ईरान युद्ध के चलते वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल है, लेकिन ब्राजील इस संकट से सुरक्षित नजर आ रहा है. इसका कारण देश का दशकों पुराना इथेनॉल आधारित डुअल-फ्यूल सिस्टम है. गन्ने से बनने वाला बायोफ्यूल न सिर्फ सस्ता विकल्प दे रहा है, बल्कि गैसोलीन की कीमतों को भी स्थिर बनाए है.
ब्राजील ने गन्ने से बनने वाले इथेनॉल को सिर्फ एक वैकल्पिक ईंधन नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा रणनीति का मजबूत स्तंभ बना दिया है. यही वजह है कि यहां के लाखों ड्राइवर आज भी 100 प्रतिशत इथेनॉल या फिर 30 प्रतिशत बायोफ्यूल मिले गैसोलीन के बीच आसानी से चुनाव कर सकते हैं.
ब्राजील का 'डुअल-फ्यूल' वाहन बेड़ा अपने प्रभाव के लिहाज से दुनिया में अनोखा माना जाता है. ये ऐसे वाहन हैं, जो इथेनॉल और गैसोलीन के किसी भी मिश्रण पर चल सकते हैं. इस कार्यक्रम की शुरुआत 1975 में सैन्य शासन के दौरान हुई थी, लेकिन लोकतांत्रिक दौर में इसे और मजबूत किया गया.
इसकी वजह से देश की विदेशी तेल पर निर्भरता कम हुई. आज जब ईरान, अमेरिका और इजरायल से जुड़ा संघर्ष अपने पांचवें सप्ताह में पहुंच चुका है, तब भारत और मैक्सिको जैसे देश भी ऊर्जा सुरक्षा के लिए ब्राजील के मॉडल पर गौर कर रहे हैं. वैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं.
इसके बावजूद ब्राजील में इसका असर सीमित रहा है. मार्च महीने में यहां गैसोलीन की कीमतों में महज 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि अमेरिका में यही आंकड़ा 30 प्रतिशत तक पहुंच गया. विशेषज्ञ इस स्थिरता का श्रेय देश के मजबूत और परिपक्व बायोफ्यूल उद्योग को देते हैं.
ब्राजीलियन गन्ना उद्योग संघ के अध्यक्ष इवांड्रो गुसी के मुताबिक, ''ब्राजील अन्य देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में है, क्योंकि उसके पास इथेनॉल के रूप में एक व्यवहारिक विकल्प मौजूद है.'' यह समय ब्राजील के लिए और भी अनुकूल है, क्योंकि अप्रैल में गन्ने की नई फसल की कटाई शुरू होने वाली है.
इससे रिकॉर्ड 30 अरब लीटर इथेनॉल उत्पादन का अनुमान है, जो पिछले साल से 4 अरब लीटर ज्यादा है. गुसी के मुताबिक, यह अतिरिक्त उत्पादन उतना ही है जितना गैसोलीन ब्राजील ने पूरे पिछले साल आयात किया था. हालांकि, ब्राजील कच्चे तेल का बड़ा उत्पादक और निर्यातक है.
उसे परिष्कृत ईंधन के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है. वो अमेरिका, सऊदी अरब, रूस और गुयाना से पेट्रोलियम आयात करता है. इसके बावजूद इथेनॉल ने रोजमर्रा की आवाजाही में अहम भूमिका निभाई है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025 में इथेनॉल की बिक्री 37.1 अरब लीटर रही.
कुल ऊर्जा खपत में भले ही यह डीजल और गैसोलीन से थोड़ा पीछे हो, लेकिन हर पेट्रोल पंप पर इसकी उपलब्धता लोगों को एक आर्थिक और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा देती है. ब्राजील की बायोफ्यूल सफलता की जड़ें साओ पाउलो राज्य में हैं, जो देश का औद्योगिक और कृषि केंद्र है.
यहां हाई-टेक मेगा फार्म से लेकर छोटे पारिवारिक खेतों तक गन्ने का उत्पादन होता है. साल 1958 में स्थापित फार्म बॉम रेटिरो जैसे उदाहरण इस मॉडल की गहराई को दिखाते हैं. इस पूरी व्यवस्था को मजबूती देने में सरकारी शोध संस्थानों की भी बड़ी भूमिका रही है.
कैम्पिनास स्थित यूनिकैम्प विश्वविद्यालय का 'एथेनॉल के लिए विज्ञान विकास केंद्र' इसका उदाहरण है. केंद्र के समन्वयक लुइस कोर्टेज के मुताबिक, ब्राजील के पास उत्पादन, वाहन तकनीक और सरकारी नीति, तीनों स्तर पर लचीलापन है, जो इसे अलग बनाता है.
हालांकि तस्वीर पूरी तरह संतुलित नहीं है. गैसोलीन के मुकाबले डीजल ब्राजील के लिए अब भी चुनौती बना हुआ है. डीजल में बायोफ्यूल का हिस्सा कम है और इसकी बड़ी मात्रा आयात पर निर्भर है. मार्च में ब्राजील में डीजल की कीमतों में 20 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई.
इसको देखते हुए राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने मई तक डीजल आयात पर सब्सिडी देने का प्रस्ताव रखा है. ब्राजील हर महीने अपनी जरूरत का 20 से 30 प्रतिशत डीजल आयात करता है, जिसमें ज्यादातर हिस्सा रूस से आता है. पिछले साल उसने 17 अरब लीटर डीजल आयात किया था.
राष्ट्रपति लूला के लिए डीजल की कीमतों को नियंत्रण में रखना राजनीतिक और आर्थिक दोनों लिहाज से अहम है. ट्रक ड्राइवरों की संभावित हड़ताल और खाद्य महंगाई को रोकने के लिए यह जरूरी माना जा रहा है. इसी बीच, ब्राजील के बायोफ्यूल मॉडल को लेकर अंतरराष्ट्रीय रुचि भी बढ़ रही है.
कई देशों के नेता इस पर चर्चा कर रहे हैं. मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबॉम ने भी पेट्रोब्रास की उस तकनीक में दिलचस्पी दिखाई है, जिससे अगेव पौधे से इथेनॉल तैयार किया जा सकता है. गुसी कहते हैं, ''सबसे अच्छी बात यह है कि इस मॉडल को बड़े पैमाने पर दोहराया जा सकता है.''