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Premanand Maharaj: प्रेमानंद महाराज से मिलने पहुंचे कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय, सुनाई गिरधर लाल जी के विवाह की अद्भुत लीला

Premanand Maharaj: प्रेमानंद महाराज और कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय के बीच वृंदावन में हुई वार्ता में ठाकुर जी के विवाह की परंपराओं और रस्मों का वर्णन किया गया. आगे महाराज जी ने भक्ति में अपनापन और प्रेम की महत्ता पर जोर दिया, बताया कि भक्ति में नियम से अधिक भाव और प्रेम महत्वपूर्ण है.

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प्रेमानंद महाराज से मिलने पहुंचे कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय (Photo: Screengrab/bhaktimarg_instagram)
प्रेमानंद महाराज से मिलने पहुंचे कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय (Photo: Screengrab/bhaktimarg_instagram)

Premanand Maharaj: प्रेमानंद महाराज वृंदावन के जाने माने संत हैं, जिनके पास लोग दूर दूर से अपनी परेशानियां व दुविधाएं लेकर पहुंचते हैं. इन्हीं परेशानियों का हल खोजने के लिए प्रेमानंद महाराज का एंकातिक वार्तालाप होता है, जहां महाराज जी लोगों का मार्गदर्शन करते हैं. हाल ही में कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय भी प्रेमानंद महाराज से मिलने और उनके दर्शन करने पहुंचे. जहां कथावाचक इंद्रेश ने महाराज की प्रणाम किया और उनका आशीर्वाद लिया. प्रेमानंद महाराज और कथावाचक इंद्रेश के बीच हुई वार्तालाप का वीडियो सोशल मीडिया पर बहुत ही तेजी से वायरल भी हो रहा है. 

कथावाचक इंद्रेश जी ने ठाकुर जी के विवाह के बारे में बताया

प्रेमानंद महाराज कथावाचक इंद्रेश जी से पूछते हैं कि अब राधा गिरधर हो गए? तो इंद्रेश जी हां में उत्तर देते हैं. आगे कहते हैं कि लाल जी तो श्री जी के साथ ही विराजमान हैं. ब्यावला की पूरी जो भी विधि और परंपरा हुई, उसकी व्यवस्था हमारे घर के सेव्य श्री राधा माधव प्रभु के माध्यम से हुई. ये वही ठाकुर जी हैं, जो पिताजी महाराज के गुरुदेव की सेवा में विराजमान हैं. जयमाल, फेरों, हल्दी, मेहंदी और रंगमहल जैसी सभी रस्में उसी परंपरा के अनुसार संपन्न हुईं. हर आयोजन में केंद्र में युगल स्वरूप ही विराजमान रहे और पूरी प्रक्रिया युगल की उपस्थिति में पूर्ण की गई.

ठाकुर जी को पंसद है अपनापन

यह बात सुनकर प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि, 'सबसे जरूरी बात यही है कि हमारा चित्त वहीं जुड़े, जहां अपनापन है. और ठाकुर जी को सबसे ज्यादा जो प्रिय है, वही अपनापन है. केवल क्रिया, जप या तप ही सब कुछ नहीं होता. भजन का भी फल है, तपस्या का भी फल है, लेकिन इन सबसे ऊपर है, प्रियता, यानी अपनेपन का भाव. महान भक्तों के जीवन में यही दिखता है. जहां भाव उठा, वहीं से वह सीधे ठाकुर जी तक पहुंचा. कोई बड़ा विधान नहीं, कोई कठिन साधना नहीं, बस दिल का भाव. जैसे मानो हमारे गिरधर का विवाह हो रहा हो, उस आनंद में जो भाव उमड़ता है, उसी में प्रेम छुपा है, उसी में आसक्ति छुपी है. यही भाव भगवान को सबसे ज्यादा आकर्षित करता है. इसी वजह से ऐसे भक्तों को रसिक कहा गया है, जो नियम, साधना और तप से दूर होकर केवल प्रेम में जीते हैं.'

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आगे प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि रसिक भक्ति में प्रेम हर पल नया होता है. जैसे श्यामा-श्याम का रूप हर क्षण नवीन है, वैसे ही उनका रस, उनका आनंद, उनका सौंदर्य भी नया-नया लगता है. नया श्रृंगार, नया भाव, नई मुरली, नया वृंदावन, सब कुछ ताजा. भक्त उस आनंद को देखकर बस आशीर्वाद देता है, क्योंकि हृदय आनंद से भर जाता है. श्यामा और श्याम को अलग नहीं किया जा सकता. जहां कृष्ण हैं, वहां राधा हैं. जहां राधा हैं, वहां कृष्ण हैं. ये एक-दूसरे के बिना एक पल भी नहीं रह सकते. ये दो अलग नहीं, एक ही भाव हैं. जैसे हमारी दो आंखें होते हुए भी दृष्टि एक होती है, वैसे ही श्यामा-श्याम एक हैं.

बस ठाकुर जी की करें सेवा

'सबसे बड़ी कृपा तब होती है जब हमारे हृदय में उनके सुख की चाह जागती है. अपने सुख की चाह तो लाखों भक्त करते हैं, लेकिन ठाकुर जी के सुख की चिंता करना, यह बहुत ऊंचा भाव है. आज लाल जी को क्या पहनाना है, आज कौन सा भोग अच्छा लगेगा, आज प्यारी जी को क्या भाएगा, बस यही चिंतन बना रहे. इसी भाव में सीधी सेवा मिलती है. मोक्ष, कल्याण ये सब प्रभु देते ही रहते हैं, लेकिन अपने श्रीअंग की सेवा बहुत कम को मिलती है. यह उसी को मिलती है जिसके भीतर सच्चा अपनापन होता है. ऐसा अपनापन कि जरूरत पड़े तो प्राण दे दे, क्योंकि प्रभु ही तो हमारे प्राणों के प्राण हैं.'

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'प्रभु से प्रेम हो जाना आसान नहीं है. इसी प्रेम के लिए भगवान ने अर्चा विग्रह का रूप धारण किया है, ताकि हम उन्हें देख सकें, उनसे जुड़ सकें, उनसे प्रेम कर सकें. ऐसा भाव बने कि उठते-बैठते, चलते-फिरते मन में यही चले, इस समय मेरे लाल जी क्या चाहेंगे, यह वस्तु उन्हें कैसी लगेगी. बस यही साधना है. न कोई मांग, न कोई अपेक्षा. जो प्रभु दे दें, जैसे रखें, वैसे स्वीकार. केवल भगवान की चर्चा, भगवान का गान, भगवान की प्रसन्नता, यही जीवन का लक्ष्य बन जाए. तब जीवन अपने आप प्रेममय हो जाता है. धन, वैभव, संपत्ति, इनका भगवान के सामने कोई महत्व नहीं. आज लोग अर्थ को बड़ा और कथा को छोटा मानने लगे हैं, जबकि सच्चाई इसके उलट है. भगवान की कथा प्रधान है, अर्थ गौण. जब आप भगवान के चरणों की सेवा में लगते हैं, तो वैभव अपने आप दास बनकर पीछे चलता है.'

महाराज जी आपका साथ है

इस पर कथावाचक इंद्रेश बोले कि महाराज जी, हर वर्ष हम ठाकुर जी के आगे पर्ची डालते हैं कि अगला उत्सव कहां हो. चार स्थान लिखते हैं. पिछले वर्ष नाथद्वारा आया था. इस बार मन में भाव था- गोवर्धन, वृंदावन, बरसाना या फिर कोई बाहर का स्थान. मन में यह भी आया कि अगर बरसाना की पर्ची निकली तो समझेंगे कि ठाकुर जी स्वयं आ गए. नाथद्वारा में पर्ची डाली और जो सबसे पास गिरी, वही उठाई गई और वह निकली श्री बरसाना धाम. एक बार फिर लाल जी के साथ कृपा कीजिए. आप अवश्य आएं, संघ के साथ आएं, परिवार सहित दर्शन हों. आपका स्वास्थ्य अनुकूल रहे, यही कामना है. श्री जी की कृपा निरंतर बनी हुई है, बस बनी रहे. आप सबका आशीर्वाद जीवन भर बना रहे. महाराज जी, आप असंख्य वैष्णवों और ब्रजवासियों के प्राण हैं. यदि कभी हमसे कोई अपराध हो भी गया हो तो श्री जी यही समझें कि यह बालक है, सहन नहीं कर पाएगा. ऐसी अनुकंपा करें कि आप पूर्ण स्वस्थ रहें.'

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