
भारत में देर रात तक ऑफिस कॉल, वीकेंड पर भी काम और छुट्टी के दिन मैसेज का जवाब देना, डेडलाइन, टॉरगेट और जॉब जाने का डर... ये सब बातें भारत के वर्क कल्चर में आता है. एक कॉरपोरेट में काम करने वाला इंसान हर दिन उसी से जुझता है और ये मान कर बैठा है जॉब का मतलब यही है. लेकिन सवाल है क्या दुनिया के हर देश में में ऐसा होता है.
लिक्ंडिन पर डॉक्टर रितेश मलिक की एक पोस्ट ने इसी सवाल पर नई बहस शुरू कर दी है. उन्होंने एक भारतीय कर्मचारी का अनुभव साझा किया, जो नौकरी के लिए नॉर्वे गया था.
'7.5 घंटे काम... फिर समझ नहीं आया क्या करें'
पोस्ट के मुताबिक, नॉर्वे पहुंचने पर उस कर्मचारी को रोज सिर्फ 7.5 घंटे काम करना होता था. काम खत्म होने के बाद उसके पास इतना समय बचता था कि उसे समझ ही नहीं आया कि बाकी दिन कैसे बिताए.रितेश मलिक ने लिखा कि उस कर्मचारी ने कहा कि वे लोग जिंदगी जी रहे हैं, जबकि हम सिर्फ जिंदगी काट रहे हैं. यही बात सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई.
'न बॉस को Sir, न रात 10 बजे मैसेज'
पोस्ट में नॉर्वे के ऑफिस कल्चर का भी जिक्र किया गया. उनके मुताबिक वहां न तो हर किसी को 'सर' कहने का दबाव है, न रात 10 बजे ऑफिस मैसेज आने की उम्मीद. मैनेजर यह नहीं मानते कि देर तक ऑनलाइन रहने वाला कर्मचारी ही सबसे समर्पित होता है. सबसे बड़ी बात, वहां वीकेंड वास्तव में छुट्टी का दिन होता है.

भारत में कैसे बना 'बर्नआउट कल्चर'?
रितेश मलिक का मानना है कि भारत में जरूरत से ज्यादा काम करने की संस्कृति अचानक नहीं बनी.उन्होंने लिखा कि यहां बहुत ज्यादा लोग सीमित अवसरों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं. ऐसे में दूसरों से ज्यादा मेहनत करना ही खुद को साबित करने का तरीका बन गया. धीरे-धीरे थककर काम करना ही जुनून की पहचान मान लिया गया. उन्होंने यह भी कहा कि नॉर्वे की प्रोडेक्टिविटी कम घंटे काम करने की वजह से नहीं, बल्कि काम के दौरान पूरी एकाग्रता से काम करने की वजह से है.
पोस्ट पर हजारों लोगों ने अपनी राय दी.
ऑस्ट्रेलिया में काम करने वाले एक यूजर ने लिखा कि वहां पहुंचने के बाद उन्हें अपने मैनेजर से पहली सलाह मिली थी कि इतनी तेजी से काम मत करो. यहां काम का तरीका अलग है.
वहीं दूसरे यूजर ने इस तुलना से असहमति जताई. उनका कहना था कि नॉर्वे और भारत की परिस्थितियां पूरी तरह अलग हैं, इसलिए दोनों देशों की सीधी तुलना करना सही नहीं होगा.
एक अन्य यूजर ने लिखा कि भारत में बदलाव तब आएगा, जब कंपनियां कर्मचारियों से जरूरत से ज्यादा काम कराने पर जवाबदेह होंगी.
कुछ लोगों ने हाल के वर्षों में 70 घंटे और 90 घंटे काम करने को लेकर हुई चर्चाओं का भी जिक्र किया और कहा कि बदलाव की शुरुआत शीर्ष नेतृत्व से होनी चाहिए.
देखें पोस्ट
बहस सिर्फ घंटों की नहीं, सोच की भी है
यह पोस्ट सिर्फ भारत और नॉर्वे की तुलना तक सीमित नहीं रही. इसने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या ज्यादा घंटे काम करना ही सफलता की निशानी है, या फिर काम और निजी जिंदगी के बीच संतुलन ही असली सफलता है?
यही सवाल अब सोशल मीडिया पर हजारों लोग अपने-अपने अनुभवों के साथ पूछ रहे हैं.
क्या कहते हैं आंकड़े?
वर्क-लाइफ बैलेंस पर काम करने वाले कई अंतरराष्ट्रीय सर्वे बताते हैं कि नॉर्डिक देशों (जैसे नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क और फिनलैंड) को दुनिया के सबसे बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस वाले देशों में गिना जाता है. वहीं भारत में लंबे काम के घंटे और बर्नआउट को लेकर अक्सर बहस होती रहती है.
क्या ऑफिस का काम सिर्फ ऑफिस तक सीमित रहना चाहिए? क्या रात 10 बजे आने वाले ऑफिस मैसेज का जवाब देना प्रोफेशनलिज्म है या वर्क-लाइफ बैलेंस की कमी? क्या भारत में भी कर्मचारियों को तय समय के बाद पूरी तरह 'ऑफलाइन' रहने का अधिकार मिलना चाहिए? इन्हीं सवालों पर सोशल मीडिया दो हिस्सों में बंटा हुआ है.
आखिर भारत में लंबे समय तक काम करने की संस्कृति क्यों है?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में लंबे काम के घंटे किसी एक वजह से नहीं, बल्कि कई सामाजिक और आर्थिक कारणों से जुड़े हैं.
सबसे बड़ा कारण है कड़ी प्रतिस्पर्धा. बड़ी आबादी और सीमित अवसरों के बीच कई कर्मचारियों को लगता है कि अगर वे दूसरों से ज्यादा मेहनत नहीं करेंगे, तो आगे निकलना मुश्किल होगा.
दूसरा कारण है कॉर्पोरेट संस्कृति. कई कंपनियों में देर तक ऑफिस में रुकना या देर रात तक ऑनलाइन रहना समर्पण का प्रतीक माना जाता है. कई एम्प्लॉयी यह महसूस करते हैं कि अगर वे हर समय उपलब्ध नहीं दिखेंगे, तो उनके प्रदर्शन पर असर पड़ सकता है.
तीसरा कारण है स्टार्टअप कल्चर. पिछले कुछ सालों में भारत के कई स्टार्टअप्स में तेज़ी से काम करने और लंबे घंटों तक काम करने को सफलता की कीमत के रूप में पेश किया गया. इसी दौरान 70 घंटे और 90 घंटे काम करने को लेकर भी सार्वजनिक बहस छिड़ी.
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि भारत जैसे तेजी से बढ़ते देश में सभी क्षेत्रों की कार्य संस्कृति एक जैसी नहीं है. आईटी, हेल्थकेयर, मीडिया, मैन्युफैक्चरिंग और आपातकालीन सेवाओं जैसे कई सेक्टरों में काम की प्रकृति ही ऐसी होती है कि कर्मचारियों को कभी-कभी तय समय से अधिक काम करना पड़ता है.
हालांकि, कार्यस्थल विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक काम करना हमेशा ज्यादा उत्पादक होने का संकेत नहीं होता.