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ऑक्सीटोसिन : ‘लव हार्मोन’ का गाय के बाद मां पर किलर इस्तेमाल

ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन तो अपने खतरे के कारण कई सालों से निगरानी में था, लेकिन कोटा में पांच प्रसूताओं की मौत ने सिस्टम पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं. ये वही ऑक्सीटोसिन है, जिसका गायों पर अमानवीय इस्तेमाल होता रहा है. ताकि वह ज्यादा से ज्यादा दूध दे सके.

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ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन प्रसूताओं के लिए जीवन बचाने वाला साधन था, कोटा में जानलेवा बन गया.
ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन प्रसूताओं के लिए जीवन बचाने वाला साधन था, कोटा में जानलेवा बन गया.

मेडिकल साइंस की भाषा में समझें तो ऑक्सीटोसिन शरीर में प्राकृतिक रूप से बनने वाला एक हॉर्मोन है. इसे 'लव हॉर्मोन' (Love Hormone) भी कहा जाता है क्योंकि यह इंसानी रिश्तों, भरोसे और भावनाओं को मजबूत करने का काम करता है. जब बात एक गर्भवती महिला की आती है, तो यह हॉर्मोन किसी 'लाइफ सेविंग ड्रग' यानी जीवन रक्षक दवा से कम नहीं होता. किसी वरदान की तरह. लेकिन, लालच और लापरवाही इसी ऑक्सीटोसिन को मवेशियों और गर्भस्थ महिलाओं के लिए मौत का सामान बना देता है. जानलेवा अभिषाप की तरह.

जब कोई महिला बच्चे को जन्म देती है, तो गर्भाशय को सिकोड़ने और प्रसव पीड़ा (Labour Pain) को बढ़ाने के लिए डॉक्टर सिंथेटिक ऑक्सीटोसिन का इंजेक्शन देते हैं. इसके दो सबसे बड़े फायदे होते हैं: पहला, यह डिलीवरी की प्रक्रिया को आसान बनाता है. दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण काम यह है कि डिलीवरी के बाद होने वाले भारी रक्तस्राव यानी पोस्ट-पार्टम हेमरेज (Postpartum Hemorrhage - PPH) को रोकता है. प्रसव के बाद अत्यधिक ब्लीडिंग के कारण दुनिया भर में हर साल हजारों महिलाओं की मौत हो जाती है, और ऑक्सीटोसिन इसी ब्लीडिंग को रोककर माताओं की जान बचाता है.

लेकिन हाल ही में राजस्थान के कोटा स्थित न्यू मेडिकल कॉलेज और जेके लोन अस्पताल (JK Lone Hospital) से जो खबर आई, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. यहां डिलीवरी और सिजेरियन ऑपरेशन के बाद पांच गर्भवती महिलाओं (प्रसूताओं) की एक के बाद एक संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. इन महिलाओं का ऑपरेशन के बाद अचानक ब्लड प्रेशर और प्लेटलेट्स काउंट गिरा, यूरीन ब्लॉकेज और किडनी फेलियर हुआ, और आखिर में जान चली गई.

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जब इस पूरे मामले की कड़ियां जोड़ी गईं और ड्रग कंट्रोल विभाग ने अस्पतालों में सप्लाई होने वाली दवाओं के सैंपल लिए, तो एक चौंकाने वाला सच सामने आया. अमृतसर की 'जैक्सन लेबोरेटरीज प्राइवेट लिमिटेड' द्वारा बनाई गई ऑक्सीटोसिन दवा 'टोसिन' (TOCIN - 5ml) का सैंपल जांच में पूरी तरह फेल हो गया. रिपोर्ट में सामने आया कि इस इंजेक्शन में 'एक्टिव फार्मास्युटिकल इनग्रेडिएंट' (Active Pharmaceutical Ingredient - API) यानी मुख्य दवा की मात्रा 'शून्य' थी!

अब जरा सोचिए, जिस मां को प्रसव के बाद ब्लीडिंग रोकने के लिए जीवन रक्षक दवा दी जा रही थी, वह असल में सिर्फ पानी या एक खाली घोल था. एक्सपर्ट्स का कहना है कि दवा में उसका सबसे जरूरी साल्ट (API) न होने से सीधे जहर जैसा असर तो नहीं होता, लेकिन जब एक तड़पती हुई मां को सही समय पर ब्लीडिंग रोकने वाली असली दवा नहीं मिलेगी, तो उसका बचना नामुमकिन हो जाएगा. सिस्टम की इसी लापरवाही ने जीवन रक्षक दवा को 'साइलेंट किलर' बना दिया. आनन-फानन में राजस्थान के ड्रग कंट्रोलर अजय पाठक ने इस दवा की बिक्री और इस्तेमाल पर पूरे राज्य में बैन लगा दिया और करीब 3500 वायल जब्त कर लिए. लेकिन जो पांच बेशकीमती जानें चली गईं, उनकी भरपाई कौन करेगा?

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गाय-भैंसों का दूध उत्पादन बढ़ाने वाली अमानवीयता

ऑक्सीटोसिन से जुड़ा यह कोई पहला काला कारनामा नहीं है. इस दवा के काले बाजार की जड़ें भारत के डेयरी सेक्टर (Dairy Sector) में बहुत गहरी हैं. इंसानों की जान बचाने के लिए बनी इस दवा को इंसानी लालच ने बेजुबान जानवरों के लिए एक अमानवीय अभिशाप बना दिया है.

भारत के गांवों और शहरों की अवैध डेरियों में गाय और भैंसों से जबरन ज्यादा से ज्यादा दूध निकालने के लिए ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है. दुधारू पशुओं के शरीर में जैसे ही यह इंजेक्शन लगाया जाता है, उनके गर्भाशय और दूध ग्रंथियों में तेज संकुचन (Contractions) होने लगता है. दर्द से छटपटाता हुआ जानवर तुरंत अपना पूरा दूध छोड़ देता. डेयरी मालिक इस दर्द को 'मुनाफा' समझते हैं, लेकिन यह सीधे-सीधे क्रूरता की पराकाष्ठा है.

लगातार ऑक्सीटोसिन दिए जाने के कारण इन बेजुबान पशुओं की प्रजनन क्षमता खत्म हो जाती है, वे समय से पहले बूढ़े और बीमार हो जाते हैं, और असहनीय दर्द झेलते हुए दम तोड़ देते हैं. सबसे खतरनाक बात यह है कि इस इंजेक्शन के अंश दूध के जरिए इंसानों, खासकर छोटे बच्चों के पेट में पहुंचते हैं. जब बच्चे ऐसा दूध पीते हैं, तो उनके शरीर का हॉर्मोनल संतुलन बिगड़ जाता है. कम उम्र में ही बच्चों का वयस्क हो जाना (Premature Puberty), लड़कियों में पीरियड्स का जल्दी शुरू होना और पुरुषों में गायनेकोमास्टिया जैसी बीमारियां इसी जहरीले लालच का नतीजा हैं.

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सब्जी की पैदावार बढ़ाने को लेकर दुरुपयोग

अगर आपको लगता है कि ऑक्सीटोसिन का खेल सिर्फ दूध तक सीमित है, तो आप गलत हैं. हमारे खाने की थाली में सजने वाली हरी सब्जियां भी इस हॉर्मोन के ओवरडोज (Overdose) से अछूती नहीं हैं.

सब्जी मंडी के बड़े व्यापारियों और किसानों को जब रातों-रात अपनी फसलों को बड़ा करना होता है, तो वे ऑक्सीटोसिन का सहारा लेते हैं. कद्दू, लौकी, तरोई, खीरा और तरबूज जैसी सब्जियों और फलों में रात के समय ऑक्सीटोसिन का इंजेक्शन ठोक दिया जाता है. यह हॉर्मोन पौधों की कोशिकाओं को इतनी तेजी से फैलाता है कि जो लौकी शाम को एक छोटी उंगली के बराबर थी, वह अगली सुबह तक दो फीट लंबी और चमकदार हो जाती है.

दिखने में ये सब्जियां बहुत ताजी और हरी-भरी लगती हैं, लेकिन अंदर से ये खोखली और कैमिकल से भरी होती हैं. जब हम और आप इस तरह की सब्जियों का लगातार सेवन करते हैं, तो हमारे पेट में अल्सर, लिवर की बीमारियां, आंखों की रोशनी कमजोर होना और यहां तक कि कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. मुनाफाखोरी के चक्कर में खेतों को 'क्लिनिकल लैब' बना दिया गया है.

क्या-क्या जतन किए गए ऑक्सीटोसिन पर लगाम कसने के लिए

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ऐसा नहीं है कि हमारी सोई हुई व्यवस्था को इस खतरे का अंदाजा नहीं था. पिछले एक दशक में ऑक्सीटोसिन के दुरुपयोग को रोकने के लिए कागजी तौर पर कई बड़े जतन किए गए: 

साल 2014 की पाबंदी: केंद्र सरकार ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स (Drugs and Cosmetics Rules) में संशोधन करके इसके खुले बाजार में बिकने पर रोक लगाई थी.

2018 का पूर्ण प्रतिबंध (Complete Ban): अप्रैल 2018 में भारत सरकार ने घरेलू उपयोग के लिए निजी कंपनियों द्वारा ऑक्सीटोसिन के निर्माण और वितरण पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया. सरकार ने तय किया कि केवल सरकारी कंपनी 'कर्नाटक एंटीबायोटिक्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड' (KAPL) ही इसका निर्माण करेगी ताकि इसकी सीमित और ट्रैक की गई सप्लाई हो सके.

अदालती दखल: जब इस बैन को कोर्ट में चुनौती दी गई, तो मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. दिल्ली हाई कोर्ट ने भी हाल ही में दिल्ली की अनधिकृत डेरियों (जैसे गाजीपुर और भलस्वा डेयरी) में ऑक्सीटोसिन के धड़ल्ले से हो रहे इस्तेमाल पर सख्त रुख अपनाया. कोर्ट ने इसे 'पशु क्रूरता' (Animal Cruelty) माना और ड्रग कंट्रोल विभाग को हर हफ्ते औचक निरीक्षण (Weekly Inspection) करने तथा पुलिस को FIR दर्ज करने के आदेश दिए.

कानून की किताबों में प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट, 1960 (Prevention of Cruelty to Animals Act) और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत इसके अवैध इस्तेमाल को संज्ञेय अपराध बनाया गया है. लेकिन धरातल पर क्या बदला?

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लच और खानापूर्ति वाली निगरानी ऑक्सीटोसिन सेल के आगे फेल

कागज पर बने कड़े नियम और कोर्ट के कड़े आदेश ग्राउंड रियलिटी (Ground Reality) के आगे घुटने टेक देते हैं. सच तो यह है कि आज भी किसी भी राज्य की सब्जी मंडी या डेयरी कॉलोनी के पीछे चले जाइए, आपको ऑक्सीटोसिन की खाली शीशियां कचरे के ढेर में पड़ी मिल जाएंगी. बैन के बावजूद देश के कोने-कोने में नकली, अवैध और सब-स्टैंडर्ड ऑक्सीटोसिन की मैन्युफैक्चरिंग और तस्करी धड़ल्ले से चल रही है.

निगरानी करने वाली एजेंसियां (Drug Control Departments) सिर्फ तब जागती हैं जब कोटा जैसी कोई बड़ी त्रासदी हो जाती है या कोर्ट से कोई फटकार लगती. कुछ दिनों तक छापेमारी की 'खानापूर्ति' होती है, अखबारों में सुर्खियां छपती हैं, और फिर जैसे ही मामला ठंडा पड़ता है, भ्रष्टाचार का पुराना खेल दोबारा शुरू हो जाता है. दवा कंपनियों, सप्लायर्स और भ्रष्ट अधिकारियों का नेक्सस (Nexus) पीढ़ियों के स्वास्थ्य को दांव पर लगा रहा है.

कोटा के सरकारी अस्पताल में जैक्सन लेबोरेटरीज की बिना एपीआई (API) वाली दवा का पहुंच जाना इस बात का जिंदा सुबूत है कि हमारे प्रोक्योरमेंट सिस्टम (Procurement System) और सरकारी क्वालिटी चेक की दीवारें कितनी खोखली हैं.

क्या हम सब एक क्लिनिकल ट्रायल पर हैं?

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करीब सात महीने पहले देश ने बच्चों के कफ सीरप (जैसे कोल्ड्रिफ और अन्य ब्रांड्स) में खतरनाक कैमिकल कंपोजिशन (जैसे डायथिलीन ग्लाइकोल) का नतीजा भुगता था. जिसमें देश-विदेश में कई मासूम बच्चों की जान चली गई थी. तब भी बड़ी-बड़ी बातें हुई थीं, कड़े एक्शन का दावा किया गया था. लेकिन आज जानलेवा हुए ऑक्सीटोसिन ने एक बार फिर वही सवाल हमारे मुंह पर दे मारा है- क्या भारत में इंसानी जान की कोई कीमत है या नहीं?

हम बड़े गर्व से खुद को 'दुनिया की सबसे बड़ी फार्मेसी' (Pharmacy of the world) कहते हैं, जो दुनिया भर को सस्ती दवाएं बांटती है. लेकिन इस चमकते हुए तमगे के पीछे का अंधेरा यह है कि हमारे अपने ही देश के नागरिक, हमारी माताएं और बच्चे घटिया और नकली दवाओं के शिकार हो रहे हैं. ऐसा लगता है कि हम सब एक अनंत 'क्लिनिकल ट्रायल' का हिस्सा बना दिए गए हैं, जहां नकली दवाओं और भ्रष्ट सिस्टम के बीच जो बच गए, वो भाग्यशाली हैं. और जो हार गए, उनके हिस्से सिर्फ 'निल बटे मौत का सन्नाटा' आता है.

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