घर पर आजादी का जश्न मनाते हुए आपने जब-जब रसोई में किसी को आवाज दी होगी, बहुत मुमकिन है कि वह एक औरत ही रही होगी. हां, कुछ मामले अलग हो सकते हैं, लेकिन बहुसंख्यक घरों की सच्चाई यही है.
अब आप कहेंगे कि खाना बनाना क्या गुलाम होना है? आखिर औरत आजादी के नाम पर चाहती क्या है? इस सवाल का जवाब कागजों या मंचों से नहीं मिलेगा. इसका जवाब तो हर दिल में वैसे ही मौजूद है, जैसे किसी बड़ी महफिल में औरत का वजूद.
देश आजाद हुआ, लेकिन क्या औरत भी पूरी तरह आजाद हुई?
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ. उस आजादी का कोई जेंडर नहीं था. लेकिन आजादी के 79 साल बाद भी एक सवाल हर किसी से है कि अगर औरत आजाद है तो घर से दफ्तर और सड़क तक उसे हर वक्त पहरेदारी में क्यों रहना पड़ता है?
क्यों वह रात के दो बजे बेफिक्र होकर बाइक उठाकर किसी दोस्त के घर नहीं जा सकती? क्यों वह रात में सड़कों पर अकेले नहीं चल सकती? क्यों हर कदम पर उसके साथ एक अनकही 'असुरक्षा' चलती है?
जो लोग इस असुरक्षा को महसूस करते हैं, वही समझ सकते हैं कि औरत की आजादी कई बार वक्त और हालात पर निर्भर क्यों हो जाती है. उसे परिवार कैसा मिला, ससुराल कैसा मिला, काम की जगह कैसी मिली, उसे कैसी औलाद मिली—कई बार उसकी जिंदगी की आजादी इन तमाम सवालों के जवाब पर निर्भर करती है.
आजादी से पहले की औरत सिर्फ घूंघट में नहीं थी
एक औरत के तौर पर मेरी नाराजगी इस बात से है कि हम अक्सर इतिहास को बहुत सुविधाजनक आख्यान में लपेटकर पेश करते हैं. ऐसा दिखाया जाता है जैसे आजादी से पहले भारतीय औरत घूंघट में कैद थी और आजादी के बाद उसे अचानक पंख मिल गए.
असल में यह इतिहास को देखने का बेहद अधूरा नजरिया है.
अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीय स्त्री केवल पीड़ित नहीं थी. वह सत्ता और औपनिवेशिक सोच को चुनौती भी दे रही थी. राजनीति से लेकर समाज सुधार और क्रांतिकारी आंदोलन तक, महिलाओं ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई.
जब महिलाओं ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि ब्रिटिश भारत में महिलाओं को मताधिकार एक झटके में या सार्वभौमिक रूप से नहीं मिला था. 1920 के दशक में कुछ प्रेसीडेंसी में महिलाओं को सीमित मताधिकार दिया गया था. चुनावी अधिकार उस समय संपत्ति और दूसरी योग्यताओं से जुड़े हुए थे. यानी यह आज के सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार जैसा अधिकार नहीं था.
फिर भी यह भारतीय महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था.
सरोजिनी नायडू से लेकर विजयलक्ष्मी पंडित तक, महिलाएं राजनीति के गलियारों में अपनी आवाज बुलंद कर रही थीं. और क्रांतिकारी आंदोलन में भी महिलाओं ने सिर्फ पर्दे के पीछे रहकर मदद नहीं की, बल्कि हथियार उठाकर भी अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी.
21 साल की प्रीतिलता वाद्देदार इसका बड़ा उदाहरण हैं. 24 सितंबर 1932 को उन्होंने चटगांव के पहाड़तली यूरोपियन क्लब पर क्रांतिकारियों के हमले का नेतृत्व किया. ब्रिटिश सत्ता के प्रतीक माने जाने वाले इस क्लब पर हमले के बाद घायल प्रीतिलता ने गिरफ्तारी से बचने के लिए सायनाइड खा लिया. भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल के मुताबिक, उस समय उनकी उम्र सिर्फ 21 साल थी.
पंडिता रमाबाई जैसी महिलाएं भी अपने समय की सामाजिक रूढ़ियों से लड़ रही थीं. शिक्षा, लेखन और महिला अधिकारों की लड़ाई में उनका योगदान भारतीय समाज में बदलाव की एक बड़ी कहानी है. यानी यह दावा करना कि आजादी ने स्त्री को सब कुछ दे दिया, इतिहास के साथ भी नाइंसाफी है और वर्तमान के साथ भी.
देश को आजादी मिली, स्त्री की लड़ाई आज भी जारी है
सच यही है कि देश को आजादी मिल गई, लेकिन स्त्री के हिस्से की आजादी की लड़ाई आज भी जारी है. बदलते वक्त ने औरतों की जगह जरूर बदली है, लेकिन समाज ने उसे वह सम्मान अब भी पूरी तरह नहीं दिया, जिसकी वह हकदार है.
हमारा सिनेमा भी हमारी सोच का आईना रहा है. सालों तक हमने पर्दे पर नायिका के नाम पर 'पति परमेश्वर' के चरणों में आंसू बहाती, अपनी खुशियों की बलि देती औरत को देखा. फिर समय बदला. हमने कहा कि अब सिनेमा बदल गया है. अब 'पिंक', 'थप्पड़' और 'क्वीन' की नायिकाएं अपनी शर्तों पर जीती हैं.
लेकिन जरा ठहरकर सोचिए, क्या वाकई सब कुछ बदल गया है?
पर्दे पर स्त्री भले ही 'बोल्ड' हो गई हो, लेकिन असली दुनिया में उसकी कीमत आज भी कई बार इस बात से तय होती है कि वह पुरुषों की बनाई मर्यादा की रेखा के कितने अंदर है.
उसे 'इज्जत' मिलने का पैमाना भी अक्सर इसी बात पर निर्भर करता है कि वह समाज की बनाई 'अच्छी औरत' की छवि में कितनी खरी उतरती है.
'आजाद औरत' के नाम पर उसे क्या मिला?
अक्सर औरत की आजादी को उसके वर्किंग होने या करियर ओरिएंटेड होने से जोड़कर देखा जाता है. सच्चाई यह है कि इस आजादी ने औरत को घर से बाहर निकलने की छूट तो दी, लेकिन पितृसत्ता की सोच को उतनी तेजी से नहीं बदला.
घर के काम और देखभाल की जिम्मेदारी आज भी महिलाओं के हिस्से में disproportionately ज्यादा है. यही वजह है कि आज की पढ़ी-लिखी, कमाऊ औरत पर ऑफिस की नौकरी का तनाव भी है और घर लौटकर 'अच्छी बहू, सर्वगुण संपन्न पत्नी और समर्पित मां' बनने का दबाव भी.
समाज ने उसे 'सुपरवुमन' का झुनझुना थमा दिया, ताकि वह अपनी थकान पर उफ तक न करे.
अगर वह बोलना भी चाहे तो कई बार उसे यह सुनने को मिलता है कि 'हमारी मां तो नौकरी भी करती थीं और घर भी संभालती थीं, तुम क्यों नहीं कर सकतीं?' अब वह दिन-रात मेहनत करके दोहरे मोर्चे पर खुद को साबित करते-करते अंदर से टूटती रहे और हम उसकी इस थकान को 'आजाद' और 'इंडिपेंडेंट' औरत का तमगा देकर जश्न मना लें.
उसे संरक्षण नहीं, बराबरी चाहिए
आजादी मिले सात दशक से ज्यादा का वक्त बीत चुका है. अब हमें यह समझना होगा कि स्त्री को पुरुषों के दिए गए 'संरक्षण' या दया की भीख नहीं चाहिए.
वह किसी की 'मां', 'बेटी' या 'पत्नी' होने से पहले एक स्वतंत्र इंसान और नागरिक है.
उसे पैदा होने का अधिकार चाहिए. उसे सुरक्षित बचपन चाहिए. उसे घर और बाहर सुरक्षा चाहिए. उसे काम करने का अधिकार चाहिए. उसे बराबर वेतन और आगे बढ़ने के बराबर मौके चाहिए. और उसे नेतृत्व की कुर्सी तक पहुंचने के लिए किसी की मेहरबानी नहीं, बराबरी का मौका चाहिए.
यह बदलाव किसी के अहसान से नहीं आएगा. इसके लिए सरकार की नीतियां भी बदलनी होंगी और समाज की नीयत भी.
राजनीति में भी बराबरी अभी अधूरी है
स्त्रियों को राजनीति में आज भी वह प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है, जिसकी वे हकदार हैं. भारत को अब तक सिर्फ एक महिला प्रधानमंत्री मिली हैं, इंदिरा गांधी. वह जनवरी 1966 में पहली बार प्रधानमंत्री बनीं और 1977 तक इस पद पर रहीं. बाद में जनवरी 1980 से अक्टूबर 1984 तक उन्होंने फिर प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व किया. यह तथ्य अपने आप में बताता है कि देश की सर्वोच्च राजनीतिक कुर्सी तक महिलाओं की पहुंच कितनी सीमित रही है.
इस 15 अगस्त एक सवाल खुद से भी पूछिए. आज जब हम आजादी का जश्न मना रहे हैं, तिरंगा फहरा रहे हैं और देश की तरक्की पर गर्व कर रहे हैं, तब एक सवाल और पूछना चाहिए. क्या इस देश की आधी आबादी भी उतनी ही बेफिक्र होकर आजाद है? क्या एक लड़की रात में सड़क पर चलते हुए सिर्फ सड़क के बारे में सोच सकती है, अपनी सुरक्षा के बारे में नहीं?
क्या एक पत्नी घर लौटकर सिर्फ आराम कर सकती है, बिना यह सोचे कि घर के काम उसका इंतजार कर रहे हैं? क्या एक मां अपने करियर को लेकर उतनी ही निश्चिंत हो सकती है, जितना समाज एक पिता से होने की उम्मीद करता है? और क्या एक महिला को अपनी जिंदगी के फैसले लेने के लिए हर बार किसी पुरुष की स्वीकृति की जरूरत नहीं होनी चाहिए?
आजादी का मतलब सिर्फ देश की सीमाओं से विदेशी सत्ता को बाहर करना नहीं है. आजादी का मतलब यह भी है कि किसी लड़की की जिंदगी उसकी रात की घड़ी देखकर तय न हो. किसी पत्नी की पहचान उसके पति से तय न हो. किसी मां की कीमत उसकी कुर्बानियों से तय न हो.
इस 15 अगस्त अगर हम सच में आजादी का जश्न मनाना चाहते हैं, तो हमें उस औरत की आजादी की लड़ाई में उसका साथ देना होगा, जो आज भी घर, दफ्तर, सड़क और समाज हर जगह अपने हिस्से की जगह के लिए लड़ रही है. क्योंकि देश की आजादी पूरी तभी होगी, जब उसकी औरत को भी अपनी जिंदगी जीने की आजादी पूरी मिलेगी.