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हैप्पी बर्थडे कैप्टन! रजत आए, बैक-टू-बैक ट्रॉफी आई... RCB की किस्मत बदलने वाले कप्तान की कहानी

रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु ने IPL 2026 का खिताब जीतकर लगातार दूसरी बार चैम्पियन बनने का कारनामा किया. 17 साल का इंतजार खत्म करने वाले कप्तान रजत पाटीदार ने एक बार फिर टीम को ट्रॉफी तक पहुंचाकर साबित किया कि RCB की सफलता कोई संयोग नहीं है. विराट कोहली की पसंद माने जाने वाले पाटीदार की कप्तानी में टीम सिर्फ स्टार खिलाड़ियों पर निर्भर नहीं रही, बल्कि कई मैच विनर्स के दम पर एक मजबूत यूनिट बनकर उभरी. यही वजह है कि RCB अब सिर्फ चैम्पियन नहीं, बल्कि एक नई विरासत गढ़ती हुई दिखाई दे रही है.

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17 साल में नहीं हुआ, रजत ने 2 साल में कर दिखाया! (Photo, AFP)
17 साल में नहीं हुआ, रजत ने 2 साल में कर दिखाया! (Photo, AFP)

क्रिकेट में कुछ फैसले ऐसे होते हैं, जिनका असर सिर्फ एक सीजन तक नहीं रहता. वे किसी टीम की पूरी दिशा बदल देते हैं. रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के लिए रजत पाटीदार को कप्तान बनाना शायद ऐसा ही फैसला साबित हुआ है.

संयोग भी ऐसा, जिसे क्रिकेट फैन्स लंबे समय तक याद रखेंगे. जिस कप्तान ने RCB को लगातार दो ट्रॉफियां दिलाकर फ्रेंचाइजी के इतिहास की दिशा बदल दी, उसी रजत पाटीदार का आज जन्मदिन है. 1 जून 1993 को मध्य प्रदेश के इंदौर में जन्मे रजत आज 33 साल के हो गए हैं. 

कभी ट्रॉफी के लिए तरसने वाली RCB आज लगातार दो बार आईपीएल चैम्पियन बन चुकी है. 17 साल तक जिस फ्रेंचाइजी के साथ 'इस बार नहीं तो अगली बार' का टैग जुड़ा रहा, वही टीम अब बैक-टू-बैक खिताब जीतकर एक नए युग की शुरुआत कर चुकी है.

यही वजह है कि फैन्स अब मजाक में नहीं, बल्कि गंभीरता से कह रहे हैं-  'ये रजत नहीं, RCB का राजयोग है.'

17 साल में नहीं हुआ, दो साल में हो गया

आईपीएल की शुरुआत 2008 में हुई थी. RCB ने कई दिग्गज खिलाड़ियों को देखा. बड़े-बड़े सुपरस्टार आए और गए. टीम तीन बार फाइनल में पहुंची, लेकिन हर बार ट्रॉफी हाथ से फिसल गई.

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फिर कप्तानी की जिम्मेदारी रजत पाटीदार को मिली.

नतीजा? पहले सीजन में RCB ने अपना 17 साल पुराना सूखा खत्म किया. दूसरे सीजन में ट्रॉफी बचाकर दिखा दिया कि पहली जीत कोई तुक्का नहीं थी.

यही वह मोड़ है जहां कप्तानी और किस्मत का रिश्ता चर्चा में आता है.

क्या सच में लकी हैं रजत?

खेलों में 'लकी' शब्द अक्सर इस्तेमाल होता है, लेकिन लगातार सफलता सिर्फ किस्मत के भरोसे नहीं मिलती.

अगर एक कप्तान के आने के बाद टीम पहली बार चैम्पियन बन जाए तो उसे संयोग कहा जा सकता है. लेकिन अगर वही कप्तान अगले साल भी ट्रॉफी उठाए तो कहानी बदल जाती है.

रजत पाटीदार के दौर में RCB की सबसे बड़ी ताकत उसका संतुलन बनकर उभरी. टीम किसी एक खिलाड़ी पर निर्भर नहीं दिखी. कभी बल्लेबाज मैच जिताते रहे, कभी गेंदबाज और कभी फील्डिंग ने बाजी पलट दी.

यानी किस्मत ने दरवाजा जरूर खोला होगा, लेकिन अंदर जाने का रास्ता टीम ने खुद बनाया.

विराट का सपना, रजत का दौर

RCB की कहानी विराट कोहली के बिना पूरी नहीं हो सकती. उन्होंने इस फ्रेंचाइजी को पहचान दी, फैनबेस दिया और एक ऐसी संस्कृति दी जिसमें जीत की भूख हमेशा बनी रही.

लेकिन खेल का सबसे बड़ा सच यही है कि हर विरासत को आगे बढ़ाने के लिए नए चेहरों की जरूरत होती है. रजत पाटीदार वही चेहरा बनकर उभरे हैं.

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इंदौर की गलियों से निकलकर IPL की सबसे चर्चित फ्रेंचाइजी का नेतृत्व करना और फिर उसे लगातार दो खिताब दिलाना किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है.

रजत पाटीदार की कहानी इसलिए खास नहीं है कि उन्होंने RCB को दो ट्रॉफियां दिलाईं. कहानी इसलिए बड़ी है क्योंकि उन्होंने वहां सफलता हासिल की, जहां उनसे पहले कई दिग्गज ऐसा नहीं कर सके. RCB के ड्रेसिंग रूम में कभी विराट कोहली, एबी डिविलियर्स, क्रिस गेल और फाफ डुप्लेसी जैसे बड़े नाम रहे, लेकिन ट्रॉफी हमेशा दूर रही. 

फिर कप्तानी एक ऐसे खिलाड़ी के हाथ में आई, जो न भारतीय टीम का नियमित चेहरा था और न ही लीग का सबसे बड़ा सुपरस्टार. मध्य प्रदेश के लिए क्रिकेट खेलने वाला यह बल्लेबाज देखते ही देखते उस फ्रेंचाइजी का चेहरा बन गया, जिसके करोड़ों फैन्स वर्षों से एक खिताब का इंतजार कर रहे थे. रजत ने सिर्फ ट्रॉफी नहीं जीती, उन्होंने RCB के साथ जुड़ी 'चोकर्स' वाली छवि को भी बदल दिया. यही वजह है कि उनकी कहानी किसी खिलाड़ी की सफलता भर नहीं, बल्कि एक फ्रेंचाइजी की किस्मत बदलने की कहानी बन गई है.

दूसरी ट्रॉफी ने बदल दी बहस

पहली ट्रॉफी के बाद चर्चा थी कि RCB आखिरकार चैम्पियन बन गई. दूसरी ट्रॉफी के बाद चर्चा बदल गई है. अब सवाल यह नहीं है कि RCB ट्रॉफी जीत सकती है या नहीं. अब सवाल यह है कि RCB का यह दबदबा कितने साल तक चलेगा.

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क्योंकि इतिहास गवाह है कि एक बार की जीत खुशी देती है, लेकिन लगातार जीत एक साम्राज्य खड़ा करती है.

RCB को मिल गया अपना स्वर्णिम अध्याय

हर बड़ी फ्रेंचाइजी का एक ऐसा दौर होता है जिसे उसके स्वर्णिम युग के रूप में याद किया जाता है. चेन्नई के लिए वह दौर महेंद्र सिंह धोनी के नाम रहा. मुंबई इंडियंस के लिए रोहित शर्मा का... और अब RCB के लिए रजत पाटीदार का दौर उसी दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है.

यह सिर्फ दो ट्रॉफियों की कहानी नहीं है. यह उस मानसिकता के बदलने की कहानी है जिसने हार को आदत और जीत को सपना मान लिया था.

आज RCB के पास ट्रॉफी भी है, आत्मविश्वास भी है और एक ऐसा कप्तान भी, जिसके नाम के साथ फैन्स एक नया शब्द जोड़ चुके हैं -

रजत नहीं... RCB का राजयोग!

क्योंकि कुछ कप्तान मैच जीतते हैं, कुछ ट्रॉफियां जीतते हैं... और कुछ कप्तान पूरी फ्रेंचाइजी की किस्मत बदल देते हैं. रजत पाटीदार फिलहाल उसी श्रेणी में दिखाई दे रहे हैं.

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