
मुझे मालूम है हेडिंग और फोटो देखकर आप इस आर्टिकल तक आ गए हैं. आर्टिकल बॉल ऑफ द सेंचुरी पर है. आपको वो बॉल याद होगी, कभी टीवी पर तो कभी किसी रील में ज़रूर देखी होगी. लेकिन वो मैच, वो तारीख़ और वो पल याद नहीं होगा. लेकिन जिसे क्रिकेट देखने का जुनून नहीं है, वो भी बॉल ऑफ द सेंचुरी को ज़रूर देख-सुन चुका होगा.
वह तारीख थी 4 जून 1993, दिन शुक्रवार. एशेज़ सीरीज का पहला टेस्ट मैच और मैनचेस्टर का ओल्ड ट्रैफर्ड मैदान. इंग्लैंड की पहली पारी का 56वां ओवर फेंकने के लिए ऑस्ट्रेलिया के कप्तान एलन बॉर्डर ने गेंद एक 23 साल के नए लड़के के हाथ में थमाई. सुनहरे बाल, कान में बाली और होठों पर लगी सफेद जिंक क्रीम. नाम था शेन कीथ वॉर्न. वॉर्न इंग्लैंड की धरती पर, एशेज़ जैसे बड़े मंच पर अपने करियर की पहली ही गेंद फेंकने जा रहे थे.
सामने स्ट्राइक पर खड़े थे माइक गेटिंग. वो गेटिंग जिन्हें स्पिन खेलने का उस्ताद माना जाता था. वॉर्न क्रीज पर आए, बेहद छोटे रन-अप से थोड़ा सा तिरछा दौड़ते हुए हाथ घुमाया. गेंद वॉर्न की उंगलियों से छूटी और हवा में तैरती हुई (क्रिकेट की भाषा में ड्रिफ्ट करती हुई) लेग स्टंप से काफी बाहर, करीब दो फीट बाहर जाकर टप्पा खाई.
माइक गेटिंग ने गेंद की लाइन देखी. उन्हें लगा कि लेग स्टंप से इतनी बाहर पिच हुई गेंद को खेलने की कोई जरूरत नहीं है, यह आसानी से पैड्स से टकराकर या पीछे निकल जाएगी. गेटिंग ने बहुत ही इत्मीनान से अपना बल्ला पैड के पीछे छुपा लिया. लेकिन अगले ही पल ओल्ड ट्रैफर्ड में जो हुआ, उसने क्रिकेट के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया.
गेंद ने टप्पा खाने के बाद भौतिक विज्ञान के सारे नियमों को ठेंगा दिखा दिया. वो किसी कोबरा की तरह तेजी से अंदर की तरफ घूमी, गेटिंग के पैड और बल्ले के बीच के मामूली से गैप को चीरती हुई सीधे ऑफ स्टंप की गिल्लियां ले उड़ी.

माइक गेटिंग वहीं जड़ हो गए. उनका मुंह खुला का खुला रह गया. उन्हें समझ ही नहीं आया कि जो गेंद लेग स्टंप के दो फीट बाहर थी, वो ऑफ स्टंप कैसे उड़ा सकती है. गेटिंग ने मुड़कर पहले विकेटकीपर इयान हीली को देखा, फिर अंपायर डिकी बर्ड को देखा. अंपायर डिकी बर्ड भी हैरान थे, उन्होंने बाद में माना था कि उन्हें अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था. गेटिंग का वो अवाक चेहरा आज भी क्रिकेट इतिहास की सबसे आइकोनिक तस्वीरों में से एक है.
शेन वॉर्न सिर्फ एक स्पिनर नहीं थे, वो क्रिकेट की दुनिया के रॉकस्टार थे. जिस दौर में वेस्टइंडीज और ऑस्ट्रेलिया के तेज गेंदबाज अपनी रफ्तार से बल्लेबाजों के जहन में खौफ पैदा करते थे, उस दौर में वॉर्न ने लेग स्पिन जैसी मरती हुई कला को न सिर्फ जिंदा किया, बल्कि उसे सबसे ग्लैमरस बना दिया. वॉर्न का वो वॉक-अप, गेंद फेंकने से पहले का सस्पेंस, बल्लेबाज को अपनी उंगलियों के जाल में फंसाना और विकेट लेने के बाद दोनों हाथ उठाकर जश्न मनाना, एक पूरा थियेटर था. उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में 708 विकेट चटकाए, लेकिन उनकी महानता आंकड़ों से कहीं आगे थी.
फिर साल 2022 के मार्च की वो सुबह आई, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया. थाईलैंड के एक विला से खबर आई कि महज 52 साल की उम्र में शेन वॉर्न का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. कलाई का वो जादूगर चुपचाप विदा हो गया, लेकिन 4 जून की वो दोपहर और वो 'बॉल ऑफ द सेंचुरी' हमेशा के लिए अमर हो गई.
4 जून के बहाने बॉल ऑफ द सेंचुरी याद आई, लेकिन आज जब हम इस तारीख को याद करते हैं, तो खेल के बदलते स्वरूप को देखकर दिल दुखता है. आज स्पिनर्स की बाढ़ है, लेकिन वो 'फन' और वो 'जिगर' गायब है जो वॉर्न के पास था, या मुरलीधरन और बाकी स्पिनर्स का रहता था. आज के स्पिनर्स गेंद को हवा में फ्लाइट देने से डरते हैं. वो गेंद को तैराने के बजाय उसे तेज फेंककर सिर्फ रन रोकने की कोशिश करते हैं. अब स्पिनर विकेट टेकर नहीं, बल्कि टी-20 के इस दौर में रन रोकने वाले 'कंटेनमेंट बॉलर्स' बनकर रह गए हैं.
वैसे यहां पर सिर्फ बॉलर्स को दोष देना भी गलत होगा. आज का क्रिकेट गेंदबाजों के लिए वैसे ही क्रूर बन चुका है. फ्लैट पिचें, छोटी बाउंड्री, भारी-भरकम चौड़े बल्ले और पावरप्ले के कड़े नियमों ने खेल का संतुलन पूरी तरह बल्लेबाजों के पक्ष में झुका दिया है.
अगर आज के दौर में कोई युवा स्पिनर वॉर्न की तरह गेंद को हवा में फ्लाइट देने का जोखिम उठाएगा, तो आधुनिक बल्लेबाजों के पास जो ताकतवर बल्ले हैं, उससे गेंद सीधे बाउंड्री पार स्टैंड्स में दिखाई देगी. गेंदबाजों के मन में बैठे इसी डर ने उनसे वो जादुई ड्रिफ्ट को ख़त्म कर दिया.
इसलिए ऐसा लगता है कि आज के वक्त में 'बॉल ऑफ द सेंचुरी' जैसी किसी गेंद की कल्पना करना भी मुश्किल लगता है. शेन वॉर्न ने जो किया, वो शायद ही कोई कर पाए. क्यूंकि उस जादूगर जैसे जादू के साथ-साथ उस बड़े जिगर की भी जरूरत थी जो छक्का खाने के डर से बेखौफ होकर गेंद को हवा में छोड़ सके. इसलिए शेन वॉर्न की उस गेंद को याद कीजिए और उस जादूगर को दुआएं दीजिए.