भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चंद्रयान-4 मिशन के लिए चांद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में एक बहुत सुरक्षित लैंडिंग जगह खोज ली है. इस जगह को खोजने के लिए इसरो के स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर (SAC) के वैज्ञानिकों ने चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर से ली गई हाई रिज़ॉल्यूशन तस्वीरों की स्टडी की.
मॉन्स मूटन (Mons Mouton) नाम के पहाड़ के पास 1 वर्ग किलोमीटर का एक पैच सबसे अच्छा बताया गया है. यह भारत का पहला लूनर सैंपल रिटर्न मिशन होगा, यानी चांद से मिट्टी और पत्थर लाकर पृथ्वी पर वापस लाना.
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चंद्रयान-4 मिशन क्या है और क्यों खास?
चंद्रयान-4 इसरो का अब तक का सबसे जटिल चंद्र मिशन होगा. इसमें कई हिस्से होंगे...
मिशन का लक्ष्य: चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग करना. सैंपल इकट्ठा करना. उन्हें चंद्र ऑर्बिट में भेजना और फिर पृथ्वी पर लाना. सफल होने पर भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जो चांद से सैंपल ला चुके हैं जैसे- अमेरिका, रूस और चीन.
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लैंडिंग साइट क्यों इतनी महत्वपूर्ण?
चांद का दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र बहुत खुरदरा है- बड़े-बड़े गड्ढे, पत्थर और ऊंची-नीची जगहें. लैंडर के लिए जरूरी शर्तें...
ढलान 10 डिग्री से कम हो (लैंडर ज्यादा ढलान पर नहीं उतर सकता). पत्थर 0.32 मीटर से छोटे हों. कम से कम 11-12 दिन सूर्य की रोशनी मिले (सोलर पावर के लिए). पृथ्वी से रेडियो संपर्क अच्छा हो. कोई बड़ा खतरा न हो.

अध्ययन कैसे किया गया?
वैज्ञानिक अमिताभ, के सुरेश, अजय के प्रशर, कन्नन वी अय्यर, अब्दुल एस, श्वेता वर्मा त्रिवेदी और नितांत दुबे ने चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर हाई रिज़ॉल्यूशन कैमरा (OHRC) की तस्वीरों का इस्तेमाल किया. ये तस्वीरें 32 सेंटीमीटर रिज़ॉल्यूशन की हैं- यानी बहुत बारीक डिटेल दिखाती हैं.
शुरुआत में कई जगहें चुनी गईं. फिर मॉन्स मूटन के आसपास 5 जोन पर फोकस किया. एक जोन को छोड़ दिया गया क्योंकि वह हमेशा अंधेरे में रहता है. बाकी चार जगहों (MM-1, MM-3, MM-4, MM-5) की तुलना की गई- जिसमें औसत ढलान, ऊंचाई का अंतर और सुरक्षित लैंडिंग ग्रिड (24x24 मीटर के) का ध्यान रखा गया.
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सबसे अच्छी जगह कौन-सी?
MM-4 सबसे आगे निकली.
खतरे का स्तर: सिर्फ 9.89% (सबसे कम). औसत ढलान 5 डिग्री है. सुरक्षित ग्रिड: 568 (सबसे ज्यादा) है. MM-4 में अच्छी रोशनी भी मिलती है.
बाकी जगहें: MM-1 और MM-3: खतरा 12% से ज्यादा. MM-5: सिर्फ 72 सुरक्षित ग्रिड. क्षेत्र की ऊंचाई 4800 से 6100 मीटर तक है.
क्या फायदा?
ये हाई-रिजोल्यूशन तस्वीरें गड्ढों, पत्थरों और ढलानों को बहुत साफ दिखाती हैं. इससे सटीक लैंडिंग का फैसला आसान होता है. अगर लैंडिंग साइट सिलेक्शन कमेटी मंजूरी देती है, तो यही जगह चंद्रयान-4 की लैंडिंग के लिए चुनी जाएगी.
यह अध्ययन दिखाता है कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम कितना आगे बढ़ चुका है. चंद्रयान-4 सफल हुआ तो भारत चांद के रहस्यों को और करीब से समझ सकेगा. दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ भी हो सकती है, जो भविष्य के मिशनों के लिए जरूरी है. इसरो की यह तैयारी भारत को अंतरिक्ष की महाशक्ति बनाने की दिशा में बड़ा कदम है.