तृणमूल कांग्रेस की बगावत ने राजनीति की अवसरवादिता को फिर से उजागर कर दिया है. पार्टी के उन 20 सांसदों के नाम सामने आ गए हैं जिन्होंने ममता के खिलाफ विद्रोह किया है. इनमें से 10 सांसद वैसे हैं जो TMC के टिकट पर पहली बार लोकसभा का चुनाव जीते हैं. ये नेताओं की वो जेनरेशन है जिसे ममता बनर्जी ने बीजेपी के खिलाफ लड़ाई का नया चेहरा बनाकर आगे बढ़ाया था. लेकिन अब यही युवा और अपेक्षाकृत नए सांसद संगठन के कामकाज, नेतृत्व शैली और पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं और ममता के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया है.
TMC के वे 10 सांसद जो पहली बार चुनकर आए हैं, उनमें अभिनेत्री, अभिनेता, क्रिकेटर, डॉक्टर, युवा नेता और स्थानीय कार्यकर्ता शामिल हैं.
इन 10 सांसदों के नाम इस तरह हैं.
जादवपुर- सयानी घोष
बहरामपुर- यूसुफ पठान
बैरकपुर- पार्थ भौमिक
आरामबाग- मिताली बाग
पूर्वी बर्धमान- डॉ. शर्मिला सरकार
बांकुरा- अरूप चक्रवर्ती
झाड़ग्राम- कालीपद सोरेन
मेदिनीपुर-जून मालिया
हुगली-रचना बनर्जी
मथुरापुर-बापी हालदार
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2024 के लोकसभा में ममता बनर्जी की छत्रछाया में टिकट पाकर संसद पहुंचे थे. पार्टी की रणनीति पुरानी लीडरशिप को साइडलाइन कर युवा और नई छवि वाले चेहरों को आगे लाने की थी, लेकिन विधानसभा चुनाव की हार के बाद इन्हीं नए सांसदों में असंतोष सबसे ज्यादा नजर आ रहा है.
वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तिदार इस विद्रोह की अगुवाई कर रही हैं. उन्होंने स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर अलग बैठक व्यवस्था की मांग की है. बागी सांसद राज्य में कथित कुप्रबंधन, बेरोजगारी और कानून व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं.
चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी पर तीखे हमले की वजह सयानी घोष को ममता बनर्जी का 'प्रतिरूप' कहा जाने लगा था. अब ममता से उनका मोहभंग लोगों को हैरान कर रहा है.
इससे यह भी संदेश भी निकलता है कि समस्या केवल वरिष्ठ नेताओं की महत्वाकांक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी के नए चेहरों के भीतर भी असंतोष की जड़ें फैल चुकी हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद TMC के भीतर शक्ति संतुलन बदल रहा है. कई नए सांसद अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बना चुके हैं और अब वे सिर्फ पार्टी लाइन पर चलने के बजाय अपनी बात खुलकर रखना चाहते हैं. यही कारण है कि असहमति अब बंद कमरों से निकलकर सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गई है.
बहरामुपर से सांसद यूसुफ पठान
यूसुफ पठान का नाम भी विद्रोही सांसदों की सूची में शामिल रहा है. IPL में कोलकाता नाइट राइडर्स के लिए खेलते हुए उन्होंने बंगाल से खास लगाव विकसित किया. यूसुफ का यही कदम बाद में उनकी राजनीतिक यात्रा का आधार बना. क्रिकेट की दुनिया में नाम कमाने वाले यूसुफ पठान को ममता ने बंगाल के बहरामपुर सीट के लिए लाया. अल्पसंख्यक बहुल इस सीट से यूसुफ पठान का लड़ना जीत की लगभग गारंटी थी.
यूसुफ पठान ने बंपर जीत हासिल की. लेकिन विधानसभा चुनाव में TMC की हार के बाद यूसुफ पठान को लेकर कई अटकलें लगाई जा रही हैं. अब देखना यह है कि बंगाल की उथल-पुथल वाली राजनीति में वे कितनी देर तक "क्रीज" पर टिक पाते हैं.
बंगाल की राजनीति की 'रचना'
हुगली से सांसद रचना बनर्जी पश्चिम बंगाल की राजनीति और मनोरंजन जगत का चर्चित चेहरा रहीं हैं. रचना बनर्जी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में हुगली सीट से बीजेपी के कैंडिडेट लॉकेट चटर्जी को हराकर संसद पहुंची थीं.
राजनीति में आने से पहले रचना बनर्जी बंगाली और ओड़िया फिल्मों की लोकप्रिय अभिनेत्री रहीं और उन्होंने कई सुपरहिट फिल्मों में काम किया.
रचना की सबसे बड़ी पहचान टीवी शो दीदी नंबर- 1 से बनीं. गौरतलब है कि ममता बनर्जी बंगाल में 'दीदी' के नाम से चर्चित हैं. पश्चिम बंगाल के घर-घर में रचना को आज भी "दीदी नंबर वन" के नाम से पहचाना जाता है, और इसी लोकप्रियता ने उनकी राजनीतिक यात्रा को भी मजबूत आधार दिया.
लेकिन पहली बार सांसद बनीं रचना अब टीएमसी के बागी सांसदों के गुट में हैं.
बगावत की लहर में शामिल हुईं सांसद शर्मिला
अभिषेक बनर्जी के करीबी माने जाने वाले पार्थ भौमिक भी पहली बार TMC के टिकट पर सांसद बने हैं, वे बैरकपुर लोकसभा सीट से सांसद हैं. थिएटर आर्टिस्ट और व्यवसायी पृष्ठभूमि वाले भौमिक 2011 से सक्रिय राजनीति में हैं. विधानसभा चुनाव में TMC की हार के बाद जब TMC में विद्रोह हुआ तो उन्होंने तुरंत पाला बदल लिया और बागी खेमे में आ गए.
TMC की डॉ. शर्मिला सरकार 2024 में पूर्वी बर्धमान (SC) लोकसभा सीट से पहली बार सांसद चुनी गईं. कटवा की गरीब पृष्ठभूमि से आने वाली वे चिकित्सक हैं और लोगों की सेवा में समर्पित रही हैं. वे ममता बनर्जी की सोशल वेलफेयर और स्वास्थ्य फोकस वाली छवि का प्रतिनिधित्व करती हैं. बंगाल में TMC के खिलाफ शुरू हुए बगावत की लहर में डॉ. शर्मिला सरकार भी शामिल हो गईं.
TMC के लोकसभा में 28 सांसद हैं. इनमें से 20 सांसद बागी हो रहे हैं. यानी कि पार्टी का टूटना तय है. हालांकि ममता बनर्जी और उनके करीबी अब भी स्थिति संभालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब शहरों, गांवों में भी टीएमसी के नेता इस्तीफा दे रहे हैं.
राजनीतिक विश्लेषक इसे TMC के अंदर पीढ़ीगत बदलाव और अभिषेक बनर्जी के प्रति सांसदों का गुस्सा मान रहे हैं. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि नए सांसदों को भविष्य की अनिश्चितता महसूस हो रही है और उन्होंने तोल-मोल कर ही ये कदम उठाया है.