पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट को लेकर एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है. देश के प्रसिद्ध कलाकार नंदलाल बोस के पोते सुप्रबुद्ध सेन और उनकी पत्नी दीपा सेन के नाम मतदाता सूची से गायब मिले हैं. दोनों ने आरोप लगाया है कि सभी जरूरी दस्तावेज जमा करने के बावजूद उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव में वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है.
88 साल के सुप्रबुद्ध सेन और 82 साल की दीपा सेन वर्तमान में शांति निकेतन में रहते हैं. उन्होंने बताया कि शुरुआत में उनके नाम पेंडिंग कैटेगरी में रखे गए थे. इसके बाद चुनाव अधिकारियों के सामने पेश होकर उन्होंने सभी जरूरी दस्तावेज जमा किए. इन दस्तावेजों में पासपोर्ट, पेंशन रिकॉर्ड, रोजगार से जुड़े कागजात और शैक्षणिक प्रमाण पत्र शामिल थे.

सुप्रबुद्ध सेन ने कहा कि सुनवाई के दौरान उन्होंने हर जरूरी जानकारी दी. यहां तक कि चुनाव आयोग के अधिकारी उनके घर भी आए और उन्होंने मांगी गई सभी जानकारी उपलब्ध कराई. इसके बावजूद, उनका और उनकी पत्नी का नाम अंतिम सूची से हटा दिया गया. उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्हें इस फैसले के पीछे कोई ठोस कारण समझ नहीं आ रहा है.
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उन्होंने यह भी बताया कि चक्रधर नायक, जो पिछले 52 वर्षों से उनके साथ रह रहे हैं, उनका नाम भी मतदाता सूची में नहीं है. सेन ने कहा कि अब मैं वोट नहीं डालूंगा. मुझे इसका कोई अफसोस नहीं है, क्योंकि मैंने जीवन में कई बार अपने मताधिकार का प्रयोग किया है.
सुप्रबुद्ध सेन, नंदलाल बोस की छोटी बेटी जमुना सेन के पुत्र हैं. उनका पालन-पोषण अपने दादा के संरक्षण में हुआ. उन्होंने 1954 में विश्व-भारती विश्वविद्यालय के पाठ भवन से अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी की और आगे की पढ़ाई भी वहीं से की. बाद में उन्होंने जाधवपुर यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की.
शिक्षा पूरी करने के बाद वे दामोदर वैली कॉर्पोरेशन (DVC) में कार्यरत रहे. करीब 32 वर्षों की सेवा के बाद 1996 में सेवानिवृत्त हुए और स्थायी रूप से शांतिनिकेतन में बस गए. चूंकि वे नौकरी के दौरान अन्य जगहों पर रहते थे, इसलिए साल 2002 की वोटर लिस्ट में उनके नाम शामिल नहीं थे.

इस पूरे मामले ने राज्य में चल रही मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR) पर सवाल खड़े कर दिए हैं. अब तक छह सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी की जा चुकी हैं, जिनमें करीब 50 लाख नामों की जांच की गई है. रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से लगभग 45 प्रतिशत नाम हटाए गए हैं.
हालांकि, इस मामले पर श्रीनिकेतन की बीडीओ अर्पिता चौधरी ने कहा कि नाम हटने के पीछे के कारणों की जानकारी फिलहाल स्पष्ट नहीं है. उन्होंने यह जरूर कहा कि प्रभावित लोग ट्रिब्यूनल का रुख कर सकते हैं.
गौरतलब है कि नंदलाल भारतीय कला जगत के एक स्तंभ माने जाते हैं. वे रवींद्रनाथ टैगोर के शिष्य थे और उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर भारतीय संविधान की मूल पांडुलिपि को चित्रों से सजाया था. यह कार्य उन्हें जवाहरलाल नेहरू के द्वारा सौंपा गया था.