चेरापूंजी (Cherrapunji), जिसे सोहरा भी कहा जाता है मेघालय के ईस्ट खासी हिल्स जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण कस्बा है. इसे प्रशासनिक रूप से सब-डिविजनल टाउन के रूप में जाना जाता है. चेरापूंजी खासी समुदाय के पारंपरिक क्षेत्र और उनके ऐतिहासिक राज्य का प्रमुख केंद्र रहा है. वर्तमान समय में इस स्थान का आधिकारिक नाम फिर से सोहरा किया गया है.
चेरापूंजी का मूल नाम खासी भाषा का शब्द है. ब्रिटिश शासन के दौरान स्थानीय नाम सोहरा का उच्चारण सही तरीके से नहीं किया जा सका और इसे चेरा कहा जाने लगा. बाद में मैदानी इलाकों से आए लोगों द्वारा इसके साथ पंजे शब्द जोड़ा गया. पंजे बंगाली भाषा से जुड़ा शब्द है, जिसका अर्थ गांवों का समूह बताया जाता है. इसी तरह समय के साथ यह नाम चेरापूंजी के रूप में प्रचलित हो गया. कुछ जगहों पर चेरापूंजी नाम का अर्थ संतरे की भूमि भी बताया जाता है.
चेरापूंजी में रहने वाले खासी लोगों का इतिहास कम से कम 16वीं शताब्दी के शुरुआती दौर तक माना जाता है. 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच खासी पहाड़ियों में अलग-अलग खासी प्रमुखों का शासन रहा. इन्हें सिएम कहा जाता था. चेरापूंजी भी खासी राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण केंद्र था.
खासी समाज की सामाजिक व्यवस्था मातृवंशीय परंपरा पर आधारित रही है. इसमें परिवार और वंश की पहचान में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. खासी समुदाय की यह सामाजिक व्यवस्था आज भी उसकी पहचान का एक प्रमुख हिस्सा मानी जाती है.
1833 में खासी पहाड़ियां ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आ गईं. इस दौरान महत्वपूर्ण खासी सिएम तिरोत सिंग सिएम ने ब्रिटिश सत्ता के सामने आत्मसमर्पण किया. सोहरा में ब्रिटिश काल से जुड़े कुछ ऐतिहासिक स्थल भी मौजूद हैं. यहां ब्रिटिश प्रशासक डेविड स्कॉट से जुड़ा एक स्मारक स्थानीय कब्रिस्तान में स्थित है.
चेरापूंजी का नाम सबसे अधिक वर्षा के कारण भी चर्चा में रहा है. एक समय इसे दुनिया का सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान माना जाता था. वर्तमान में पास का मौसिनराम इस मामले में आगे है. हालांकि चेरापूंजी में अब भी अत्यधिक वर्षा से जुड़े पुराने रिकॉर्ड दर्ज हैं. जुलाई 1861 में यहां लगभग 9,300 मिलीमीटर वर्षा हुई थी. अगस्त 1860 से जुलाई 1861 के बीच करीब 26,461 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई थी.
अधिक वर्षा के बावजूद चेरापूंजी में पानी की कमी एक महत्वपूर्ण समस्या रही है. तेज बारिश के कारण पानी लंबे समय तक जमीन में नहीं टिक पाता और मिट्टी का कटाव भी होता है. जंगलों में कमी और मानवीय गतिविधियों ने इस समस्या को प्रभावित किया है. पीने के पानी के लिए स्थानीय लोगों को कई बार लंबी दूरी तय करनी पड़ती है. हाल के वर्षों में वर्षा जल संचयन जैसी तकनीकों के इस्तेमाल से पानी की उपलब्धता सुधारने के प्रयास किए गए हैं.
मेघालय के मौसिनराम और चेरापूंजी दुनिया के सबसे गीले स्थान होने के बावजूद सूखे के बढ़ते खतरे का सामना कर रहे हैं. बारिश तेज बौछारों में हो रही है. बरसात के दिन घट रहे हैं. तापमान बढ़ रहा है.