कहानी 20 साल के पॉल की है. जो पहले विश्वयुद्ध (1914-1918) में जर्मनी की सेना में शामिल होकर बेहद उत्साहित है. लेकिन उसके जोश का सामना जल्द ही जंग की हकीकत से होता है. युद्ध की खाइयों में बिताए गए जीवन, मौत और टूटती उम्मीदों के बीच वो कहता है, 'मैं तो अभी बीस साल का ही हूं, लेकिन जीवन को लेकर मेरे पास बस निराशा और मौत का ही अनुभव है.' कहानी पॉल की शांत मौत के साथ खत्म हो जाती है. जर्मन लेखक एरिक मारिया रेमार्क (Erich Maria Remarque) अपने उपन्यास 'ऑल क्वाइट ऑन द वेस्टर्न फ्रंट' (All Quiet on the Western Front) में कुछ इस तरह युद्ध की विभीषिका को बयां करते हैं. शायद वह ऐसा इसलिए भी कर पाए, क्योंकि खुद पहले युद्ध के वेटरन रह चुके थे.
कहानी यहीं नहीं रूकती. फिर दूसरा विश्वयुद्ध हुआ. अब हम शायद तीसरे के मुहाने पर हैं. जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया, तो ईरान ने भी जवाबी हमले शुरू किए. पलक झपकते यह युद्ध साइप्रस, लेबनान, इराक, कुवैत, जॉर्डन, बहरीन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमिरात, सीरिया, कतर और ओमान यानी 14 देशों तक फैल गया. ईरान ने इन सभी खाड़ी देशों में अमेरिका के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया. हर साल प्रकाशित होने वाले ग्लोबल पीस इंडेक्स की रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया में इस समय 56 सक्रिय संघर्ष चल रहे हैं. इनमें 92 देश युद्ध में शामिल हैं, जो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से सबसे अधिक संख्या है. पिछले 15 साल में यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका और एशिया में सशस्त्र संघर्ष तकरीबन दोगुने हुए हैं. सब-सहारा अफ्रीका में तो 46 में से 36 देश अपनी सीमाओं के बाहर भी संघर्ष में शामिल हैं.
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लेकिन, कहते हैं न कि हर हिंसा की कीमत होती है. निजी और आर्थिक भी. लोकल और ग्लोबल भी. मानवीय नुकसान के लिहाज़ से देखें तो संघर्षों में बढ़ोतरी के कारण 2023 में लगभग 1,62,000 लोगों की मौत हुई. 2024 में यहीं आंकड़ा करीब 2,39,000 और 2025 में 2,40,000 हो गया. आर्थिक प्रभाव के मामले में इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस बताता है कि 2023 में ही वैश्विक स्तर पर हिंसा की लागत लगभग 1,73,28,99 करोड़ रुपये रही, जो दुनिया के कुल जीडीपी का लगभग 13.5% है.
दुनिया में होने वाले युद्ध सिर्फ जान-माल का ही नुकसान नहीं करते, बल्कि पर्यावरण और जलवायु पर भी भारी गहरा असर डालते हैं. ऐसा ही कुछ इजरायल–गाजा युद्ध में भी सामने आया है. जमीन के नीचे बिछी बारूदी सुरंगें, जहरीले रसायन और नष्ट हो चुके पारिस्थितिकी तंत्र जैसे संघर्षों से होने वाली पर्यावरणीय तबाही के बारे में तो काफी जानकारी है, लेकिन युद्ध का ग्लोबल क्लाइमेट पर पड़ने वाला प्रभाव लंबे समय तक कम आंका गया.
हालिया स्टडी में यह ज़ोर दिया गया है कि जलवायु परिवर्तन को कम करने की रणनीतियां बनाते समय युद्ध और सैन्य गतिविधियों के प्रभाव को भी ध्यान में रखना जरूरी है. मसलन, इजरायल और गाजा जंग के कारण ही लगभग 3.3 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ है. ब्रिटेन के लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह 76 लाख पेट्रोल कारों के एक साल के उत्सर्जन के बराबर है. सिर्फ सक्रिय सैन्य अभियानों से ही 13 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ. यही नहीं, 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेन में युद्ध के कारण होने वाला ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन अनुमानित 230 मिलियन टन कार्बन डाई ऑक्साइड के बराबर तक पहुंच गया है.
इन सब कारणों से धरती का तापमान बढ़ा है. समुद्र का जलस्तर बढ़ा है. फिर यह आबादी को प्रभावित करता है. ऐसा हुआ भी है. ग्लेशियर पिघलने और पानी के फैलाव के कारण समुद्र का स्तर में 1880 से लेकर अभी तक 8-9 इंच की बढ़ोतरी हुई है. नए अध्ययन के अनुसार, समुद्र का स्तर तीन फीट बढ़ने पर 13.2 करोड़ अधिक लोग खतरे में हैं. युद्ध जलवायु परिवर्तन को तेजी से बढ़ाते हैं, क्योंकि वैश्विक सेनाएं कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 5.5% पैदा करती हैं. टैंक, विमान और बमबारी से भारी मात्रा में ईंधन जलता है, और निर्माणों के पुनर्निर्माण में सीमेंट-स्टील के उपयोग से बढ़ती है. युद्ध के कारण वनों का विनाश, मिट्टी का जहरीला होना और पारिस्थितिक तंत्र नष्ट होने से प्राकृतिक कार्बन सिंक खत्म हो जाते हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग को गंभीर खतरा पैदा करते हैं. यानी युद्ध का जो सीधा असर मौतों के आंकड़े के तौर पर दिखता है, वह आगे चलकर इस आंकड़े को बढ़ाता ही है.