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भत्ता दीदी से और वोट फूलछाप

कोई नहीं पूछता कि दूसरी साइड लगातार इतनी अनप्रिपेयर्ड और बिखरी हुई क्यों रहती है. विपक्ष से सवाल करना तो गोदी वाली बात होगी. हम तो सरकार से सवाल पूछेंगे अपने ड्राइंग रूम से ही.

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बंगाल चुनाव नतीजों के बाद लोकतंत्र पर उठे सवाल. (Photo: ITG)
बंगाल चुनाव नतीजों के बाद लोकतंत्र पर उठे सवाल. (Photo: ITG)

4 मई, 2026. इस तारीख को याद रखा जाएगा दिग दिगंत. भारत में लोकतंत्र का अंत. बंगाल की जनता के हाथ खून से सने हैं. नतीजों के बाद जो हुआ, उसके लिए नहीं. वो तो बंगाल का पॉलिटिकल कल्चर है, जैसा माननीया महुआ मोइत्रा ने कहा था. हमारा प्यारा लोकतंत्र, वो अपना वाला लोकतंत्र. उसने खुद को सरेंडर कर दिया. मेरा नन्हा सा, प्यारा सा, छोटा सा दिमाग अभी भी बफरिंग कर रहा है, 4 तारीख़ के सानहे को प्रोसेस करने में. 15 साल तक दीदी के लिए धड़कने वाले दिल अचानक बदल गए. बंगाल के अच्छे लोग, भद्रलोक कहे जाने वाले लोग, फूल जैसे खुशबू वाले लोगों ने इतने सारे दिल मसल दिए.

नतीजों से पहले हम SIR पर रो सकते थे. नतीजे तो बीजेपी वालों के लिए SIR-प्राइज़ होने वाले थे. पर निकले तो हमें Bigot परिस्थिति में डाल दिया. जलपाइगुड़ी से बांकुड़ा, उठा लें कोई आंकड़ा, डेटा कहता है कि अगर सारे डिलीट हुए नामों को TMC वोटर मान भी लो, तो भी BJP जीत जाती. 49 सीटों पर जीत का मार्जिन कटे वोटों से कम है. पर वो 49 अगर TMC को दे दें, ये मानकर कि सारे उनके ही कटे, तो भी उन्हीं का कट रहा है. बीजेपी फिर भी जीत रही है. चाकू को पसलियों पर महसूस कीजिए. 

जिस पर भरोसा किया, सबने धोखा दे दिया. बेहाला के सुंदर भद्रलोक भाई-बोदी, मेदिनीपुर के मेये और छेले, मालदा-मुर्शिदाबाद के मध्य मुसलसल मुसलमान. सबने. वे लोग हुमायूं कबीर को सीट दे गए. कांग्रेस का खाता भी खोल दिया क्योंकि राहुल गांधी ने कहा था ममता को सत्ता से हटाओ. राहुल जी की बात उन्होंने सीरियसली ले ली. शब्दों को सुना, भावना नहीं समझे, नि:शब्द कर गए. राहुल जी भी अब शॉक में हैं. उन्होंने ममता दीदी को अपने एक पूरे MLA का पूरा समर्थन देने का आश्वासन दिया है.

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कोलकाता के बचे-खुचे बड़े मारवाड़ी घरानों ने भी धोखा दिया. TMC के सबसे बड़े फाइनेंसर वे ही थे पर बूथ पर मुंह नहीं दिखाया. मुख दिया मुखोपाध्याय को और बंदोपाध्याय को दसबंध. भारी-भरकम गद्दारी. भाईपो ने चेतावनी दी थी. अब भाईपो को चेतावनी मिल रही है. सब कुछ पलट गया है. पलटानो दरकार नांय.

जो महिलाएं 1500 रुपये हर महीने पल्लू में बांधती रहीं, आज एक-दूसरे पर गुलाल फेंक रही हैं, जैसे ठाकुर मा का विसर्जन का दिन हो. सिंदूर खेला हो रहा हो. खेला होबे बोला था. हमारी भावनाओं से खेलने नहीं बोला था. बाइक पर रेस कर रहे लड़कों के शोर और नजारे में डूब गया है कोलकाता और हुगली उबल रही है ताप से. 

पोस्ट-पोल वायलेंस की परंपरा का निर्वहन तो हो ही रहा है पर कट-मनी वाला पाड़ार दादा भी अब भगवा गमछा पहनकर न्यू मार्केट में बुलडोज़र चला रहा है. मार्केट पुराना है लेकिन बुलडोज़र नया है. केंद्रीय बल किधर हैं? चुनाव से पहले तो केंद्रीय बल राज्य पर ऐसे टूट पड़े थे जैसे हम युद्ध पर जा रहे हों- हमतो जा रहे थे जीतने के लिए. हमने हारने के लिए हिस्सा नहीं लिया था. लोकतंत्र का ये नाच बड़ा कुरूप है. छोटोलोकेर छऊ बोले तो. लेकिन अब हमें सोचना पड़ेगा कि हम किस तरह के लोकतंत्र को अपने देश में ला रहे हैं, जिसमें एक ही पार्टी बार-बार जीतती है. 

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दीदी ही बार-बार, चौथी बार जीते, हम तो सिर्फ इतना चाहते थे. इस बार पोलिंग ही अजीब हुई. जिन्हें बूथ तक चलकर नहीं जाना पड़ता था, वे वोट करते दिखे, गरमी में लाइन लगा के. इस बार मुर्दे वोट नहीं डाल पाए. कुछ जिंदा लोग भी SIR के कारण नहीं दे सके. फिर भी पोलिंग प्रतिशत छत फोड़कर चला गया और इस कालबैशाखी ने हमारे आखिरी ढांचे को, हमारे विश्वास को जमींदोज़ कर दिया.

अजेय दीदी भबानीपुर में सुवेंदु अधिकारी से हार गईं. दीदी हार ही नहीं सकती थीं. लेकिन दीदी गईं. उसी आदमी से जो पिछली बार नंदीग्राम में दीदी को हरा चुका था. किस मिल का भात खाता है ये आदमी? जो भी हो, इसको आलू के भाव मिल गई जीत.

कुछ लोग कह रहे हैं लोगों को बदलाव का चाव था. इस बार बदलाव के लिए उन्हें विकल्प दिखा. पिछली बार BJP विकल्प नहीं थी. फिर पांच साल में ऐसा क्या बदला? इसका मतलब साफ है- अगर तुम सिंगुलर फोकस के साथ मेहनत करके सत्ता छीनने निकलो, तो छीन सकते हो. अगर लोकतंत्र एक नेशनल पार्टी को मेहनत करने देता है कि वो एक पॉपुलर, सेकुलर, वर्नाकुलर, वेंट्रीकुलर, लेंटिकुलर और प्यारी लोकल पार्टी को कुचल दे, तो क्या ये लोकतंत्र है? और अगर लोकतंत्र लोकतंत्र भी नहीं है, तो फिर क्या है?

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ये BJP की जीत नहीं है. विवादास्पद लगेगा, लेकिन मैं आज कह दे रहा हूं: ये EC की जीत है. EC ने कहा था इस बार चुनाव पिछले चुनावों जैसे नहीं होंगे. फ्री एंड फेयर ही होंगे चाहे आसमान ज़मीन एक करना पड़े. भयमुक्त होगा चुनाव. ये तो बीजेपी का नारा था, भय बाहर. पोलिंग के बाद भी केंद्रीय बल रहेंगे, ये वादा करके EC ने लोगों को बड़े पैमाने पर वोट डालने के लिए प्रेरित किया. किसको वोट करना है, ये आपकी मर्जी. हिम्मत तो देखो. लोगों ने मनमर्जी माफ़िक़ वोट दिया और नतीज़ा सबके सामने है. गुड़ गोबर. गुड़ कितना भी हो पर है तो गोबर ही.

जो पार्टी दो अंकों को पार नहीं कर पाई, वो 200 पार कर गई. ये कैसा जादू है? बंगाल जादू-टोने के लिए मशहूर था.अब सबने ये ट्रिक सीख ली. दीदी का जादू नहीं चला. दादा का चल गया.

BJP तमिलनाडु में सिर्फ एक सीट और केरल में दो-तीन जीत पाई. तीन कोशिश में बंगाल का किला तोड़ दिया. केरल के लिए वार्निंग है. ये लोग ऐसे ही एक-दो-तीन करते हैं और चुनाव का तिया पांचा कर गुज़रते हैं. तमिलनाडु को तोड़ना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन कर्नाटक बहुत पहले तोड़ लिया है, तो हल्के में नहीं लेना चाहिए. द्रविड़ उत्कल बंग. उत्कल गया. बंग गया. द्रविड़ भी जाएगा.

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पर मुद्दा लोकतंत्र का है. तमिलनाडु में लोगों को बदलाव चाहिए था, विजय अल्टरनेटिव बनकर उभरे. तमिल नाडु ने विजय को चुन लिया. केरल में मलयाली दो टर्म के बाद लाल रंग से थक गए थे, बदलाव चाहते थे. कांग्रेस अल्टरनेटिव थी. उन्होंने कांग्रेस को चुन लिया. बंगाल में बदलाव की तड़प थी, BJP अल्टरनेटिव थी. बंगाली भी शातिर निकले. ठीक वैसे जैसे तमिल और मलयाली लोगों ने किया.

जिन बंगालियों को हम इतना प्यार करते थे, उन्हें पूरी तरह पता था कि लोकतंत्र तब तक है, जब तक BJP अल्टरनेटिव न बने. सही तरीका है नॉन-BJP अल्टरनेटिव का इंतजार करना और फिर लोकतंत्र के फल चखना. लेकिन आम बंगाली को मालदा आम पसंद है. मालदा दगाबाज है. पकने पर पीला या केसरिया नहीं होता, हरा ही रहता है. अनाड़ी आंख को पता ही नहीं चलता कि पका है या नहीं. हम समझ ही नहीं पाए कि बंगाल पक चुका था. हमारा बाग़. हमारा पेड़. हवा चली, टपक गया. अमित शाह ने लपक लिया. अब मोदी जी के हाथ में है. पता नहीं हमारे प्यारे मालदा का क्या हश्र होगा. अक्षय कुमार की वजह से हम जानते हैं मोदी जी इसे चूसते भी हैं और काटकर भी खाते हैं. भगवान न करे, उनके अंदर का गुजराती जाग जाए और मालदा का आमरस बन जाए. मां गो! पल्प फिक्शन!

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बस पल्प ही रह गया है. संकल्प चला गया, बस गल्प ही रह गया है. पहले मात्रा ठीक थी, अब अल्प ही रह गया है. चार-पांच राज्यों में गैर-गेरुआ सरकारें रह गई हैं. क्या हम इसी तरह का लोकतंत्र चाहते हैं? धीरे-धीरे एक पार्टी जीतने की कला में माहिर होती जा रही है और जीतती ही जा रही है. प्रैक्टिस से पार्टी परफेक्ट हो जा रही है. हर साल चार चुनाव खेलती है, तीन जीत ले जाती है.

सब अब क्रिकेट मैच जैसा लगने लगा है, जिसमें एक टीम आती है, बैटिंग करती है, फील्डिंग करती है, ट्रॉफी उठाती है और ढोकला जीमने घर चली जाती है. दूसरी टीम दोपहर भर ये बहस करती है कि क्रिकेट उनके लिए सही खेल है भी या नहीं. कोई नया टूर्नामेंट नहीं है. फिक्स्चर वही पुराना है. फिर भी हर सीजन नए स्वर उठते हैं: पिच की क्वालिटी, अंपायर की निष्पक्षता, गेम का फेयरनेस, सब पर सवाल होता है, कंस्टीच्यूशन क्लब में बवाल होता है.

कोई नहीं पूछता कि दूसरी साइड लगातार इतनी अनप्रिपेयर्ड और बिखरी हुई क्यों रहती है. विपक्ष से सवाल करना तो गोदी वाली बात होगी. हम तो सरकार से सवाल पूछेंगे अपने ड्राइंग रूम से ही. क्योंकि ड्रॉइंग रूम डिबेट हमेशा हम जीतते हैं. वहां ठंडक है. और ड्रिंक्स भी.

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ये BJP की कहानी नहीं है. ये विपक्ष की कहानी है. जो एक साफ सवाल उठाता है, जिसका जवाब राजनीतिक वर्ग को देने की कोई दिलचस्पी नहीं: चुनाव कराए ही क्यों जाएं? अगर मुकाबला एक संगठन से है, जो राजनीति को फुल-टाइम बिजनेस मानता है और बाकी पार्टियां एक कव्वाली पार्टी हैं, जो चुनाव को अपनी आइडेंटिटी क्राइसिस के बीच का ब्रेक मानते हैं, तो वोटर को आखिर चुनना क्या होता है?

BJP का तरीका कोई जबरदस्त नहीं है. वही घिसा-पिटा, कड़ी मेहनत और माइक्रो मैनेजमेंट. वो देखता है कौन-कौन सी जातियां खिसकाई जा सकती हैं और खिसका देता है. बस प्राइमरी लेवल का गणित. मजेदार नहीं है, रोमांचक नहीं है पर काम करता है. समस्या ये है कि हम साइंस और टक्नोलॉजी वाले लोग हैं और हम ह्यूमैनिटी के लिए लड़ते हैं, ह्यूमैनिटीज़ के लिए नहीं. अंकगणित बहुत क्रूर, बहुत अमानवीय और हमारे स्तर की चीज़ है भी नहीं.

लोग अब पूछ रहे हैं कि भारत में चुनाव का मतलब कुछ भी है क्या. BJP का शानदार प्रदर्शन लोकतंत्र के सड़ने का सबूत माना जा रहा है. सब उसको वॉकओवर दे रहे हैं. वॉकओवर एक रिजल्ट है, वर्डिक्ट नहीं. वोटर वो नहीं चुन सकता जो उसे ऑफर ही न किया जाए. एक विश्वसनीय विकल्प के लिए जरूरी है कि संगठन चुनाव में ही ना जगे, दो चुनावों के बीच भी जगा रहे, लगा रहे, क्षेत्र को प्रतिबिंबित करने वाले कैंडिडेट हों और एक मुद्दे पर अनुशासन के साथ टिके रहना भी ज़रूरी है. BJP के पास ये तीनों हैं. इधर अगुवाई करने वाली कांग्रेस अभी भी मोबिलाइजेशन के दो पल और संगठनात्मक सुस्ती के लंबे दौर के बीच झूल रही है.

चुनाव समस्या नहीं है. समस्या है तैयारी. भारत में लोकतंत्र की समस्या नहीं है. विपक्ष की समस्या है. और हमें विपक्ष से सवाल नहीं पूछने चाहिए, क्योंकि वह रोज गोदी मीडिया करता है. हमें लोकतंत्र से ही सवाल पूछने चाहिए, जो लगातार वो नतीजे दे रहा है जो हमें पसंद नहीं. लोकतंत्र, तुझे लाख लानत.

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