
इस्लामाबाद में 21 घंटे चली अमेरिका-ईरान वार्ता भले ही बिना किसी समझौते के खत्म हो गई हो, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के बाद एक नया नैरेटिव सामने आया है. क्या इस बार शांति समझौते की असली जरूरत अमेरिका को है, न कि ईरान को? एक्सपर्ट्स और विश्लेषकों का मानना है कि इस बार हालात उलटे हैं. आमतौर पर जहां अमेरिका दबाव बनाता है और दूसरा पक्ष झुकने की स्थिति में होता है, वहीं इस बार ईरान ज्यादा मजबूत नजर आ रहा है.
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस्लामाबाद में साफ कहा कि "कोई समझौता नहीं हुआ." उन्होंने यह भी कहा कि ईरान ने अमेरिका की शर्तें मानने से इनकार कर दिया. हालांकि उन्होंने पाकिस्तान की भूमिका की तारीफ की, लेकिन उनके चेहरे और शब्दों से निराशा साफ झलक रही थी.
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बातचीत फेल होने के बावजूद विदेश नीति पर नजर रखने वाले माइकल कुगेलमैन ने कहा, "US, घरेलू राजनीतिक कारणों से, एक ऐसी डील चाहता है जिससे वह युद्ध से बाहर निकल सके. इतने सीनियर ग्रुप का पाकिस्तान तक आना US के कमिटमेंट को दिखाता है. वेंस के कमेंट्स के बावजूद, शायद यह अभी खत्म नहीं हुआ है. और बातचीत हो सकती है - लेकिन यह साफ नहीं है कि वे पाकिस्तान में होंगी या कहीं और."

ईरान का आगे की बातचीत पर क्या कहना है?
ईरान की तस्नीम न्यूज एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से कहा कि इस्लामाबाद में चल रही बातचीत के दौरान अमेरिका उन लक्ष्यों को हासिल करना चाहता था, जिन्हें वह जंग के जरिए हासिल नहीं कर सका था, जिसमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी सामग्री हटाने जैसे मुद्दे शामिल हैं, लेकिन ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने इन कोशिशों को नाकाम कर दिया.
तस्नीम न्यूज के मुताबिक, "ईरान ने बातचीत में तर्कसंगत पहल और प्रस्ताव रखे हैं, अब गेंद अमेरिका के पाले में है कि वह इन मुद्दों को नरमी से देखे." साथ ही यह भी कहा गया कि अमेरिका ने जंग की तरह ही बातचीत में भी गलत आकलन किया है और जब तक वॉशिंगटन किसी "उचित समझौते" पर सहमत नहीं होता, तब तक होर्मुज स्ट्रेट के मुद्दे पर कोई बदलाव नहीं होगा. रिपोर्ट की मानें तो "ईरान को कोई जल्दबाजी नहीं है," और फिलहाल अगली बैठक के समय और स्थान को लेकर कोई फैसला नहीं हुआ है.

बातचीत के बारे में ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता बकई ने कहा कि ईरान और US के बीच "कई मुद्दों पर सहमति बन गई है" और "2-3 जरूरी मामलों पर राय में अंतर" था. प्रवक्ता ने यह भी बताया कि बातचीत का यह दौर पिछले साल का सबसे लंबा दौर था, जो कुल 24 या 25 घंटे तक चला.
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकई ने भी साफ किया कि बातचीत में होर्मुज, परमाणु कार्यक्रम, युद्ध की भरपाई, प्रतिबंध हटाने और जंग खत्म करने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि "डिप्लोमेसी कभी खत्म नहीं होती," और कहा, "यह टूल देश के हितों की रक्षा के लिए है, और डिप्लोमैट्स को युद्ध और शांति दोनों समय में अपनी ड्यूटी निभानी चाहिए."
अमेरिका ने ईरान को दिया "फाइनल और बेस्ट ऑफर"
अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जेडी वेंस ने यह संकेत दिया कि अमेरिका ने "फाइनल और बेस्ट ऑफर" टेबल पर रख दिया है. लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब कोई देश "फाइनल ऑफर" की बात करता है, तो इसका मतलब होता है कि वह डील को लेकर ज्यादा उतावला है. इसी पर एक विश्लेषक ने कहा, "अच्छी बात यह है कि बातचीत टूटी नहीं, लेकिन बुरी बात यह है कि कोई ब्रेकथ्रू भी नहीं हुआ."
दरअसल, बातचीत के दौरान करीब पांच राउंड की चर्चा हुई और हर राउंड के बाद दोनों पक्षों ने लिखित प्रस्ताव और जवाब प्रस्तावों की अदला-बदली की. इससे यह साफ है कि एक बड़ा ढांचा बन चुका है, लेकिन उसपर अंतिम सहमति नहीं बन पाई.

एक बड़ा मुद्दा होर्मुज स्ट्रेट बना हुआ है. अमेरिका चाहता है कि यह पूरी तरह खुला रहे और किसी एक देश का नियंत्रण न हो. वहीं ईरान इसे अपने नियंत्रण में रखना चाहता है और इस मुद्दे पर झुकने को तैयार नहीं है. यही वजह है कि एक्सपर्ट्स कह रहे हैं कि ईरान इस समय ज्यादा मजबूत स्थिति में है.
ईरान जल्दबाजी में नहीं, फिलहाल वह ज्यादा मजबूत स्थिति में!
अमेरिकी विदेश विभाग के पूर्व वार्ताकार आरोन डेविड मिलर ने भी कहा, "ईरान के पास ज्यादा ताकत है. वे जल्दबाजी में नहीं हैं. उनके पास संवर्धित यूरेनियम है, उन्होंने अपनी भौगोलिक ताकत को हथियार बना लिया है और वे होर्मुज स्ट्रेट को कंट्रोल कर रहे हैं." उन्होंने आगे कहा, "ईरान ने दिखा दिया है कि वह क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकता है. ये सभी चीजें उसके पास ताकत के रूप में हैं."
यानी जहां अमेरिका जल्द से जल्द डील करके इस जंग से बाहर निकलना चाहता है, वहीं ईरान धीरे-धीरे अपनी शर्तों पर बातचीत आगे बढ़ाना चाहता है.
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मिलर का मानना है, "इस प्रक्रिया की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि दूसरी तरफ कितनी गंभीरता और ईमानदारी है, और क्या वह गैरकानूनी और अत्यधिक मांगों से पीछे हटती है." यह बयान सीधे तौर पर अमेरिका पर दबाव बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

डील हो, न हो अमेरिका जीत चुका है- ट्रंप
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर बातचीत पूरी तरह फेल होती, तो यह बहुत पहले ही टूट जाती. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसका मतलब है कि दोनों पक्ष अभी भी किसी समझौते की उम्मीद छोड़ नहीं रहे हैं. हालांकि, अभी स्थिति "न तो पूरी तरह फेल, न पूरी तरह सफल" वाली है.
इस बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख भी सख्त बना हुआ है. वे पहले ही कह चुके हैं कि "डील हो या न हो, अमेरिका जीत चुका है." लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि घरेलू राजनीति और बढ़ती ऊर्जा कीमतों की वजह से अमेरिका पर डील करने का दबाव है. यही वजह है कि पूरी दुनिया अब इस बात पर नजर रखे हुए है कि आगे क्या होगा.
क्या ईरान अमेरिकी "फाइनल ऑफर" मान लेगा? या फिर अमेरिका अपनी शर्तें नरम करेगा? फिलहाल इतना तय है कि कूटनीति अभी खत्म नहीं हुई है. लेकिन यह भी साफ है कि इस बार बाजी किसके हाथ में है, इस पर बहस तेज हो चुकी है.