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बीएसपी की बैठक में विपक्षी दलों पर मायावती की खामोशी क्या कहती है? कांग्रेस पर चुप्पी भविष्य के संकेत

बसपा प्रमुख मायावती की बैठक में विपक्षी दलों पर उनकी खामोशी ने नई राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दे दिया है. मायावती ने न तो सपा, कांग्रेस और न ही बीजेपी पर कोई टिप्पणी की. पार्टी के भीतर इसे 2027 चुनाव से पहले संभावित गठबंधन के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.

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मायावती की चुप्पी से गठबंधन की अटकलें तेज हो गई हैं (Photo: PTI)
मायावती की चुप्पी से गठबंधन की अटकलें तेज हो गई हैं (Photo: PTI)

बीएसपी की बैठक में विपक्षी दलों पर मायावती की खामोशी क्या कहती है? कांग्रेस पर चुप्पी भविष्य के संकेत मानी जा रही है. पहली बार मायावती ने अपने नेताओं से साफ कहा कि टिकट सिर्फ जनाधार वाले नेताओं को ही मिलेंगे. इसके लिए ऐसे चेहरों की तलाश करने को कहा गया है, जिनकी जमीन पर पकड़ मजबूत हो.

2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए ब्राह्मणों को खास तवज्जो देने की तैयारी दिखाई दे रही है. पार्टी अच्छे ब्राह्मण नेताओं को जोड़ने की कोशिश में जुटी है और माना जा रहा है कि ब्राह्मण समाज को ज्यादा टिकट दिए जा सकते हैं. वहीं दलित सीटों पर जमीन से जुड़े मेहनती कैडर कार्यकर्ताओं को टिकट देने की तैयारी की जा रही है.

मायावती की यह शायद पहली ऐसी बैठक रही होगी, जिसमें उन्होंने किसी भी विपक्षी दल का नाम न तो पार्टी मीटिंग में लिया और न ही अपने प्रेस रिलीज में उसका जिक्र किया. आमतौर पर मायावती अपनी हर बैठक में सपा, कांग्रेस और बीजेपी पर हमला बोलती रही हैं. ज्यादातर उनके निशाने पर समाजवादी पार्टी रहती है, लेकिन इस बार उन्होंने न तो सपा पर कुछ कहा और न ही कांग्रेस को लेकर कोई टिप्पणी की.

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लोगों को उम्मीद थी कि जिस तरीके से कांग्रेस के दो दलित नेताओं ने बिन बुलाए मेहमान की तरह मायावती के दरवाजे पर दस्तक दी थी और बैरंग लौटना पड़ा था, साथ ही उन नेताओं ने मायावती के स्वास्थ्य पर भी टिप्पणी की थी, उसके बाद मायावती इस बैठक में कांग्रेस पर जरूर प्रतिक्रिया देंगी. लेकिन मायावती ने पूरी तरह चुप्पी साधे रखी.

पार्टी नेताओं, कोऑर्डिनेटर और महत्वपूर्ण कार्यकर्ताओं के साथ हुई इस बैठक में कांग्रेस पर कुछ न बोलना कई लोगों को भविष्य के संकेत जैसा लग रहा है. पार्टी के अंदरूनी सूत्र मान रहे थे कि मायावती कांग्रेस नेताओं को लेकर कोई राय रख सकती हैं, लेकिन जिस तरह कांग्रेस पार्टी ने खुद ही अपने नेताओं से दूरी बना ली, उसके बाद मायावती के लिए बोलने की ज्यादा गुंजाइश नहीं बची.

यह भी पढ़ें: 'ब्राह्मण' आशीर्वाद दे दें तो भी मायावती के लिए कुर्सी की राह कठिन

कुछ लोगों को लग रहा है कि मायावती धीरे-धीरे गठबंधन के मोड में आ रही हैं. यही वजह है कि उन्होंने किसी भी पार्टी को लेकर आक्रामक टिप्पणी नहीं की.

पार्टी के भीतर का एक बड़ा तबका लगातार यह फीडबैक दे रहा है कि 2027 का चुनाव बिना गठबंधन के लड़ना बसपा के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है. इसलिए चाहे किसी भी गठबंधन के साथ जाना पड़े, लेकिन गठबंधन जरूर होना चाहिए.

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कांग्रेस पार्टी से गठबंधन को लेकर चर्चा जरूर तेज है, लेकिन अभी तक दोनों पार्टियों में से किसी की तरफ से आधिकारिक बयान नहीं आया है. माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में अगले साल होने वाले चुनावों को देखते हुए कांग्रेस के साथ जाना बसपा के लिए सबसे मुफीद विकल्प हो सकता है. हालांकि, सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि मायावती आखिर में क्या फैसला लेती हैं.

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