सहारनपुर में नकली सिक्के बनाने वाले गिरोह का पर्दाफाश होने के बाद अब पुलिस की जांच का फोकस पूरे नेटवर्क पर है. करीब 25 साल से नकली सिक्के बना रहे मास्टरमाइंड उपकार लूथरा उर्फ अभय प्रताप सिंह के पुराने संपर्कों और कारोबार की कड़ियां खंगाली जा रही हैं. पुलिस के हाथ लगे सात हिसाब-किताब के रजिस्टर और आठ मोबाइल फोन अब इस मामले की सबसे अहम कड़ियां माने जा रहे हैं. इनसे यह पता लगाने की कोशिश हो रही है कि नकली सिक्के कहां बनाए जाते थे, किन लोगों तक पहुंचते थे और बाजार में इन्हें खपाने का नेटवर्क कितना बड़ा था. पुलिस ने इस मामले में पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है. जांच में कुल आठ लोगों के गिरोह की जानकारी सामने आई है. बाकी तीन आरोपियों की तलाश की जा रही है.
25 साल पुराने नेटवर्क की खुल रही कुंडली
इस मामले में सबसे अहम नाम मोहाली, पंजाब निवासी उपकार लूथरा उर्फ अभय प्रताप सिंह का सामने आया है. पुलिस के मुताबिक वह वर्ष 2001 से नकली सिक्के बनाने के धंधे में शामिल बताया जा रहा है. पुलिस के अनुसार दिल्ली पुलिस उसे पहले गिरफ्तार कर चुकी है और एक समय उस पर एक लाख रुपये का इनाम भी घोषित था. अब सहारनपुर पुलिस उसके पुराने मामलों और संपर्कों की जानकारी जुटा रही है. जांच अधिकारी यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि इतने लंबे समय में उसके साथ कौन-कौन लोग जुड़े और क्या पुराने नेटवर्क के लोग ही अलग-अलग जगहों पर नए ठिकानों के साथ सक्रिय रहे. यही जांच यह भी बताएगी कि सहारनपुर में नया बेस बनाने की तैयारी के पीछे कौन लोग थे.
सात रजिस्टरों में छिपा हो सकता है असली हिसाब
नकली सिक्कों के साथ बरामद सात रजिस्टर पुलिस के लिए महत्वपूर्ण सबूत हो सकते हैं. इन रजिस्टरों में दर्ज जानकारी से गिरोह के लेनदेन और सप्लाई नेटवर्क की तस्वीर सामने आने की उम्मीद है. पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि रजिस्टर में दर्ज नाम और नंबर किससे जुड़े हैं. यदि इनमें सिक्कों की सप्लाई, रकम या खरीदारों से जुड़ी जानकारी मिलती है तो जांच सीधे उन लोगों तक पहुंच सकती है, जो गिरोह के लिए बाजार तैयार करते थे. यानी पुलिस ने सिक्के बनाने वाली जगह तक तो पहुंच बना ली है, अब उसकी कोशिश उन रास्तों को तलाशने की है जिनसे ये सिक्के बाजार तक पहुंचते थे. रजिस्टर के साथ बरामद आठ मोबाइल फोन भी जांच का बड़ा आधार हैं. पुलिस इनसे आरोपियों के संपर्कों और उनकी गतिविधियों की जानकारी जुटा रही है. किससे लगातार बातचीत होती थी? किन राज्यों में संपर्क था? सहारनपुर आने से पहले आरोपी कहां सक्रिय थे? सिक्कों की सप्लाई के लिए किन लोगों से संपर्क किया जाता था? पुलिस इन सभी सवालों के जवाब तलाश रही है. जांच में सामने आने वाले नंबरों और संपर्कों को आरोपियों के पुराने नेटवर्क से भी मिलाया जा सकता है. इससे गिरोह में शामिल अन्य लोगों की भूमिका स्पष्ट होने की संभावना है.
रोज 12 हजार सिक्के बनाने की क्षमता
पुलिस के मुताबिक गिरोह ने नकली सिक्के बनाने के लिए इंडस्ट्रियल लेवल का सेटअप तैयार किया था. यहां करीब 12 हजार 20 रुपये के नकली सिक्के प्रतिदिन तैयार करने की क्षमता थी. कार्रवाई के दौरान छह मशीनें, लोहे की डाई, बिना मोहर की डाई, मोहर लगी डाई, पॉलिशिंग मशीन और दूसरे उपकरण बरामद हुए हैं. बड़ी संख्या में अधबने सिक्के भी मिले हैं. पुलिस के मुताबिक यह सेटअप किसी छोटे स्तर के प्रयोग के लिए नहीं था. इससे बड़े पैमाने पर सिक्के तैयार किए जा सकते थे. हालांकि पुलिस अभी यह मानकर नहीं चल रही है कि वर्ष 2001 से हर दिन इसी क्षमता पर सिक्के बनाए जाते रहे. इसी वजह से बाजार में खपाए गए सिक्कों की वास्तविक संख्या और रकम का आंकड़ा जांच पूरी होने के बाद ही साफ होगा.
70 करोड़ से ज्यादा का अनुमान, लेकिन सटीक रकम बाकी
पूछताछ में नकली सिक्कों को बड़े पैमाने पर बाजार में चलाने की जानकारी सामने आई है. पुलिस की प्रारंभिक जांच में 70 करोड़ रुपये से अधिक कीमत के नकली सिक्के बाजार में खपाए जाने का अनुमान है. हालांकि एसएसपी अभिनंदन के मुताबिक आरोपियों ने अभी तक कोई सटीक रकम नहीं बताई है. इसलिए 70 करोड़ रुपये का आंकड़ा फिलहाल अनुमान है, अंतिम आंकड़ा नहीं. अब पुलिस रजिस्टर, मोबाइल फोन, पुराने रिकॉर्ड और आर्थिक लेनदेन की जांच के जरिए वास्तविक रकम का पता लगाने की कोशिश कर रही है. अगर जांच में पुराने लेनदेन और सप्लाई के रिकॉर्ड मिलते हैं तो यह भी पता चल सकता है कि नकली सिक्कों का कारोबार किन-किन राज्यों तक फैला था.
छोटे लेनदेन में खपाए जाते थे सिक्के
पुलिस के मुताबिक गिरोह नकली सिक्कों को ऐसे स्थानों पर खपाता था, जहां रोज बड़ी संख्या में छोटे नकद लेनदेन होते हैं. शराब के ठेके, टोल टैक्स और छोटे कारोबारी इसके लिए इस्तेमाल किए जाने वाले प्रमुख स्थान बताए गए हैं. ऐसे स्थानों पर बड़ी संख्या में सिक्कों का लेनदेन होने के कारण हर सिक्के की बारीकी से जांच नहीं हो पाती. पुलिस का कहना है कि गिरोह इसी का फायदा उठाता था. एसएसपी अभिनंदन के मुताबिक नकली सिक्के देखने में काफी हद तक असली सिक्कों से मिलते हैं. आम व्यक्ति के लिए दोनों में अंतर करना आसान नहीं होता. पुलिस के मुताबिक आरोपी यहां अपना बेस बनाने की तैयारी में थे, लेकिन उससे पहले ही संयुक्त टीम ने उन्हें पकड़ लिया. अब यह पता लगाया जा रहा है कि सहारनपुर में उन्हें किसकी मदद मिल रही थी और क्या यहां पहले से कोई नेटवर्क मौजूद था.
मशीन से तैयार होता था सिक्का
पुलिस ने मौके से छह मशीनें बरामद की हैं. एसएसपी अभिनंदन के मुताबिक यह पूरा सेटअप इंडस्ट्रियल लेवल पर तैयार किया गया था. यानी एक-दो सिक्के बनाकर बाजार में चलाने के बजाय बड़ी संख्या में सिक्के तैयार करने की व्यवस्था थी. पुलिस के अनुसार इस सेटअप से करीब 12 हजार 20 रुपये के सिक्के प्रतिदिन तैयार किए जा सकते थे. पुलिस को मौके से डाई पॉलिश करने की मशीन, घिसाई के पत्थर, ब्रश और दूसरे औजार भी मिले हैं. इससे संकेत मिलता है कि सिक्कों की फिनिशिंग का काम भी उसी सेटअप में किया जाता था. रेती, हथौड़े, आरी, रिंच, शिकंजा, प्लास और पेचकश जैसे उपकरण भी बरामद हुए हैं. इनका इस्तेमाल पूरे सेटअप को संचालित करने और डाई तथा मशीनों से जुड़े काम में किया जाता था.