भगवान श्रीराम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को हुआ था. उन्हें त्रिदेवों में से एक भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है. भगवान विष्णु के नर रूप में राम अवतार का एक उद्देश्य रावण वध बताया जाता है. इसके साथ ही वह मर्यादा स्थापित करने के लिए भी जन्मे थे और मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए भी. लेकिन असल में श्रीराम का जन्म सिर्फ एक वजह से नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे कई तरह के शाप और वरदान कारण बनकर उभरे थे.
रामचरित मानस में संत गोस्वामी तुलसीदास ने इन कारणों का जिक्र संक्षेप में किया है.किसी को कोई वरदान मिला तो उसकी पूर्ति श्रीराम के जन्म से हुई और किसी को कर्मदंड से शाप मिला तो उसका उद्धार भी श्रीराम जन्म से हुआ. इसीलिए श्रीराम को तारक और पातक कहा गया है.
रामचरित मानस में देवी पार्वती को श्रीराम कथा सुनाते हुए शिवजी कहते हैं कि जब-जब नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं. वे कई तरह की अनीति करते हैं. ब्राह्मण, गो, देवता और पृथ्वी वासियों को कष्ट देते हैं, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु अलग-अलग शरीर धारण करके इस पीड़ा से मुक्त कराते हैं. सत्य को स्थापित करते हैं. वेदों की मर्यादा की रक्षा करते हैं. वह फिर कहते हैं कि राम जन्म के कई कारण हैं, और सब एक से एक विचित्र हैं. उनमें से एक-दो मैं तुम्हें सुनाता हूं.
तुलसीदास लिखते हैं.
असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु॥
सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं॥
राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका॥
जय-विजय को मिले शाप की कहानी
भगवान विष्णु के दो द्वारपाल थे. जय और विजय. उन्हें विष्णुलोक का द्वारपाल बनने का अभिमान हो गया था. एक बार सनकादिक ब्राह्मण विष्णुजी से मिलने बैकुंठ आए तो जय-विजय ने उन्हें मना कर दिया. बार-बार आग्रह-अनुरोध करने पर भी जय-विजय नहीं माने तो सनकादिक बाल ब्राह्मणों ने क्रोधित होकर उन्हें तीन जन्म के लिए राक्षस हो जाने का श्राप दे दिया.
तुलसीदास लिखते हैं...
बिप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई॥
कनककसिपु अरु हाटकलोचन। जगत बिदित सुरपति मद मोचन॥
ये दोनों पहले जन्म में हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष बने. तब भगवान ने नरसिंह और वाराह अवतार लेकर उनका उद्धार किया. अब इस जन्म में यही दोनों भाई रावण और कुंभकर्ण बनकर जन्मे हैं. भगवान विष्णु उन्हें अब दूसरे जन्म के शाप से मुक्त करने के लिए रामअवतार में आएंगे. खुद श्रीहरि ने उन्हें वरदान दिया कि मेरे ही हाथों तुम दोनों का उद्धार होगा. इसी वरदान के कारण श्रीराम का जन्म हुआ.

ऋषि-कश्यप और अदिति को दिया वचन
ऋषि कश्यप और अदिति ने एक बार कठोर तप करके भगवान विष्णु को प्रसन्न कर लिया और वरदान में हर बार उन्हें ही पुत्र रूप में पाने की इच्छा प्रकट की. प्रभु ने उनको भी उनका मांगा वरदान दिया और दशरथ-कौशल्या के रूप में उन्हीं कश्यप और अदिति का अंश जन्मा है, जो कि श्रीरामजी के इस जन्म में माता-पिता हैं.
ठीक ऐसा ही वरदान प्रभु ने एक बार स्वयंभू मनु और उनकी पत्नी सती शतरूपा को भी दिया था. उन दोनों ने भी एक बार हजार वर्षों की कठिन तपस्या करके उनसे हरिविष्णु जैसा पुत्र मांगा था, तब प्रभु ने कहा था कि मेरे जैसा और कौन, मैं ही आपकी गोद में पुत्र बनकर खेलूंगा. वही मनु, रघुवंश में जन्म लेकर दशरथ हुए और शतरूपा उनकी पत्नी कौशल्या हैं.
कस्यप अदिति तहां पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता॥
एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित पवित्र किए संसारा॥
मनु-शतरूपा को वरदान
इस तरह भगवान विष्णु ने कश्यप-अदिति को वरदान दिया, मनु-शतरूपा को वरदान दिया और उनके वरदान की पूर्ति के लिए पुत्र रूप में जन्म लिया और श्रीराम के नाम से जाने गए. उनके जन्म की एक और बड़ी वजह है. ऐसा कहकर शिवजी पार्वतीजी को एक और कथा सुनाने लगे. शिवजी ने कहा, जब पृथ्वी पर बहुत तरह के अधर्म होने लगे और वह अनिति-अत्याचारों के बोझ से दबने लगी तो एक दिन उसने एक निरीह गाय का रूप धरा और छिपते-छिपाते देवताओं के लोक पहुंची.
गाय, पृथ्वी और देवताओं को भगवान का वचन और वरदान
शिवजी कहते हैं कि देवताओं के पास रोकर उसने अपना दुख कहा, लेकिन देवता खुद निरीह थे. इसलिए सब मिलकर ब्रह्म देव के पास गए, लेकिन ब्रह्म देव भी कुछ नहीं कर सकते थे, क्योंकि उन्होंने ही रावण को ऐसा भीषण वरदान दिया था ताकि देवता उसका कुछ न बिगाड़ पाएं. तब सभी मिलकर भगवान विष्णु के पास क्षीरसागर गए और कई तरह से उनकी वंदना की. पृथ्वी ने करुण पुकार की. तब श्रीहरि ने आंखें खोलीं और उन्होंने सबकी बात सुनीं. फिर उन्होंने सभी की रक्षा के लिए अपना प्रण दुहराया और कहा कि, आप सभी की रक्षा के लिए मैं मनुष्य रूप में जन्म लूंगा.
रावण को ब्रह्माजी का वरदान
रावण ने ऐसा ही वरदान ब्रह्मा जी से मांगा है. कश्यप-अदिति को जो मैंने उनके पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया था, उसे भी पूरा करना है. वे दशरथ-कौशल्या हैं, उनके ही घर जन्म लूंगा. नारद मुनि के वचन को भी सत्य करना है. इसलिए मैं नर अवतार लेने जा रहा हूं. इसतरह शिवजी ने पार्वती जी को उन सभी वरदानों की कथा सुनाई, जिनके कारण श्रीरामजी का जन्म हुआ. अलग-अलग समय पर अलग-अलग लोगों को दिए वरदान ही श्रीहरि के राम अवतार का कारण बने.
देवर्षि नारद का शाप
एक बार देवर्षि नारद को भ्रम हो गया था. वह विवाह करना चाहते थे. इसके लिए वह भगवान विष्णु से उनका रूप मांगने गए. भगवान विष्णु उनके साथ लीला कर रहे थे. देवर्षि नारद ने उनसे हरिमुख मांगा तो भगवान विष्णु ने उन्हें वानर का मुख दे दिया. जब नारद मुनि स्वयंवर पहुंचे तो वहां उनका मजाक उड़ा. इन मजाक उड़ाने वालों में दो शिवगण भी थे. नारद मुनि ने उन्हें बंदर हो जाने का शाप दिया.
भगवान विष्णु को उन्होंने मनुष्य रूप में जन्म लेने का शाप दिया और कहा कि तब आप अपनी पत्नी के लिए वन-वन भटकोगे और यही वानर मुख आपकी सहायता करेगा. देवर्षि नारद की बात को सच साबित करने के लिए भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया था.