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ड्राइवर सुन नहीं सकता था, पैसेंजर देख नहीं सकती थी, फिर भी Uber राइड हुई पूरी, वायरल हुआ पोस्ट

हर ऐप में ऐक्सेसिब्लिटी फीचर दिया जाता है. फीचर्स खास तौर पर ऐसे लोगों के डिजाइन किया जाता है जो देख नहीं सकते या सुन नहीं सकते. LinkedIn पर एक पोस्ट वायरल हो रहा है जिसमें ऐसी ही एक दिलचस्प राइड के बारे में लिखा है.

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ऐप के Accessibility फीचर्स से डेफ और ब्लाइंड को मिलता है सहारा
ऐप के Accessibility फीचर्स से डेफ और ब्लाइंड को मिलता है सहारा

टेक्नोलॉजी अगर हर प्रोडक्ट में बढ़िया तरीके से यूज किया जाए तो ये ऐसे लोगों के लिए ज्यादा फायदेमंद हो सकता है जो देख, बोल या सुन नहीं सकते हैं. इसका ताजा उदाहरण अभी देखने को मिला है. दिल को छू लेने वाली एक छोटी सी कहानी इस समय सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है. दरअसल एक Uber राइड के दौरान ड्राइवर और पैसेंजर दोनों बोल और सुन नहीं सकते थे. लेकिन फिर भी राइड कंप्लीट हुई.

यह कहानी सिर्फ एक UBER राइड की नहीं है, बल्कि इंसानियत, समझ और टेक्नोलॉजी के सही इस्तेमाल की भी है. LinkedIn पर शेयर किए गए इस पोस्ट ने हजारों लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि डिजिटल दुनिया में भी इंसानी कनेक्शन कितना मजबूत हो सकता है.

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इससे ये भी साफ है कि अगर टेक्नोलॉजी का सही यूज किया जाए तो डिसेब्लिटी के बावजूद इंसान बिना किसी परेशानी के लाइफ बिता सकता है. कहानी की शुरुआत एक नॉर्मल Uber कैब बुकिंग से होती है.

महिला ने राइड बुक की और उन्हें पता चला कि ड्राइवर सुन नहीं सकता. उसी वक्त उन्हें यह भी एहसास हुआ कि वह खुद देख नहीं सकतीं. यानी एक तरफ ड्राइवर डेफ (Deaf) था और दूसरी तरफ पैसेंजर ब्लाइंड (Blind).

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आम तौर पर ऐसी स्थिति में लोग राइड कैंसिल कर सकते थे, लेकिन यहां कहानी ने अलग मोड़ लिया. ये अपने आप में ही काफी हैरान करने वाली बात है. 

OTP से हुई शुरुआत

कैब आई, महिला बैठीं और बिना बोले, बिना सुने, सिर्फ टेक्नोलॉजी और समझ के सहारे दोनों ने सफर शुरू किया. OTP शेयर करना हो या लोकेशन समझाना, सब कुछ फोन और ऐप के जरिए हुआ.

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उन्होंने फोन पर OTP टाइप करके ड्राइवर को दिखाया, जो आज के डिजिटल सिस्टम का एक बेसिक लेकिन जरूरी हिस्सा है. यही छोटा सा फीचर इस पूरी राइड की शुरुआत का कनेक्शन बन गया.

Uber का इन ऐप चैट बना सहारा

यहीं पर टेक्नोलॉजी का असली रोल सामने आता है. आज के कैब ऐप्स सिर्फ राइड बुक करने तक लिमिटेड नहीं हैं. इनमें इन-ऐप चैट, लोकेशन ट्रैकिंग, ऑटोमैटिक नेविगेशन और डिजिटल पेमेंट जैसे फीचर्स होते हैं, जो ऐसे यूजर्स के लिए बेहद जरूरी हो जाते हैं जो सुन या देख नहीं सकते.

इस केस में भी पैसेंजर ने मैसेज करके ड्राइवर को बताया कि उन्हें  नहीं बल्कि सीधे एंट्रेंस पर उतारा जाए. यह एक छोटा सा मैसेज था, लेकिन इसने पूरा एक्सपीरिएंस आसान बना दिया.

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अगर थोड़ा और गहराई से देखें तो आज की टेक्नोलॉजी तेजी से ऐक्सेसिब्लिटी की तरफ बढ़ रही है. स्मार्टफोन्स में स्क्रीन रीडर, वॉयस टाइपिंग, हैप्टिक फीडबैक और हाई कॉन्ट्रास्ट डिस्प्ले फीचर्स होते हैं, जो विजुअली चैलेंज्ड यूजर्स के लिए फोन चलाना आसान बनाते हैं.

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वहीं हिएरिंग लॉस वाले लोगों के लिए रियल टाइम टेक्स्ट कम्यूनिकेशन और विजुअल अलर्ट्स  बहुत काम आते हैं. इस राइड में भले ही ये सारे फीचर्स सीधे नजर न आए हों, लेकिन यही इकोसिस्टम इस पूरे एक्सपीरिएंस को मुमकिन बनाता है.

इतना ही नहीं, अब कई प्लेटफॉर्म AI का इस्तेमाल करके रियल टाइम ट्रांसक्रिप्शन और ट्रांसलेशन पर काम कर रहे हैं. यानी जो बात कोई बोल रहा है, वह तुरंत टेक्स्ट में बदल सकती है. आने वाले समय में ऐसे फीचर्स कैब ऐप्स में और गहराई से शामिल हो सकते हैं, जिससे डेफ और ब्लाइंड यूजर्स के लिए कम्यूनिकेशन और आसान हो जाएगा.

राइड खत्म होने के बाद जो हुआ, उसने इस कहानी को और खास बना दिया. ड्राइवर ने खुद पहल करते हुए एक सिक्योरिटी गार्ड को बुलाया, ताकि पैसेंजर को सही जगह तक पहुंचाया जा सके. यहां टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि इंसानी समझ काम आई. लेकिन टेक्नोलॉजी ने वह बेस तैयार किया, जिस पर यह भरोसा खड़ा हो सका.

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यह कहानी हमें यह समझाती है कि टेक्नोलॉजी का असली मतलब सिर्फ सुविधा नहीं है, बल्कि इन्क्लुसिविटी है. अगर ऐप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म इस तरह डिजाइन किए जाएं कि हर शख्स, चाहे वह किसी भी तरह की चैलेंज का सामना कर रहा हो, उन्हें आसानी से यूज कर सके, तभी टेक्नोलॉजी का पूरा फायदा मिलता है.

सोशल मीडिया पर लोग इस कहानी को सिर्फ एक अच्छा एक्सपीरिएंस नहीं, बल्कि एक सीख के रूप में देख रहे हैं. ऐसे समय में जब टेक्नोलॉजी को लेकर अक्सर डर या दूरी की बात होती है, यह कहानी दिखाती है कि सही इस्तेमाल से यही टेक्नोलॉजी लोगों के बीच दूरी कम भी कर सकती है.

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