पत्नी को रोते-रोते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम पर इस्तीफा देने की बात बताने वाले PCS अधिकारी प्रशांत सिंह एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं. इस्तीफे का ऐलान, फिर करीब तीन दिन तक विभाग को इस्तीफे ही नहीं मिलना और जब मिला तो ठीक उसके एक दिन बाद अचानक इस्तीफा वापस लेने की बात करने वाले प्रशांत सिंह के झूठ की पोल खुलती जा रही है.अपने दिव्यांग प्रमाणपत्र को पूरी तरह वैध बताने वाले प्रशांत सिंह के बारे में मऊ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) का बयान सामने आया है, जिसने प्रशांत सिंह के दावों की पोल खोल दी है. CMO मऊ ने साफ कहा है कि प्रशांत सिंह के दिव्यांग प्रमाणपत्र की जांच अभी पूरी ही नहीं हुई है.
रोते हुए इस्तीफा, फिर बदली रणनीति
पूरा मामला तब चर्चा में आया जब अयोध्या में तैनात जीएसटी डिप्टी कमिश्नर प्रशांत सिंह ने भावुक होकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थन में इस्तीफे का ऐलान किया. वीडियो और बयानों में वह बेहद भावुक नजर आए और इसे नैतिक फैसला बताया. लेकिन प्रशासनिक रिकॉर्ड के अनुसार, यह इस्तीफा तत्काल स्वीकार नहीं हुआ. लगभग तीन दिन बाद यह इस्तीफा औपचारिक रूप से शासन तक पहुंचा. इसके बाद शनिवार को प्रशांत सिंह ने इस्तीफा वापस लेने का ऐलान कर दिया.
दिव्यांग प्रमाणपत्र बना विवाद की जड़
इस्तीफे के तुरंत बाद प्रशांत सिंह का पुराना मामला एक बार फिर सतह पर आ गया दिव्यांग प्रमाणपत्र का. उनके सगे बड़े भाई विश्वजीत सिंह ने सार्वजनिक तौर पर आरोप लगाया कि जिस दिव्यांग प्रमाणपत्र के आधार पर प्रशांत सिंह को सरकारी नौकरी मिली, वह फर्जी है और इसकी जांच वर्ष 2021 से चल रही है. विश्वजीत सिंह का कहना है कि उन्होंने इस संबंध में मऊ के CMO कार्यालय में लिखित शिकायत दी थी, जिसके बाद प्रशांत सिंह को दो बार मंडलीय दिव्यांग मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने के लिए पत्र भेजे गए. लेकिन इसके बावजूद प्रशांत सिंह बोर्ड के समक्ष उपस्थित नहीं हुए.
CMO मऊ का बयान: जांच अभी अधूरी
इस पूरे प्रकरण पर अब मऊ के CMO डॉक्टर संजय गुप्ता का बयान सामने आया है, जिसने कई अहम तथ्यों को स्पष्ट कर दिया है. CMO के मुताबिक, प्रशांत सिंह का दिव्यांग प्रमाणपत्र वर्ष 2009 में मऊ विकलांग बोर्ड द्वारा जारी किया गया था, जिसमें 40 प्रतिशत दिव्यांगता दर्शाई गई है. डॉ. संजय गुप्ता ने बताया कि इस प्रमाणपत्र की पुनः जांच के लिए शिकायत प्राप्त हुई थी और इसी क्रम में प्रशांत सिंह को दो बार मंडलीय मेडिकल बोर्ड के सामने उपस्थित होने के लिए बुलाया गया. लेकिन अब तक उनकी ओर से कोई उपस्थिति दर्ज नहीं कराई गई है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा, बिना स्पेशलिस्ट मेडिकल बोर्ड की जांच के यह कहना संभव नहीं है कि शिकायत सही है या गलत. जांच अभी पूरी नहीं हुई है. आपने जो आखिरी लेटर जारी किया है उसमें क्या था इस सवाल के जवाब में सीएमओ मऊ बताते हैं कि दो बार परीक्षण हेतु इनको बोर्ड का गठन करके बुलाया गया और इनके द्वारा उपस्थिति दर्ज नहीं की गई है .
CMO मऊ ने यह भी बताया कि 19 दिसंबर को उन्होंने इस पूरे मामले में महानिदेशक से दिशा-निर्देश मांगे हैं. इसके साथ ही दिव्यांगजन आयुक्त, लखनऊ को भी पूरे प्रकरण से अवगत करा दिया गया है. डॉ. गुप्ता के अनुसार, अब आगे की कार्रवाई उच्च अधिकारियों और सक्षम प्राधिकरण से मिलने वाले निर्देशों के आधार पर की जाएगी. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि CMO स्तर से जो भी प्रक्रिया संभव थी, वह पूरी कर दी गई है. CMO मऊ का कहना है कि पूरा मामला नियमों और प्रक्रिया के तहत देखा जा रहा है और जांच के निष्कर्ष विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड के आधार पर ही तय होंगे.
वैध बताने का दावा, लेकिन हकीकत अलग
इधर, प्रशांत सिंह लगातार यह दावा करते रहे हैं कि उनका दिव्यांग प्रमाणपत्र पूरी तरह वैध है और उसे लेकर फैलाए जा रहे संदेह निराधार हैं. उन्होंने यह भी कहा कि प्रमाणपत्र खुद CMO कार्यालय से जारी हुआ है, इसलिए उस पर सवाल नहीं उठना चाहिए. लेकिन CMO मऊ के बयान ने इस दावे को कमजोर कर दिया है. जब जांच पूरी ही नहीं हुई है, तो प्रमाणपत्र को क्लीन चिट देने का दावा कैसे किया जा सकता है. यही सवाल अब सबसे बड़ा बनकर उभरा है.
भाई के आरोपों ने बढ़ाई मुश्किल
इस पूरे मामले को और जटिल बना दिया है प्रशांत सिंह के बड़े भाई विश्वजीत सिंह के आरोपों ने. एक ही परिवार के दो सदस्यों के बीच सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप ने न सिर्फ प्रशासनिक जांच को चर्चा में ला दिया है, बल्कि प्रशांत सिंह के इस्तीफे की टाइमिंग पर भी सवाल खड़े कर दिए थे. राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि दिव्यांग प्रमाणपत्र से जुड़ी संभावित कार्रवाई और रिकवरी के डर ने ही प्रशांत सिंह को भावनात्मक इस्तीफे की राह पर जाने को मजबूर किया.