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अमित शाह की रणनीति ने बंगाल में कैसे पलटा सियासी गेम, जानें ऐतिहासिक जीत के पीछे का प्लान

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की अभूतपूर्व सफलता के पीछे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की सोची-समझी रणनीति को मुख्य आधार माना जा रहा है. डेटा-आधारित सीट वर्गीकरण, सघन जमीनी जुड़ाव और स्थानीय नेतृत्व पर भरोसे ने बंगाल में ममता बनर्जी के गढ़ को भेदने में पार्टी की बड़ी मदद की है.

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बंगाल चुनाव में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत. (photo: ITG)
बंगाल चुनाव में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत. (photo: ITG)

भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल विधानसभा चुनाव में अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस का सूपड़ा-साफ कर दिया है. हमारे संवाददाता पीयूष मिश्रा ने अपनी बीट रिपोर्ट में बीजेपी की इस ऐतिहासिक जीत के पीछे पर्दे की रणनीति का आकलन किया है, जिसमें बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह को पश्चिम बंगाल में मिली सफलता का प्रमुख सूत्राधार बताया जा रहा है.

बीजेपी के अनुसार, ये अभियान निर्णायक और सुनियोजित था और पश्चिम बंगाल में पार्टी की चुनावी रणनीति को आकार देने में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अहम भूमिका मानी जा रही है. पार्टी नेताओं का कहना है कि शाह का शुरुआती प्लान, जमीनी जुड़ाव, डेटा-आधारित रणनीति और स्थानीय नेतृत्व पर भरोसे ने BJP को बंगाल में ममता बनर्जी के गढ़ को भेदने में बड़ी मदद की.

पार्टी सूत्रों के अनुसार, शाह ने बिहार विधानसभा चुनाव खत्म होने से काफी पहले ही पश्चिम बंगाल चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी थीं और दिल्ली में कई रणनीतिक बैठकें की थीं. सितंबर 2025 में बीजेपी ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव को चुनाव प्रभारी और त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब को सह-प्रभारी नियुक्त किया था. इन दोनों नेताओं को संगठनात्मक समन्वय सुनिश्चित करने और बंगाल भर में पार्टी की पकड़ मजबूत करने का दायित्व सौंपा गया था.

सीटों का बंटवारा

आकलन में पता चला है कि बीजेपी की इस जीत का एक मुख्य आधार सीटों को अलग-अलग कैटेगरी या हिस्सों में बांटना था, जिसमें A से E तक के वर्ग बनाए गए.'A' कैटेगरी में वो सीटें थीं, जहां जीत निश्चित मानी गई. बी कैटेगरी में उन सीटों को रखा गया, जहां पार्टी के लिए माहौल अनुकूल था. पर लगातार प्रयास जरूरी था. सी कैटेगरी में उन सीटों को रखा गया था, जहां टीएमसी और बीजेपी के बीच सीधी लड़ाई थी. डी कैटेगरी में वो सीटें थी, जहां पार्टी के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण थी और वहां ग्राउंड वर्क की जरूरत थी. जबकि 'E' कैटेगरी में उन कमजोर सीटों को रखा गया, जहां पार्टी के लिए जीत की शुरुआती संभावनाएं बेहद कम थीं.

पार्टी नेताओं का दावा है कि केंद्रित प्रचार के कारण कई 'E' श्रेणी की सीटें धीरे-धीरे 'A' श्रेणी में बदल गईं. इस माइक्रो-मैनेजमेंट ने संसाधनों की तैनाती को बेहद प्रभावी बना दिया.

एंटी इनकम्बेंसी पर जोर

सूत्रों का कहना है कि आंतरिक बैठकों के दौरान अमित शाह ने बार-बार ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ बढ़ती एंटी इनकम्बेंसी पर जोर दिया. खबरों के मुताबिक, उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को लगातार आउटरीच बढ़ाने का निर्देश दिया और सुझाव दिया कि लगातार दबाव बनाने से सत्तारूढ़ टीएमसी के लिए चुनावों में कई सीटों पर मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं.

इसका उदाहरण- भवानीपुर था जो ममता बनर्जी से जुड़ा निर्वाचन क्षेत्र है. बीजेपी नेताओं का दावा था कि शाह के रणनीतिक इनपुट्स से पार्टी को यहां ऐतिहासिक जीत में अहम भूमिका निभाई.

आकलन में ये भी पता चला है कि अमित शाह का ऑन-ग्राउंड जुड़ाव बंगाल में प्रचार करने वाले किसी भी पार्टी के स्टार प्रचारक से ज्यादा था. चुनावी दौर में शाह ने पूरे पश्चिम बंगाल में 40 कार्यक्रमों में हिस्सा लिया, 39 जिलों का दौरा किया, 29 जनसभाएं कीं और 11 रोड शो आयोजित किए. इसके अलावा उन्होंने गंगासागर और कपिल मुनि आश्रम का भी सांस्कृतिक दौरा किया, जिससे स्थानीय जनमानस से जुड़ाव दिखा.

बूथ-लेवल मॉनिटरिंग

सूत्रों के अनुसार, शाह ने पूरे चुनाव अभियान के दौरान कड़ी निगरानी रखी. उन्होंने संगठनात्मक नेताओं के साथ देर रात तक समीक्षा बैठकें कीं और कथित तौर पर सीट-स्तरीय प्रतिक्रियाओं का विस्तार से अध्ययन किया. मतदान के दिनों में, उन्होंने बीजेपी के केंद्रीय वॉर रूम से घटनाक्रमों पर नजर रखी और विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों से रियल-टाइम में अपडेट लेते रहे.

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दलबदलुओं के बजाय स्थानीय चेहरों पर दांव

उधर, बीजेपी  के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि साल 2021 की तुलना में इस बार बीजेपी ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया. पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) से आने वाले दलबदलुओं पर भारी निर्भरता के बजाय स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करने पर ध्यान दिया. इसके अलावा बीजेपी ने क्षेत्र-विशेष मुद्दों जैसे- महिलाओं की सुरक्षा, बेरोजगारी, औद्योगिक गिरावट और राजनीतिक दबाव- पर फोकस किया गया.

बीजेपी के अंदर अमित शाह के इस अभियान को उच्च-तीव्रता वाले चुनाव प्रबंधन के मॉडल के रूप में देखा जा रहा है. पार्टी को झाड़ग्राम, पुरुलिया, पश्चिम मेदिनीपुर, जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग जैसे जिलों में बड़ी बढ़त की उम्मीद थी जो सही साबित हुई. डेटा और ग्राउंड फीडबैक के इस मेल ने बीजेपी के वोट शेयर में भारी उछाल दर्ज कराया. अब पार्टी इस सफल 'बंगाल मॉडल' को भविष्य में अन्य राज्यों के चुनावी दंगल में भी इस्तेमाल करने की योजना बना सकती है.

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