कोल्ड वॉर के समय अमेरिका ने ग्रीनलैंड की बर्फ के नीचे एक टॉप सीक्रेट बेस बनाया था, जिसका नाम कैम्प सेंचुरी था. यह बेस 1950 के दशक के अंत में बनाया गया था. इसका असली मकसद सोवियत यूनियन पर न्यूक्लियर मिसाइलों से हमला करने की तैयारी थी.
अब क्लाइमेट चेंज की वजह से बर्फ पिघल रही है, जिससे यह बेस और उसका जहरीला कचरा बाहर आ सकता है. अमेरिकी सेना की डीक्लासिफाइड फिल्म भी इसकी कहानी बयान करता है. जो आप यहां ठीक नीचे देख सकते हैं.
कैम्प सेंचुरी क्या था?
कैम्प सेंचुरी अमेरिकी आर्मी का सीक्रेट बेस था, जो ग्रीनलैंड के सेंट्रल इलाके में बर्फ की चादर के नीचे बनाया गया था. यह 1959 में शुरू हुआ था. 1960 में पूरा हुआ. बेस की गहराई 8 मीटर थी. इसमें 3 km लंबी सुरंगों का नेटवर्क था. इसमें लैबोरेटरी, अस्पताल, दुकान, सिनेमा हॉल, चर्च और 200 सैनिकों के रहने की जगह थी. बेस को पावर देने के लिए दुनिया के पहले मोबाइल न्यूक्लियर जेनरेटर इस्तेमाल किया था, जिसे PM-2A कहा जाता था.
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यह बेस आर्कटिक इलाके में निर्माण की टेस्टिंग और रिसर्च के लिए बनाया गया था. यहां के वैज्ञानिकों ने पहली बार आइस कोर सैंपल निकाले, जो आज भी क्लाइमेट स्टडीज में इस्तेमाल होते हैं. लेकिन असल में यह एक बड़ा राज था – यह प्रोजेक्ट आइसवर्म (Project Iceworm) का हिस्सा था.
प्रोजेक्ट आइसवर्म: न्यूक्लियर मिसाइलों का सीक्रेट प्लान
कोल्ड वॉर के दौरान अमेरिका और सोवियत यूनियन के बीच टेंशन बहुत ज्यादा थी. अमेरिका चाहता था कि मॉस्को पर सीधे हमला करने के लिए मिसाइलें करीब हों. इसलिए 1960 में प्रोजेक्ट आइसवर्म शुरू हुआ.
प्लान था कि ग्रीनलैंड की बर्फ के नीचे 4000 km लंबी सुरंगों का नेटवर्क बनाया जाए, जहां 600 न्यूक्लियर मिसाइलें छिपाई जाएं. ये मिसाइलें मोबाइल होतीं, मतलब उन्हें बर्फ के नीचे इधर-उधर घुमाया जा सकता था.

कैम्प सेंचुरी को इस प्रोजेक्ट का कवर बनाया गया था. यानी दिखावा. लेकिन बर्फ की अस्थिरता की वजह से सुरंगें टूटने लगीं. 1966 में प्रोजेक्ट रद्द कर दिया गया. अमेरिका ने यह सब डेनमार्क सरकार से छिपाकर किया. ग्रीनलैंड उस समय डेनमार्क का हिस्सा था और वहां न्यूक्लियर हथियार रखना गैरकानूनी था.
निर्माण की कहानी: डीक्लासिफाइड अमेरिकी आर्मी फिल्म
अमेरिकी आर्मी ने कैम्प सेंचुरी के निर्माण की एक फिल्म बनाई थी, जो अब डीक्लासिफाइड हो चुकी है. यह फिल्म बर्फ के नीचे न्यूक्लियर पावर से बेस बनाने की प्रक्रिया दिखाती है. फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे इंजीनियरों ने बर्फ काटकर सुरंगें बनाईं. बेस को नाम दिया गया - सिटी अंडर द आइस. यह 1960 के दशक की शुरुआत में रिलीज हुई, लेकिन असली मकसद छिपा रहा. अब यह यूट्यूब पर उपलब्ध है.
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बेस का बंद होना और कचरा का खतरा
1964 तक बेस का इस्तेमाल कम हो गया. 1967 में इसे पूरी तरह छोड़ दिया गया. सैनिक न्यूक्लियर जेनरेटर का रिएक्शन चैंबर ले गए, लेकिन बाकी सामान छोड़ दिया. इसमें 2 लाख लीटर डीजल ईंधन, इतनी ही मात्रा में गंदा पानी, रेडियोएक्टिव कूलेंट और PCB जैसे जहरीले केमिकल शामिल थे. अमेरिका को लगा कि बर्फ हमेशा बढ़ती रहेगी और कचरा दबा रहेगा. लेकिन अब जलवायु परिवर्तन की वजह से बर्फ पिघल रही है.

डीक्लासिफिकेशन: राज कैसे खुला?
यह राज दशकों तक छिपा रहा. 1968 में एक अमेरिकी B-52 बॉम्बर ग्रीनलैंड में क्रैश हो गया, जिसमें न्यूक्लियर हथियार थे. इससे जांच शुरू हुई. फिर 1997 में डैनिश फॉरेन पॉलिसी इंस्टीट्यूट (DUPI) की रिपोर्ट से प्रोजेक्ट आइसवर्म का खुलासा हुआ. रिपोर्ट ने पुष्टि की कि अमेरिका ने 1965 तक ग्रीनलैंड में न्यूक्लियर हथियार रखे थे, जो डैनिश नीति यानी डेनमार्क के खिलाफ था.
बर्फ पिघलने से क्या होगा?
2016 में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी कि ग्रीनलैंड की बर्फ पिघलने से कैम्प सेंचुरी 2090 तक बाहर आ सकता है. तापमान बढ़ने से बर्फ की मोटाई कम हो रही है – 2003 से 2010 तक 20वीं सदी से दोगुनी तेजी से पिघली. 2023 में बेस से निकाले गए आइस कोर से पता चला कि अतीत में भी तेज पिघलाव हुआ था, जो समुद्र स्तर बढ़ने का संकेत है.
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2024 में NASA ने रडार से बेस की नई इमेज ली, जो दर्शाती है कि संरचना अभी भी बर्फ में दबी है. अगर कचरा बाहर आया, तो पर्यावरण को नुकसान होगा – रेडियोएक्टिव प्रदूषण फैल सकता है. ग्रीनलैंड के विदेश मंत्री विट्टस क्वाजौकिट्सोक ने कहा कि सफाई की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए.
क्या और राज छिपे हैं?
कैम्प सेंचुरी की कहानी कोल्ड वॉर की सीक्रेट प्लानिंग और आज के पर्यावरण संकट को जोड़ती है. NASA ने इसे रीडिस्कवर किया, लेकिन कई लोग मानते हैं कि और भी राज हैं – जैसे मौसम नियंत्रण के हथियार या बर्फ के नीचे छिपी सिटी. यह हमें सिखाता है कि पुराने राज कैसे नए खतरे पैदा कर सकते हैं. वैज्ञानिक अब बर्फ पिघलाव पर नजर रख रहे हैं, ताकि कोई बड़ा हादसा न हो.