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पिता ने रिक्शा चलाकर बेटे को डॉक्टर बनाया, किस्मत ने एक पल में छीन लिया सब कुछ

जौनपुर के गरीब परिवार से आने वाले डॉ. विनोद कुमार की संघर्ष भरी कहानी हर किसी को भावुक कर रही है. पिता ने रिक्शा चलाकर और भाइयों ने मजदूरी कर उन्हें डॉक्टर बनाया. KGMU से MBBS करने के बाद वह GSVM मेडिकल कॉलेज में जूनियर रेजिडेंट बने, लेकिन अचानक हुई मौत ने परिवार के सारे सपने तोड़ दिए. पूरे गांव और मेडिकल कॉलेज में शोक का माहौल है.

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डॉ विनोद बिन्द की मेडकल कॉलेज में मरीजों का इलाज करते समय हार्ट अटैक से मौत हो गई (Photo: ITG)
डॉ विनोद बिन्द की मेडकल कॉलेज में मरीजों का इलाज करते समय हार्ट अटैक से मौत हो गई (Photo: ITG)

एक पिता के लिए इससे बड़ी खुशी क्या हो सकती है कि उसका बेटा डॉक्टर बन जाए. जौनपुर के एक गरीब परिवार ने भी यही सपना देखा था. पिता ने रिक्शा चलाया, बड़े भाइयों ने मजदूरी की, परिवार ने अपनी जरूरतों को पीछे रखा और बेटे की पढ़ाई को सबसे ऊपर रखा. वर्षों की मेहनत रंग लाई और बेटा डॉक्टर बन गया. लेकिन जब परिवार को लगा कि अब संघर्ष के दिन खत्म हो जाएंगे, तभी एक ऐसा हादसा हुआ जिसने पूरे घर को गहरे अंधेरे में धकेल दिया.

जौनपुर जिले की शाहगंज तहसील के पक्खनपुर गांव निवासी डॉ. विनोद कुमार अब इस दुनिया में नहीं हैं. मरीजों को देखते समय ही आए हार्टअटैक से उनकी जान चली गई. इस मौत ने न सिर्फ उनके परिवार, बल्कि कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों और छात्रों को भी गमगीन कर दिया है. हर कोई यही कह रहा है कि जिसने दूसरों की जिंदगी बचाने की शपथ ली, वह खुद जिंदगी की जंग हार गया.

गरीबी के बीच पला एक सपना

डॉ. विनोद की सफलता के पीछे किसी कोचिंग का बड़ा नाम या आर्थिक संपन्नता नहीं थी. उनके पीछे था परिवार का संघर्ष. पिता दूधनाथ ने वर्षों तक रिक्शा चलाकर परिवार का खर्च उठाया. बड़े भाई गुलाब और दिनेश ने कभी जीप चलाई, कभी ट्रैक्टर चलाया और जो भी काम मिला, वह किया ताकि छोटे भाई की पढ़ाई बीच में न रुके. घर की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि मेडिकल की पढ़ाई का खर्च आसानी से उठाया जा सके, लेकिन परिवार ने कभी हार नहीं मानी. पिता का एक ही सपना था उनका बेटा सफेद कोट पहनकर डॉक्टर बने.

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मेहनत रंग लाई, KGMU से बने डॉक्टर

विनोद ने कठिन मेहनत के दम पर किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU), लखनऊ में एमबीबीएस में प्रवेश हासिल किया. मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका चयन कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में ऑर्थोपेडिक्स (हड्डी रोग) विभाग में जूनियर रेजिडेंट के रूप में हुआ. 15 जनवरी 2025 को उन्होंने यहां अपनी जिम्मेदारी संभाली. परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं था. गांव में भी लोग गर्व से कहते थे कि उनके गांव का बेटा डॉक्टर बन गया.

अब माता-पिता के अच्छे दिन आने वाले थे

बड़े भाई गुलाब बताते हैं कि विनोद हमेशा कहते थे कि सबसे पहले माता-पिता की जिंदगी आसान बनानी है. उन्होंने परिवार से वादा किया था कि जल्द ही पक्का मकान बनवाएंगे. पिता को अब रिक्शा नहीं चलाना पड़ेगा और भाइयों को भी कठिन मजदूरी नहीं करनी होगी. परिवार धीरे-धीरे बेहतर भविष्य के सपने बुन रहा था. लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था.

चार महीने पहले भी उठा था दर्द 

डॉ. विनोद को करीब चार महीने पहले सीने में दर्द की शिकायत हुई थी. उन्होंने कार्डियोलॉजी विभाग में जांच कराई. शुरुआती जांच सामान्य बताई गई. इसके बाद उन्होंने अपनी व्यस्त दिनचर्या जारी रखी और मरीजों के इलाज में लगे रहे. हालांकि, दर्द पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. बाद में जब फिर जांच हुई तो पता चला कि उनके हृदय की प्रमुख धमनी में गंभीर ब्लॉकेज है. इलाज शुरू हुआ, लेकिन तब तक स्थिति काफी बिगड़ चुकी थी.

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मरीजों की सेवा में कभी नहीं की लापरवाही

जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर बताते हैं कि डॉ. विनोद बेहद शांत, विनम्र और मेहनती चिकित्सक थे. उनकी पहली प्राथमिकता हमेशा मरीज होते थे. कई बार वह अपनी तकलीफ को नजरअंदाज कर मरीजों की सेवा में लगे रहते थे. कॉलेज के जूनियर डॉक्टरों का कहना है कि विनोद हमेशा मुस्कुराकर सभी की मदद करते थे. किसी मरीज को कभी यह महसूस नहीं होने देते थे कि वह परेशान हैं.

पूरा गांव शोक में डूबा

डॉ. विनोद के निधन की खबर जैसे ही उनके गांव पहुंची, पूरा इलाका शोक में डूब गया. जिन लोगों ने उन्हें बचपन से संघर्ष करते देखा था, उनकी आंखें नम हो गईं. गांव वालों का कहना है कि विनोद केवल अपने परिवार का नहीं, बल्कि पूरे गांव का सपना थे. उनकी सफलता ने कई गरीब परिवारों के बच्चों को डॉक्टर बनने का हौसला दिया था. जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में डॉ. विनोद के निधन के बाद शोक का माहौल है. साथी डॉक्टरों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी. कई जूनियर डॉक्टर भावुक हो गए. सभी का कहना था कि उन्होंने एक अच्छे डॉक्टर के साथ-साथ एक अच्छे इंसान को खो दिया है.

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