'लिटिल मास्टर'. यह सिर्फ एक उपनाम नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट के उस दौर की पहचान है, जब दुनिया के सबसे खतरनाक तेज गेंदबाजों के सामने बिना हेलमेट के खड़े होकर एक बल्लेबाज भारतीय क्रिकेट का सिर ऊंचा करता था. वही सुनील गावस्कर 10 जुलाई को 77 साल के हो गए.
करीब चार दशक पहले उन्होंने बल्ला रख दिया, लेकिन क्रिकेट को कभी नहीं छोड़ा. खिलाड़ी से कमेंटेटर तक का उनका सफर इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि कुछ लोगों के लिए क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि पूरा जीवन होता है.
5 नवंबर 1987. मुंबई का वानखेड़े स्टेडियम. विश्व कप सेमीफाइनल में इंग्लैंड के खिलाफ भारत की हार के साथ एक भारतीय क्रिकेट का स्वर्णिम अध्याय भी समाप्त हो गया. यह सुनील गावस्कर के अंतरराष्ट्रीय करियर का आखिरी मैच साबित हुआ.
हालांकि उन्होंने उसी दिन औपचारिक संन्यास का ऐलान नहीं किया था. वह पहले ही तय कर चुके थे कि 1987 विश्व कप के बाद भारत के लिए नहीं खेलेंगे. शायद तब किसी ने नहीं सोचा था कि 'लिटिल मास्टर' मैदान से जरूर विदा होंगे, लेकिन क्रिकेट से उनका रिश्ता कभी खत्म नहीं होगा.
बल्ला रखा, माइक संभाला... और वही सम्मान बरकरार
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से विदाई के बाद गावस्कर ने खुद को खेल से दूर नहीं किया. उन्होंने कमेंट्री की दुनिया में कदम रखा और देखते ही देखते क्रिकेट की सबसे विश्वसनीय आवाजों में शामिल हो गए.

आज भी जब वह कमेंट्री बॉक्स में बैठते हैं तो उनकी हर टिप्पणी पर क्रिकेट जगत गौर करता है. उनकी राय न सनसनीखेज होती है और न ही पक्षपातपूर्ण. तकनीक, रणनीति और मैच की परिस्थितियों पर उनकी सटीक पकड़ उन्हें बाकी कमेंटेटरों से अलग बनाती है.
77 की उम्र में भी गजब की फिटनेस
उम्र बढ़ती गई, लेकिन उनकी ऊर्जा कम नहीं हुई. लगातार यात्राएं, घंटों की लाइव कमेंट्री और व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद उनकी फिटनेस आज भी मिसाल मानी जाती है. अनुशासित जीवनशैली ने उन्हें इस उम्र में भी उतना ही सक्रिय बनाए रखा है, जितना वह अपने खेल के दिनों में दिखते थे.
कानपुर से शुरू हुई जिंदगी की सबसे खूबसूरत पारी
सुनील गावस्कर की जिंदगी का सबसे खूबसूरत रिश्ता भी क्रिकेट की वजह से ही जुड़ा.
उनकी पत्नी मार्शनील मेहरोत्रा उत्तर प्रदेश के कानपुर के प्रतिष्ठित मेहरोत्रा परिवार से हैं. क्रिकेट के सिलसिले में हुई मुलाकात धीरे-धीरे दोस्ती में बदली और फिर दोस्ती ने प्यार का रूप ले लिया. उस दौर में क्रिकेटरों की निजी जिंदगी आज की तरह सुर्खियों में नहीं रहती थी, इसलिए दोनों ने अपने रिश्ते को बेहद सादगी से आगे बढ़ाया.
परिवारों की सहमति के बाद 23 सितंबर 1974 को दोनों विवाह बंधन में बंध गए. पांच दशक से भी ज्यादा समय बाद भी यह रिश्ता भारतीय क्रिकेट की सबसे सम्मानित जोड़ियों में गिना जाता है. यही वजह है कि कानपुर सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि सुनील गावस्कर की जिंदगी की सबसे खूबसूरत पारी की शुरुआत का गवाह भी है.
ऐसा लगता है, पूरी जिंदगी क्रिकेट को समर्पित कर दी
टेस्ट क्रिकेट में 10,000 रन बनाने वाले दुनिया के पहले बल्लेबाज. 34 टेस्ट शतकों का लंबे समय तक विश्व रिकॉर्ड. भारतीय बल्लेबाजी को नई पहचान देने वाले कप्तान. सफल लेखक. बेबाक क्रिकेट विश्लेषक... और आज भी कमेंट्री बॉक्स की सबसे भरोसेमंद आवाज.
सुनील गावस्कर ने अपनी जिंदगी के हर पड़ाव पर क्रिकेट को ही चुना. यही वजह है कि 39 साल पहले बल्ला रखने के बावजूद वह आज भी भारतीय क्रिकेट की धड़कनों में बसते हैं.
कई खिलाड़ी रिकॉर्ड बनाते हैं, कई ट्रॉफियां जीतते हैं, लेकिन बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो खेल का पर्याय बन जाते हैं. सुनील गावस्कर उन्हीं विरले नामों में शामिल हैं. मैदान से उनकी विदाई हुए 39 साल बीत चुके हैं, लेकिन क्रिकेट आज भी उनके बिना अधूरा लगता है.