नवरात्र की देवी परंपरा में शामिल देवियां सिर्फ नौ तक ही सीमित नहीं हैं. उनके कई -कई रूप हैं और अलग-अलग इलाकों में उनकी पूजा की जाने की मान्यता भी है. इनमें से कई रूप सरल और सौम्य हैं तो कई बहुत से रूप उग्र भी हैं. इसी तरह रामकथा में भी देवी पार्वती, दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के अलावा एक और देवी का जिक्र होता है. यह देवी काफी भयानक हैं. इनके क्रोध से तीनों लोक कांप उठते हैं.
खास बात है कि रावण और मेघनाद इस देवी की पूजा करते थे. रावण तो वैसे बहुत बड़ा शिवभक्त था और महापंडित भी, लेकिन उसका बेटा मेघनाद इस विधा में उससे भी दो कदम आगे था. मेघनाद बहुत बड़ा तांत्रिक भी था. उसे वशीकरण, सम्मोहन के साथ ही कई तरह की गुप्त विद्याएं भी आती थीं और इसका प्रयोग वह युद्ध में भी करता था. मेघनाद जिनकी पूजा करता था, उनका नाम देवी निकुंभला (निकुंबला) था, और शुक्राचार्य की सहायता से मेघनाद ने निकुंभला साधना को सिद्ध किया था.
देवी निकुंभला कौन हैं?
देवी निकुंभला असल में नरसिंह का ही स्त्री रूप हैं. इन्हें नारसिंही भी कहा जाता है, लेकिन देवी का असल नाम प्रत्यंगिरा है. रावण की कुल देवी भी प्रत्यंगिरा देवी थीं. इनका सिर शेर का और बाकी शरीर नारी का है. प्रत्यंगिरा देवी शक्ति स्वरूपा देवी हैं. यह देवी विष्णु ,शिव, दुर्गा का एकीकृत रूप है.
क्या है देवी की कहानी?
देवी प्रत्यिंगरा का अस्तित्व भक्त प्रह्लाद की कथा से सामने आता है. जब नृसिंह अवतार के बाद भी भगवान विष्णु का क्रोध शांत नहीं हुआ तब शिवजी ने शरभ अवतार लेकर उन्हें नियंत्रित करने की कोशिश की. इससे नृसिंह अवतार विष्णु शरभ अवतार शिव से हारने लगे. इस हार ने उनके गुस्से को और बढ़ा दिया और वह दो मुख वाले गरुड़ अवतार में आ गए, जिसे तंत्र में गंडभेरुंड कहा गया है. गंडभेरुंड और शरभ के बीच चल रही इस लड़ाई से धरती पर असंतुलन शुरू हो गया.
देवी लक्ष्मी कैसे बन गईं देवी प्रत्यंगिरा?
यहीं से शुरुआत हुई एक और नए अवतार की. देवी लक्ष्मी दूर खड़ी यह सब देख रही थीं. देवी लक्ष्मी को पुराणों में माया कहा गया है. पार्वती, दुर्गा, सरस्वती इसी माया के अलग-अलग नाम हैं. बल्कि देवी भागवत पुराण और विष्णु धर्मेत्तर साहित्य ऐसा मानता है कि त्रिदेव भी देवी के ही अधीन हैं. देवी लक्ष्मी ने अपनी आत्मिक तीनों शक्तियों (दुर्गा और सरस्वती) को खुद में समाहित किया.
फिर उन्होंने रुद्र और विष्णु की चेतना शक्ति को भी समाहित किया. ऐसा होते-होते देवी लक्ष्मी का पूरा शरीर अग्नि की तरह दहकने लगा और उनकी मुखाकृति बदलने लगी. पहले वह सौम्य से भयानक हुई और देखते-देखते देवी का चेहरा किसी शेरनी में बदल गया. उनका शरीर स्त्री का रहा, लेकिन हाथ शेर के पंजों की तरह हो गए. पूंछ सर्प की तरह हो गई, पंख गरुड़ की तरह हो गए. वह एक ही बार में नरसिंही, शिवानी, वैष्णवी, रुद्राणी का सम्मिलित अवतार हो गईं.
कैसा है देवी प्रत्यंगिरा का स्वरूप?
देवी के इस स्वरूप के प्रत्यंगिरा कहा गया है. देवी ने इस भयंकर अवतार को धारण करके अपना स्वरूप विस्तार किया और आकाश तक पहुंच गईं. उनका यह अवतार भगवान शिव के शरभ और विष्णुजी के नरसिंह अवतार से ही मिलता-जुलता था, लेकिन इसमें उन दोनों अवतारों (नरसिंह व गंडभेरुंड) की शक्तियां भी समाई हुई थीं. प्रत्यंगिरा देवी का रूप धारण करके देवी लक्ष्मी जो आदिशक्ति भी हैं, शरभ और गंडभेरुंड को नियंत्रित किया.
उन्होंने ऐसी हुंकार भरी कि शरभ और गंडभेरुंड दोनों ही भयभीत हो गए और लड़ना छोड़ दिया. तब देवी ने दोनों को अपने एक-एक हाथ में पकड़ा और धरती पर ले आईं. देवी के संपर्क में आने से शिवजी और विष्णु जी की चेतना वापस आ गई और दोनों ही अपने असली स्वरूप में आ गए. इस प्रकार इन दोनों का युद्ध समाप्त हुआ.
इन्हीं देवी प्रत्यंगिरा की उपासना ब्रह्मा के प्रथम मानस पुत्रों ने की. इस तरह देवी विश्रवाकुल के ब्राह्मणों की पूज्यनीय देवी बन गईं. देवी कालीकुल परंपरा में उग्र देवी के तौर पर शामिल हैं. वह 64 योगिनियों में से भी एक हैं और सप्त भैरवी में भी शामिल हैं.