ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और बरेली के पूर्व सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री की मुलाकात को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म रहा. राजनीतिक गलियारों से लेकर प्रशासनिक हलकों तक यह सवाल उठता रहा कि आखिर दोनों के बीच क्या बातचीत हुई. हालांकि, हकीकत इससे बिल्कुल अलग निकली. न कोई लंबी चर्चा हुई, न ही किसी तरह का संवाद. शंकराचार्य के मौन व्रत के चलते अलंकार अग्निहोत्री पूरे समय हाथ जोड़े खड़े रहे और लिखित माध्यम से ही उनका हाल-चाल पूछा गया. लिखित संवाद के जरिए उन्हें आशीर्वाद भी मिला.
अलंकार अग्निहोत्री ने बाद में स्पष्ट किया कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती मौन व्रत पर हैं, इसलिए उनसे बातचीत संभव नहीं थी. उन्होंने कागज पर लिखकर उनका कुशलक्षेम पूछा, जिस पर महाराज जी ने भी संक्षिप्त रूप में आशीर्वाद दिया. यही पूरी मुलाकात का सार रहा. अलंकार अग्निहोत्री ने बताया कि शंकराचार्य जी ने किसी और दिन सुबह के समय बुलाया है. अलंकार अग्निहोत्री के मुताबिक, भारतीय परंपरा में किसी भी बड़े कार्य से पहले गुरुजनों का आशीर्वाद लेना आवश्यक माना जाता है. इसी भावना के साथ वह वाराणसी पहुंचे थे. उन्होंने इस बात को सिरे से खारिज किया कि शंकराचार्य के साथ उनकी कोई राजनीतिक या रणनीतिक चर्चा हुई है. उनके शब्दों में, मैं आशीर्वाद लेने आया था, न कि किसी विमर्श के लिए.
इस्तीफे के बाद पहली बड़ी उपस्थिति
यह मुलाकात इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि मौनी अमावस्या के स्नान के दौरान शंकराचार्य और उनके वेदपाठी बटुकों के साथ हुई घटना के बाद अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. बाद में उन्हें निलंबित भी कर दिया गया. इसके बाद यह उनकी पहली बड़ी सार्वजनिक उपस्थिति थी, जिसने एक बार फिर उन्हें चर्चा के केंद्र में ला दिया. अलंकार अग्निहोत्री का कहना है कि उस घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था. उन्होंने इसे केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सनातन परंपरा और सम्मान से जुड़ा प्रश्न बताया. हालांकि, रविवार की मुलाकात में उस घटना को लेकर शंकराचार्य से कोई बातचीत नहीं हुई.
आशीर्वाद के बाद बड़ा ऐलान
मुलाकात के तुरंत बाद अलंकार अग्निहोत्री ने मीडिया से बातचीत में बड़ा राजनीतिक-सामाजिक ऐलान कर दिया. उन्होंने कहा कि अगर 6 फरवरी तक संसद का विशेष सत्र बुलाकर एससी-एसटी एक्ट को समाप्त नहीं किया जाता, तो 7 फरवरी से वह और देशभर से लोग दिल्ली कूच करेंगे. उनके इस बयान ने मुलाकात को लेकर चल रही चर्चाओं को और तेज कर दिया. हालांकि उन्होंने बार-बार यह दोहराया कि शंकराचार्य से उनकी इस मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं हुई और यह पूरी तरह उनका व्यक्तिगत और वैचारिक निर्णय है.
बातचीत नहीं, केवल आशीर्वाद मिला
अलंकार अग्निहोत्री ने साफ शब्दों में कहा कि इस मुलाकात को किसी राजनीतिक संकेत या समर्थन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. उनके अनुसार, शंकराचार्य का आशीर्वाद आध्यात्मिक था, न कि किसी आंदोलन या राजनीतिक एजेंडे का समर्थन. उन्होंने बताया कि शंकराचार्य ने मौन रहते हुए केवल इतना संकेत दिया कि सत्य और विवेक के मार्ग पर चलते रहना चाहिए. इसे उन्होंने अपने लिए नैतिक संबल बताया, न कि किसी तरह की सहमति या रणनीतिक दिशा.
एससी-एसटी एक्ट पर तीखा रुख
मीडिया से बातचीत में अलंकार अग्निहोत्री ने एक बार फिर एससी-एसटी एक्ट को विभाजनकारी कानून करार दिया. उन्होंने दावा किया कि पिछले 35 वर्षों से समाज इस कानून की विभीषिका झेल रहा है. उनके मुताबिक, यह कानून सोच-समझकर इस तरह बनाया गया कि समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच स्थायी खाई बनी रहे. उन्होंने कहा कि अगर 6 फरवरी तक इस कानून को खत्म नहीं किया गया, तो 7 फरवरी से देशव्यापी आंदोलन शुरू होगा. उन्होंने इसे केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की शुरुआत बताया.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रति कथित नरम रुख के सवाल पर अलंकार अग्निहोत्री ने संतुलित जवाब दिया. उन्होंने कहा कि जब बटुकों का मान-हनन हुआ, तब उन्होंने अपनी बात खुलकर रखी और आज भी उसी स्टैंड पर हैं. लेकिन उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि दिल्ली के तंत्र के सामने इस तरह के मुद्दों पर खुलकर बात क्यों नहीं हो पा रही है. अलंकार अग्निहोत्री ने एक और विवादित बयान देते हुए कहा कि देश में इस समय दो तरह की सरकारें चल रही हैं. एक केंद्र की और दूसरी राज्यों की. उनके अनुसार, केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी के कारण ही ऐसी स्थितियां पैदा हो रही हैं. उन्होंने यूजीसी रेगुलेशन को भी इसी सोची-समझी साजिश का हिस्सा बताया.
राजनीतिक आकांक्षाओं के सवाल पर अलंकार अग्निहोत्री ने एक बार फिर खुद को राजनीति से दूर बताया. उन्होंने कहा कि उनकी एकमात्र आकांक्षा देश का कल्याण है. अगर उन्हें राजनीति करनी होती, तो वह अब तक कई दलों के नेताओं के साथ बैठकों में नजर आते. उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि नौकरी में लौटने का सवाल ही नहीं उठता. उनके मुताबिक, अभी समाज और देश से जुड़े कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर काम करना जरूरी है और वही उनकी प्राथमिकता है.