Vastu Tips: ब्रज यानि कान्हा की नगरी के ज्यादातर प्राचीन, प्रतिष्ठित मंदिर आखिरकार पश्चिम दिशा में ही क्यों स्थापित हैं. श्रीबांके बिहारी, राधा बल्लभजी, रादारमण जी, राधा दामोगर जी जैसे तमाम प्राचीन मंदिर पश्चिम दिशा में है. क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इन मंदिरों की दिशा का रहस्य क्या है. जबकि मंदिर की दिशा तो वास्तु के अनुसार ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) को माना जाता है. आइए विस्तार से जानते हैं.
वास्तु के अनुसार, हर भगवान के लिए अलग-अलग दिशाएं निर्धारित की गई हैं. लेकिन मंदिर की स्थापना के लिए ईशान कोण को सबसे बेहतर माना गया है, जो आपकी बुद्धि का स्थान है. हालांकि पश्चिम दिशा इच्छा पूर्ति की दिशा माना गया है. जहां बैठकर की गई प्रार्थना भगवान अवश्य स्वीकार करते हैं. पश्चिम दिशा आकाश तत्वीय और भगवान विष्णु व न्याय के देवता शनि की दिशा भी है. इसलिए वास्तु में पश्चिम दिशा को मंदिर की स्थापना के लिए श्रेष्ठ दिशा माना गया है. खासतौर से भगवान विष्णु के मंदिर की स्थापना के लिए इसे और भी अच्छा माना जाता है.
ईशान कोण में स्थापित मंदिर आपकी बुद्धि और विवेक को ठीक रखता है. जबकि पश्चिम दिशा में बना मंदिर आपके द्वारा मांगी गई मनोकामनाओं को पूर्ण करता है. लेकिन यहां मनोकामना मांगने के साथ इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि यह न्याय के देवता शनिदेव की भी दिशा है. किसी का अहित करने के लिए या कोई अनैतिक मनोकामना मांगने पर शनिदेव के न्याय के बारे में विचार अवश्य कर लें.
घर की पश्चिम दिशा में भी स्थापित कर सकते हैं मंदिर
आपको अपने घर में मंदिर की स्थापना के लिए यदि ईशान कोण में स्थान नहीं मिल पा रहा तो आप पश्चिम दिशा में भी मंदिर स्थापित कर सकते हैं. इस बात का विशेष ध्यान रखें कि दिशा ठीक पश्चिम ही हो. ईशान कोण में मंदिर नहीं है तो भी इस दिशा को साफ-सुथरा और हल्का रखना बहुत आवश्यक है, जिससे आपकी बुद्धि और विवेक ठीक रहे.