40 दिन पहले एक मां की दुनिया उजड़ गई थी. डेढ़ साल का आरव अब सिर्फ तस्वीरों और यादों में है. जिला अदालत ने उसके हत्यारे को मौत की सजा सुना दी. इस फैसले के बाद भी मां की आंखों से आंसू नहीं रुके. उसने कहा- मुझे इंसाफ मिला है, लेकिन मेरा बच्चा तो लौटकर नहीं आएगा. रति शर्मा की आवाज में एक मां का दर्द, न्याय मिलने की राहत और बेटे की कमी का ऐसा खालीपन है, जिसे कोई नहीं सकता.
'मेरा बच्चा वापस तो नहीं आएगा...' इतना कहते ही रति शर्मा की आंखें भर आती हैं. शब्द गले में अटक जाते हैं. 40 दिन पहले जिस मां की गोद से उसका डेढ़ साल का बेटा छिन गया था, उसके लिए अदालत का फैसला राहत तो है, लेकिन जिंदगी पहले जैसी नहीं हो सकती.
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फिरोजाबाद के जिला एवं सत्र न्यायालय ने डेढ़ साल के आरव की हत्या के मामले में आरोपी विराज उर्फ जितेंद्र पाठक को मौत की सजा सुनाई है. वहीं आरव की मां रति शर्मा अपने उस मासूम बेटे को याद कर फफक पड़ीं, जिसकी किलकारी अब कभी सुनाई नहीं देगी.
उन्होंने कहा कि उन्हें पुलिस, प्रशासन और अदालत पर भरोसा था और आज उन्हें न्याय मिला है. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने एक ऐसी बात कही, जिसने सुनने वालों को भी भावुक कर दिया. रति शर्मा ने कहा कि अब उसे जल्द से जल्द फांसी हो जाए. जैसे मैं अपने बच्चों के लिए तड़प रही हूं, वैसे ही उसकी मां भी तड़पे.

यह उस मां का दर्द था, जिसने अपने जिगर के टुकड़े को खो दिया. वह जानती हैं कि उनका बेटा किसी भी सजा से वापस नहीं आएगा, लेकिन उनका कहना है कि जिसने उनका संसार उजाड़ा, उसके परिवार को भी उस दर्द का एहसास हो, जो वह हर दिन जी रही हैं.
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रति शर्मा ने कहा कि जिला अदालत ने बहुत कम समय में फैसला सुनाकर यह भरोसा जगाया है कि न्याय मिल सकता है. अब उन्हें उम्मीद है कि हाईकोर्ट में भी यही फैसला बरकरार रहेगा और कानूनी प्रक्रिया जल्द पूरी होगी. उन्होंने उन सभी पुलिस अधिकारियों, सरकारी वकीलों और गवाहों का भी धन्यवाद किया, जिन्होंने इस केस में भूमिका निभाई.
रति कहती हैं कि उनके बेटे के मामले में 40 दिन में फैसला आया. वह चाहती हैं कि दूसरे पीड़ित परिवारों को भी वर्षों तक अदालतों के चक्कर न लगाने पड़ें. गंभीर अपराधों में समय पर न्याय मिलना चाहिए, ताकि पीड़ितों का भरोसा व्यवस्था पर बना रहे.

रति शर्मा का दर्द साफ कहता है कि लोगों के लिए 40 दिन बीत गए होंगे, लेकिन उनके लिए हर दिन एक उम्र की तरह गुजरा है. अदालत में तारीखें बदलती रहीं, गवाह आते रहे, बहस होती रही, लेकिन घर लौटने पर हर दिन उन्हें अपने बेटे की कमी पहले से ज्यादा महसूस होती थी. उनके मुताबिक, न्याय मिलने की उम्मीद ने उन्हें हिम्मत जरूर दी, लेकिन बेटे की याद ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा.
इस फैसले के बाद रति के मायके वाले गांव बामई में लोगों का कहना था कि अदालत से न्याय मिला है. उम्मीद है कि आगे की कानूनी प्रक्रिया में भी यही निर्णय कायम रहेगा. इस पूरे मामले में सबसे भारी आवाज उस मां की है, जो आज भी अपने डेढ़ साल के बेटे के खिलौनों को देखकर टूट जाती होगी. वह मां, जिसके घर में अब भी वह कोना खाली होगा, जहां कभी आरव खेला करता था. वह मां, जिसे इंसाफ तो मिल गया, लेकिन उसकी गोद हमेशा के लिए सूनी हो गई. रति शर्मा की जुबान पर ये बात आती है- 'मेरा आरव तो अब कभी वापस नहीं आएगा...' क्योंकि एक मां की जिंदगी में जो खालीपन आ गया है, उसे कोई भी नहीं भर सकता.