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आठ महीने के लंबे मिशन पर अंतरिक्ष रवाना हुए अनिल मेनन, इंसानी शरीर पर माइक्रोग्रैविटी का करेंगे अध्ययन

भारतीय मूल के अंतरिक्ष यात्री अनिल मेनन माइक्रोग्रैविटी में हाई-क्वालिटी सेमीकंडक्टर बनाने के मकसद से किए जाने वाले एक्सपेरिमेंट में भी हिस्सा लेंगे. साइंटिस्ट्स का मानना ​​है कि स्पेस का भारहीन वातावरण ज़्यादा यूनिफॉर्म और बिना किसी खराबी वाले सेमीकंडक्टर मटीरियल बनाने में मदद कर सकता है.

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अनिल मेनन माइक्रोग्रैविटी में कई तरह के रिसर्च करेंगे. (Photo: Screengrab)
अनिल मेनन माइक्रोग्रैविटी में कई तरह के रिसर्च करेंगे. (Photo: Screengrab)

भारतीय मूल के अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री अनिल मेनन आठ महीने के लंबे स्पेस मिशन पर मंगलवार को रवाना हो गए. अनिल मेनन के साथ दो और रूसी अंतरिक्ष यात्री कजाकिस्तान से सोयुज MS-29 स्पेसक्राफ्ट से अंतरिक्ष के लिए रवाना हुए. 

मेनन और रूसी अंतरिक्ष यात्रियों प्योत्र दुब्रोव और अन्ना किकिना को ले जाने वाला रोस्कोस्मोस अंतरिक्ष यान भारतीय समयानुसार रात 8:17 बजे बैकोनूर कॉस्मोड्रोम से रवाना हुआ. 

स्टेशन तक दो-ऑर्बिट और तीन घंटे की यात्रा के बाद, स्पेसक्राफ्ट रात 11:56 बजे (IST) अपने-आप प्रिचल मॉड्यूल से जुड़ जाएगा.

NASA के अनुसार यह मेनन की पहली स्पेसफ़्लाइट है और रूसी अंतरिक्ष यात्रियों के लिए दूसरी उड़ान है.

अनिल मेनन अंतरिक्ष में कई अत्याधुनिक वैज्ञानिक प्रयोग करेंगे, जिनका मकसद भविष्य में डीप स्पेस की खोज के लिए इंसानों को तैयार करना और ऐसी तकनीकों को आगे बढ़ाना है जिनसे पृथ्वी पर जीवन को फ़ायदा हो सके.

इमरजेंसी मेडिसिन और एयरोस्पेस मेडिसिन के विशेषज्ञ डॉक्टर मेनन इस लंबे मिशन के दौरान न सिर्फ़ एक रिसर्चर के तौर पर काम करेंगे, बल्कि एक टेस्ट सब्जेक्ट के तौर पर भी अपनी भूमिका निभाएंगे. टेस्ट सब्जेक्ट यानी कि जिन पर प्रयोग किया जाएगा. 

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अनिल मेनन के रिसर्च में माइक्रोग्रैविटी का इंसान के शरीर पर असर अहम है. इस रिसर्च से इस बारे में अहम डेटा मिलने की उम्मीद है कि लंबे समय तक अंतरिक्ष की यात्रा का इंसानी शरीर पर क्या असर पड़ता है. यह जानकारी तब बहुत काम आएगी जब NASA और उसके अंतरराष्ट्रीय पार्टनर चांद और मंगल पर मिशन की तैयारी करेंगे. इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर रहते हुए अनिल मेनन यह भी देखेंगे कि माइक्रोग्रैविटी का अंतरिक्ष यात्रियों में ब्लड फ़्लो, नसों की बनावट और खून की बनावट पर क्या असर पड़ता है.

वे स्टेशन के पीने के पानी के सिस्टम का इस्तेमाल करके इंट्रावेनस फ़्लूइड (IV फ़्लूइड) बनाने वाली टेक्नोलॉजी को टेस्ट करने में भी मदद करेंगे. ऐसी क्षमताएं डीप-स्पेस मिशन के दौरान बहुत ज़रूरी हो सकती हैं, जहां मेडिकल सप्लाई सीमित होती है.

मेनन सेमीकंडक्टर क्रिस्टल के स्पेस में प्रोडक्शन को बेहतर बनाने के लिए रिसर्च जारी रखेंगे, ताकि हाई-परफ़ॉर्मेंस कंप्यूटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बेहतर मेडिकल डिवाइस के लिए ज़रूरी कंपोनेंट बड़े पैमाने पर बनाए जा सकें.

वे ऑगमेंटेड रियलिटी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तरीकों का इस्तेमाल करके अल्ट्रासाउंड जांच भी करेंगे जिससे भविष्य के स्पेस मिशन में धरती से मेडिकल सपोर्ट की ज़रूरत खत्म हो सकती है. 

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एक और बड़ा एक्सपेरिमेंट स्पेस में बायोप्रिंटिंग पर होगा जिसमें रिसर्चर को उम्मीद है कि माइक्रोग्रैविटी से जटिल बायोलॉजिकल टिश्यू बनाने की प्रक्रिया बेहतर हो सकती है.

इन नतीजों से उम्र बढ़ने की प्रक्रिया के बारे में वैज्ञानिक समझ सहज और आसान हो सकती है और उम्र से जुड़ी बीमारियों और रीजेनरेटिव मेडिसिन के लिए नई थेरेपी विकसित करने में मदद मिल सकती है.

मेनन का खास बैकग्राउंड उन्हें इस मिशन के लिए बहुत उपयुक्त बनाता है. NASA के एस्ट्रोनॉट कॉर्प्स में शामिल होने से पहले, उन्होंने फ्लाइट सर्जन के तौर पर एस्ट्रोनॉट्स और कमर्शियल स्पेस मिशन में मदद की थी, जिसमें उन्होंने इमरजेंसी मेडिसिन की अपनी विशेषज्ञता और एयरोस्पेस मेडिकल के कई सालों के अनुभव का इस्तेमाल किया.

अगले आठ महीनों में उनके मिशन से इकट्ठा किया गया डेटा NASA की उन बड़ी कोशिशों में योगदान देगा जिनका मकसद इंसानी स्पेसफ्लाइट को ज़्यादा सुरक्षित और टिकाऊ बनाना है.

उम्मीद है कि ये नतीजे आर्टेमिस प्रोग्राम के तहत चांद पर भविष्य के मिशन की योजना बनाने और आखिरकार मंगल ग्रह पर इंसानी मिशन भेजने में अहम भूमिका निभाएंगे. 

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