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प्रेतों का साया, शाप और पत्थर की मूरत बनी राजकुमारी... प्रंबानन मंदिर की कहानी जहां गए पीएम मोदी

Prambanan Temple Historical Significance
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंडोनेशिया दौरा खासा चर्चा में रहा. इस यात्रा के दौरान समझौतों और राजनीतिक-कूटनीतिक बातचीत के बीच जिस बात ने अलग से अपनी ओर ध्यान खींचा, वह रहा इंडोनेशिया में मौजूद एक प्राचीन देवस्थान, जिसे प्रंबानन मंदिर संकुल या प्रंबानन मंदिर परिसर के नाम से जाना जाता है. तकरीबन 1200 साल पुरानी विरासत को अपने पत्थरों के बीच संजोये हुए इस मंदिर परिसर को मुख्य रूप से 'शिवगृह' यानी शिव का घर माना जाता है.

(Photo- PTI)
 

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इसके नाम का एक अर्थ परम ब्रह्म (पर ब्रह्मन) या परब्रह्म माना जाता है. इसलिए इसे शिवजी के साथ ही भगवान विष्णु और ब्रह्मा से भी जोड़ा जाता है. इसलिए एक मान्यता है कि तीनों देवताओं की एक साथ मौजूदगी के कारण ही इस मंदिर को पंबानन कहा गया है. तमिलनाडु में इसी नाम के अर्थ का मिलता-जुलता मंदिर है, जिसे 'थानुमलायन परब्रह्मन' मंदिर कहा जाता है. यहां थानु का अर्थ विष्णु, मलय का अर्थ शिव और अयन का अर्थ ब्रह्मा है. इसलिए इसे परब्रह्म त्रिमूर्ति मंदिर भी कहा जाता है. (Photo- PTI)
 

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खैर... इंडोनेशिया के प्रंबानन मंदिर पर लौटते हैं, जहां पीएम मोदी ने दौरा किया और इस मंदिर के जीर्णोद्धार की औपचारिक शुरुआत की घोषणा की गई. यह मंदिर अपनी परंपराओं, मूर्ति कलाओं और मंदिर के स्थापत्य के कारण बड़ी आसानी से भारतीयता के साथ जुड़ जाता है. मुख्य परिसर में 224 मंदिरों का समूह है, जिनमें भारतीय पौराणिक देवी-देवताओं से मिलती-जुलती आकृति और नाम वाली प्रतिमाएं शामिल हैं. (Photo- PTI)
 

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इस मंदिर परिसर से ही तकरीबन 800 मीटर दूर उत्तर दिशा की सीधी रेखा में एक और मंदिर परिसर है, जिसे 'कांदी सेवु' कहा जाता है. स्थानीय भाषा में 'सेवु' का अर्थ 1000 होता है और यहीं से इस मंदिर के साथ 1000 मंदिर होने की कहानी जुड़ गई जो लोक मान्यता में इतनी गहरी है कि यहां अक्सर दंतकथा में एक शापित राजकुमारी की कहानी सुनाई जाती है. लोग मानते हैं कि यह शापित राजकुमारी आज भी इसी मंदिर में पत्थर की मूर्ति बनी हुई है और अपने उसी समय में फंसी हुई है. (Photo- PTI)

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कहानी बड़ी दिलचस्प है. इसमें युद्ध, मौत, छल-बल, प्रेम, रहस्य और बदला सब कुछ है. ये सुनने वाले पर निर्भर करता है कि वह इनमें से किस भावना को ऊपर रख पाता है. कहानी कुछ ऐसी है कि 

'इंडोनेशिया के जावा द्वीप में एक राज्य था बोको. बोको पर एक शक्तिशाली लेकिन क्रूर राजा प्रभु बोको का शासन था. उसकी एक बेहद सुंदर बेटी थी, जिसका नाम था 'रोरो जोंग्रांग' कहानी के केंद्र में यही 'रोरो जोंग्रांग' है.  एक दिन प्रभु बोको ने पेंगिंग पर हमला कर दिया. पेंगिंग का राजा न्यायप्रिय और दयालु था. इतिहास में यह 'प्रभु दयार मेयो' के नाम से दर्ज है. दोनों राज्यों के बीच भयंकर युद्ध हुआ. पेंगिंग के राजा का बेटा बांडुंग बॉन्डोवोसो अलौकिक शक्तियों का मालिक था. क्योंकि बोको भी दैत्य शासक था, इसलिए पेंगिंग के राजा ने अपने बेटे को युद्ध के लिए भेजा, क्योंकि वह जादुई ताकतों का सामना कर सकता था. (Photo- PTI)
 

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बांडुंग ने वीरता के साथ युद्ध लड़ा और बोको को हरा दिया. इस युद्ध में आखिर बोको की मौत हुई और बोको का शासन भी पेंगिंग के हाथ आ गया. अब राजकुमार बांडुंग महल की ओर बढ़ा. जहां 'राजकुमारी रोरो जोंग्रांग' अपने राज्य की हार और पिता की मौत का शोक मना रही थी. कहते हैं कि राजकुमारी के गालों से ढुलकते आंसू सुनहले पानी की तरह बहते थे. बांडुंग ने उसका सौंदर्य देखा तो वह मोहित हो गया. (Photo- PTI)

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उसने राज्य पर कब्जे के बजाय संधि का प्रस्ताव रखा और राजकुमारी से विवाह की इच्छा जाहिर की, लेकिन रोरो जोंग्रांग अपने पिता के हत्यारे से शादी नहीं करना चाहती थी, लेकिन सीधे मना करने के बजाय उसने राजकुमार के सामने दो ऐसी शर्तें रखीं, जिन्हें पूरा करना लगभग असंभव था. पहली शर्त थी कि राजकुमार दो विशाल कुएं यानी 'जलतुंडा' बनवाए. दूसरी शर्त थी कि वह केवल एक रात में एक हजार मंदिर बनाकर दिखाए. (Photo- PTI)

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बांडुंग ने अपनी दिव्य शक्तियों की मदद से पहले कुआं बना दिया, लेकिन राजकुमारी ने चाल चली. उसने कहा कि मुझे इसमें जाकर दिखाओ यह कितना गहरा है. राजकुमार ने प्रेम के वश में उसकी बात मान ली और कुएं में कूद गया. राजकुमारी ने तुरंत ही कुएं को बड़े पत्थरों से भरवा दिया, लेकिन जादुई शक्तियों में महारथी राजकुमार कुएं से सुरक्षित बाहर निकल आया. वो राजकुमारी से बिना कुछ कहे उसे चिढ़ाते हुए अपने अगले मिशन पर लग गया. (Photo- PTI)

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राजकुमार बांडुंग ने आत्माओं और भूतों को बुलाया और उनसे मंदिर बनवाने लगा. देखते-देखते रात की आखिरी प्रहर के पहले तक ही 999 मंदिर बन गए. राजकुमारी ने सोचा कि वह शर्त हार जाएगी. उसने फिर चालाकी की, अबकी बार उसने दासियों को बुलाकर धुआं करने को कहा साथ ही धान कूटने का निर्देश दिया. 

धान कूटना जावा में सुबह की परंपरा का हिस्सा था. एक साथ जब कई खल-मूसल की आवाज आने लगी तो मुर्गों को लगा का सुबह हो गई है और वह आखिरी पहर में ही बांग देने लग गए. मुर्गे की बांग सुनकर आत्माओं और भूतों को लगा कि सुबह हो गई है और लोग जाग गए हैं, इसलिए वह 1000वें मंदिर का काम अधूरा ही छोड़कर उड़ चले. राजकुमार ठगा सा उन्हें देखता ही रहा. (Photo- PTI)

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तब उसे राजकुमारी पर बड़ा क्रोध आया. उसने देखा कि उसके साथ बड़ा धोखा हुआ है, तब उसने राजकुमारी को शाप दिया कि 'तुम इतनी पत्थर दिल हो कि मेरा प्रेम नहीं समझ सकी, जाओ तुम पत्थर ही हो जाओ'.  राजकुमार के इस शाप का असर ऐसा हुआ कि राजकुमारी उसी 1000वें अधूरे मंदिर की प्रतिमा बन गई. तब से उसी प्रतिमा में कैद है. (Photo- PTI)

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राजकुमारी की मान्यता जिस प्रतिमा में है वह असल में महिषमर्दिनी देवी दुर्गा की आकृति से मेल खाती है. कहानी सुनाने वाले कहते हैं कि राजकुमार आखिरी मंदिर देवी का ही बनवा रहा था, लेकिन राजकुमारी के छल के कारण वह अधूरा रह गया और शापित राजकुमारी उसी देवी की प्रतिमा में बदल गई.

(Photo- PTI)

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इतिहास कहता है कि प्रंबानन मंदिर का निर्माण लगभग 850 ईस्वी में जावा के मातरम साम्राज्य के शासकों ने कराया था. उस समय यह दक्षिण-पूर्व एशिया का सबसे विशाल हिंदू मंदिर परिसर था. 10वीं शताब्दी के आसपास मातरम साम्राज्य ने अपनी राजधानी मध्य जावा से पूर्वी जावा में स्थानांतरित कर दी. माना जाता है कि इसके पीछे ज्वालामुखीय गतिविधियां, राजनीतिक परिवर्तन और नए सत्ता केंद्रों का उदय प्रमुख कारण थे. राजधानी बदलने के बाद मंदिर में नियमित पूजा-पाठ और रखरखाव बंद हो गया, जिससे यह धीरे-धीरे वीरान पड़ गया. (Photo- PTI)

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इसके बाद सदियों तक आए शक्तिशाली भूकंपों ने मंदिर को भारी क्षति पहुंचाई. ऊंचे शिखर ढहने लगे और कई छोटे मंदिर पूरी तरह नष्ट हो गए. वहीं, निकट स्थित सक्रिय ज्वालामुखी माउंट मेरापी की राख समय-समय पर परिसर में जमा होती रही. उपेक्षा के कारण मंदिर घने जंगल और झाड़ियों से ढक गया और कई संरचनाएं मिट्टी में दब गईं. इस दौरान स्थानीय लोगों ने मंदिर के अनेक पत्थरों का उपयोग अन्य निर्माण कार्यों में भी किया. (Photo- PTI)

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साल 1811 में ब्रिटिश सर्वेक्षक कॉलिन मैकेंजी ने इसे दोबारा खोजा, जिसके बाद इसे फिर से पुराने स्वरूप में लाने की कई कोशिशें की गईं.  20वीं सदी में बड़े पैमाने पर इसे संरक्षित किया गया और 1991 में प्रंबानन को यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित किया गया. आज दिखाई देने वाला प्रंबानन मूल प्राचीन संरचना और आधुनिक पुनर्निर्माण का मिलाजुला स्वरूप दिखाई देता है, जबकि अधिकांश छोटे मंदिर अब भी खंडहर में हैं. (Photo- PTI)

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