पश्चिम बंगाल विधानसभा में लोक लेखा समिति (PAC) के चेयरमैन पद के लिए एक अभूतपूर्व मुकाबला होने वाला है. TMC में बढ़ती फूट के बीच विरोधी गुट चुनाव के जरिए अपनी ताकत आजमाने की तैयारी कर रहे हैं.
मंगलवार को विधानसभा अधिकारियों ने PAC और सदन की तीन अन्य अहम कमेटियों के लिए चुनाव प्रक्रिया की घोषणा की. इससे TMC प्रमुख ममता बनर्जी और विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के गुटों के बीच पहला प्रत्यक्ष मुकाबला होने की संभावना बन गई है.
यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब दोनों गुट TMC के विधायी और संगठनात्मक विंग पर कंट्रोल के लिए एक बड़ी लड़ाई में उलझे हुए हैं और उनके दावे राजनीतिक, कानूनी और चुनावी मंचों पर देखे जा रहे हैं.
विधानसभा की अधिसूचना के अनुसार PAC, सार्वजनिक उपक्रमों की समिति, आकलन समिति और स्थानीय निधि खातों की समिति के लिए नामांकन 30 जून तक दाखिल किए जा सकते हैं. नामांकन की जांच 1 जुलाई को होगी, जबकि नामांकन वापस लेने की आखिरी तारीख 2 जुलाई है. अगर ज़रूरत पड़ी तो मतदान 5 जुलाई को होगा.
PAC को विधानसभा की सबसे प्रभावशाली निगरानी समितियों में से एक माना जाता है. इसमें अध्यक्ष सहित अधिकतम 20 सदस्य हो सकते हैं.
विधानसभा सूत्रों ने बताया कि इन समितियों के चुनाव में केवल विपक्षी विधायक ही हिस्सा लेंगे. जिनमें TMC, कांग्रेस, CPI(M) और ISF के सदस्य शामिल हैं. बता दें कि लोकसभा की लोकलेखा समिति की तरह कई राज्यों में परंपरा है कि अध्यक्ष का पद विपक्ष को ही दिया जाता है, ताकि निष्पक्षता बनी रहे, लेकिन यह कानूनी बाध्यता नहीं बल्कि प्रथा है.
आम तौर पर कमिटी के चेयरमैन विपक्ष के नॉमिनेशन से चुने जाते हैं, लेकिन इस बार TMC में बंटवारे की वजह से यह प्रक्रिया मुश्किल हो गई है और मुकाबला होने की संभावना है.
सूत्रों के मुताबिक ऋतब्रत बनर्जी गुट PAC चेयरमैन का पद हासिल करने का इच्छुक है और इस भूमिका के लिए सीनियर नेता फिरहाद हकीम के नाम पर विचार कर रहा है. ऋतब्रत बनर्जी गुट का दावा है कि उसे TMC के 80 में से 65 विधायकों का समर्थन है.
ममता और ऋतब्रत के बीच एक और आजमाइश
उम्मीद है कि दोनों गुट कमिटी की मेंबरशिप के लिए अपने उम्मीदवार उतारेंगे. अगर उम्मीदवारों की संख्या उपलब्ध सीटों से ज़्यादा हुई तो वोटिंग ज़रूरी हो जाएगी, जिससे यह प्रक्रिया असल में असेंबली के अंदर दोनों गुटों के बीच ताकत की आजमाइश बन जाएगी.
यह मुकाबला इसलिए अहम है क्योंकि "असली" TMC का प्रतिनिधित्व कौन करता है, यह सवाल अभी भी अनसुलझा है. यह मामला अभी कोर्ट में चल रहा है. तब से यह लड़ाई विधानसभा से आगे बढ़ गई है.
1998 में ममता बनर्जी द्वारा TMC की स्थापना के बाद पहली बार सोमवार को ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने उन्हें पार्टी चेयरपर्सन के पद से हटाकर वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को इस पद पर चुन लिया और साथ ही एक समानांतर नेतृत्व ढांचा भी पेश किया.
ममता बनर्जी के खेमे का दावा है कि बागी नेताओं द्वारा समानांतर संगठनात्मक ढांचा पेश करने और चुनाव अधिकारियों के सामने अपना दावा पेश करने से पहले ही उन्होंने चुनाव आयोग को संशोधित राष्ट्रीय कार्य समिति और पदाधिकारियों की सूची सौंप दी थी.
PAC पर पश्चिम बंगाल में होता रहा है टकराव
पश्चिम बंगाल में PAC का इतिहास राजनीतिक उठा-पटक वाला रहा है. हालांकि संसदीय परंपरा के अनुसार चेयरमैन का पद आमतौर पर मुख्य विपक्षी दल को मिलना चाहिए, लेकिन अलग-अलग सरकारों के समय इस नियुक्ति को लेकर अक्सर विवाद होते रहे हैं.
पिछली TMC सरकार के दौरान BJP ने सरकार पर परंपरा को दरकिनार करने का आरोप लगाया था. आरोप यह था कि सरकार ने ऐसे विधायकों को नियुक्त किया जो TMC में तो शामिल हो गए थे, लेकिन अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया था. उस समय मुख्य विपक्षी दल रही BJP ने शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में कई बार PAC की बैठकों का बहिष्कार किया था.
हालांकि इस बार मुकाबला सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच नहीं, बल्कि खुद विपक्ष के भीतर है.
TMC पर नियंत्रण की लड़ाई में विधानसभा की कमिटी सिस्टम अब नया अखाड़ा बन गई है. ऐसे में 5 जुलाई को होने वाला चुनाव यह साफ संकेत दे सकता है कि विधानसभा पार्टी के भीतर किस गुट को ज़्यादा समर्थन हासिल है.