादा परमाणु वारहेड हो सकते हैं. इनमें से करीब 30 ऐसे ग्रेविटी बम माने जाते हैं जिन्हें F-15 और F-16 लड़ाकू विमानों से गिराया जा सकता है, जबकि लगभग 50 लंबी दूरी की जेरिको-2 बैलिस्टिक मिसाइलें भी माना जाता है कि इजरायल के पास हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इजरायल के पास इतना फिसाइल मटेरियल मौजूद है कि उससे भविष्य में लगभग 200 तक परमाणु वारहेड तैयार किए जा सकते हैं.

अगर डिमोना पर हमला हुआ तो क्या होगा?
अगर कोई मिसाइल डिमोना रिएक्टर को निशाना बनाती है, तो वहां परमाणु बम जैसा धमाका नहीं होगा, लेकिन उससे भी ज्यादा खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है. परमाणु रिएक्टर में मौजूद रेडियोएक्टिव मटेरियल वातावरण में फैल सकते हैं. इससे एक रेडियोएक्टिव बादल बन सकता है, जो हवा के साथ दूर-दूर तक फैल जाएगा और हवा को जहरीला बना देगा.
2008 में आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन ने एक रिसर्च में यह अनुमान लगाया था. इस मॉडल के मुताबिक, अगर डिमोना पर हमला होता है तो रेडियोएक्टिव स्मोक पहले डिमोना शहर और फिर लगभग इजरायल को अपनी जद में ले सकता है. इसके बाद यह इजरायल के तटीय इलाकों तक पहुंच सकता है, जहां करीब 50 लाख लोग रहते हैं.
इस रिसर्च के मुताबिक, करीब 2 लाख लोगों को 30 किलोमीटर के दायरे से तुरंत हटाना पड़ सकता है. लगभग 2500 से 3000 वर्ग किलोमीटर का इलाका लंबे समय के लिए रहने लायक नहीं रह जाएगा. इसका असर सिर्फ इजरायल तक सीमित नहीं रहेगा. जॉर्डन और आसपास के सीमावर्ती इलाकों में भी हजारों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़ सकते हैं.
चेर्नोबिल से भी अलग खतरा
डिमोना से निकलने वाला सबसे खतरनाक तत्व प्लूटोनियम-239 हो सकता है. यह वही मटेरियल है जिसका इस्तेमाल परमाणु हथियारों में किया जाता है. प्लूटोनियम-239 एक ऐसा मटेरियल माना जाता है जिसकी लाइफ हजारों साल होती है. मसलन, अगर डिमोना न्यूक्लियर रिएक्टर पर हमला होता है तो यह सालों तक खतरनाक बना रह सकता है.
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अगर इसके छोटे-छोटे कण इंसान के शरीर में चले जाएं, तो यह फेफड़ों, हड्डियों और लीवर में जमा हो सकते हैं. रिपोर्ट्स की मानें तो यह एक ऐसा मटेरियाल है जो एक बार शरीर में प्रवेश कर जाए तो फिर इसे कभी खत्म नहीं किया जा सकता. इससे कैंसर जैसी गंभीर बीमारी होने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है.

मसलन, 1986 में चेर्नोबिल हादसा एक खराब रिएक्टर डिजाइन का नतीजा था, जिसे कम ट्रेंड लोगों के साथ चलाया गया था. इसके स्मोक धमाके और आग से रिएक्टर कोर का कम से कम 5% रेडियोएक्टिव हिस्सा पर्यावरण में फैल गया था, जिससे यूरोप के कई हिस्सों में आसमानों में रेडियोएक्टिव मटेरियल जमा हो गई थीं. इस हादसे में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी.
ईरान की मिसाइल रणनीति
पिछले कुछ सालों में ईरान ने अपनी मिसाइल रणनीति को काफी विकसित किया है. उसकी रणनीति का एक अहम हिस्सा "सैचुरेशन अटैक" है. इसका मतलब है कि दुश्मन पर एक साथ बड़ी संख्या में मिसाइल और ड्रोन दागी जाए, जिससे एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़े और कुछ मिसाइल पेनेट्रेट करके अपने टारगेट पर जाकर हिट करे. ईरान की नीतियों में इसका मानो प्रमुखता से पालन किया जाता है. अक्सर लड़ाइयों में ईरान की तरफ से एक साथ दर्जनों मिसाइलें दागी जाती हैं.
2024 में ईरान ने इजरायल पर 120 बैलिस्टिक मिसाइल दागीं. उसी साल अक्टूबर में यह संख्या 200 तक पहुंच गई. जून 2025 में 550 मिसाइलें दागने की रिपोर्ट सामने आई. इन हमलों में ईरान पहले ड्रोन भेजता है ताकि दुश्मन के इंटरसेप्टर मिसाइल खत्म हो जाएं. इसके बाद क्रूज मिसाइल और फिर बैलिस्टिक मिसाइलें दागी जाती हैं. इजरायल के एयर डिफेंस सिस्टम मजबूत माने जाते हैं, लेकिन कुछ मिसाइलें फिर भी पेनेट्रेट करने में सफल हो जाती हैं. अक्टूबर 2024 के हमलों में कहा जाता है कि करीब 25 फीसदी मिसाइलें इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था को भेदने में सफल रही थीं.
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ईरान की चेतावनी से क्षेत्रीय देशों की चिंता
डिमोना पर हमले की धमकी ने इजरायल के पड़ोसी देशों को भी चिंता में डाल दिया है. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख ने भी चेतावनी दी है कि यह संघर्ष अब "न्यूक्लियर डाइमेंशन" यानी परमाणु खतरे के स्तर तक पहुंच सकता है.

जॉर्डन और मिस्र दोनों ने इस स्थिति पर आपात बैठकें की हैं. जॉर्डन के लिए यह खतरा बेहद गंभीर है क्योंकि अगर डिमोना से रेडियोएक्टिव लीक हुआ, तो उसका सीधा असर जॉर्डन की खेती और आबादी पर पड़ सकता है. मिस्र ने भी चेतावनी दी है कि अगर यह संघर्ष और बढ़ा, तो लाल सागर और स्वेज कनाल की अंतरराष्ट्रीय समुद्री आवाजाही प्रभावित हो सकती है.
ईरानी की चेतावनी से खाड़ी देशों की चिंता
यूनाइटेड अरब अमीरात, सऊदी अरब और बहरीन जैसे खाड़ी देशों को भी इस युद्ध का सीधा असर झेलना पड़ा है. इन देशों के तेल ठिकानों और डीसैलिनेशन प्लांट पर ड्रोन और मिसाइल हमले हुए हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर डिमोना पर हमला हुआ, तो रेडियोएक्टिव स्मोक सीमाओं को नहीं पहचानेंगे. इसका असर पूरे मध्य पूर्व में महसूस किया जा सकता है.
मसलन, एक्सपर्ट्स यह भी मानते हैं कि ईरान इजरायल के अपने परमाणु ढांचे को ही उसके खिलाफ इस्तेमाल करने की धमकी दे रहा है. यानी बिना परमाणु बम के भी ईरान ऐसा हमला कर सकता है जिससे परमाणु स्तर की तबाही हो सकती है. अगर डिमोना रिएक्टर पर कभी हमला हुआ, तो यह सिर्फ एक सैन्य लक्ष्य नहीं रहेगा. यह ऐसा घाव बन सकता है जिसका असर इजरायल और आसपास के मुल्कों में आने वाले सैकड़ों साल तक रह सकता है.