महाराष्ट्र में हुए नगर निगम चुनावों के नतीजों में कोई चौंकाने वाली बात सामने नहीं आई है. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने शनिवार को जिन 29 नगर निगमों में चुनाव हुए, उनमें से अधिकतर में बड़ी जीत दर्ज की है. इसके साथ ही महायुति ने गांव स्तर की पंचायतों से लेकर बड़े शहरी नगर निगमों तक राज्य की लगभग पूरी शासन व्यवस्था पर फिर से नियंत्रण हासिल कर लिया है.
अगर विपक्ष समय रहते अपनी रणनीति में समझदारी से बदलाव नहीं करता है, तो इस महीने के अंत में होने वाले जिला परिषद चुनावों में भी उसकी हार हो सकती है. यह स्थिति 2024 के लोकसभा चुनावों में लगे बड़े झटके के महज 20 महीने के भीतर बनी है, जब महा विकास आघाड़ी को 48 में से सिर्फ 17 सीटों पर सिमटना पड़ा था.
महायुति की जीत इतनी बड़ी है कि आने वाले लंबे समय तक बीजेपी को विपक्ष से किसी बड़े राजनीतिक खतरे की आशंका नहीं दिखती. आंकड़े बताते हैं कि महायुति ने 29 में से 25 नगर निगमों में जीत दर्ज की, यानी करीब 80 प्रतिशत. हालांकि कुल 2,869 सीटों में से गठबंधन को लगभग 1,800 से कुछ अधिक सीटें मिलीं, जो करीब 65 प्रतिशत बैठता है. अगर यह आंकड़ा पांच प्रतिशत और इधर-उधर हो जाता, तो विपक्ष का प्रदर्शन थोड़ा सम्मानजनक नजर आता.
बीजेपी बनी सबसे बड़ी पार्टी
2017 में महायुति के पास सिर्फ 15 नगर निगम थे, जबकि इस बार बीजेपी ने अकेले दम पर कम से कम सात नगर निगमों में बहुमत हासिल किया है. इनमें नागपुर, पुणे, पिंपरी-चिंचवड, नासिक, नवी मुंबई, पनवेल और धुले शामिल हैं. बीजेपी ने पूरे राज्य में 1,425 सीटें जीतीं, लेकिन इसके बावजूद उसका वोट शेयर अब भी 30 प्रतिशत के आंकड़े को पार नहीं कर पाया. अनुमान है कि इस बार भी बीजेपी को करीब 28 प्रतिशत वोट मिले. कुल मतदान प्रतिशत भी करीब 46 से 50 प्रतिशत के बीच रहा, ऐसे में पार्टी की ओर से जनता के व्यापक समर्थन के दावे कुछ बढ़ा-चढ़ाकर कहे गए लगते हैं. शिवसेना के करीब 14 प्रतिशत वोट जोड़ने पर भी महायुति कुल मिलाकर 50 प्रतिशत से लगभग आठ प्रतिशत नीचे ही रही.
इसके बावजूद बीजेपी के कम से कम 20 नगर निगमों में महापौर बनने की संभावना है, जिनमें बृहन्मुंबई महानगरपालिका भी शामिल है. बीएमसी देश का सबसे अमीर नगर निकाय है, जिसका बजट करीब 75 हजार करोड़ रुपये है, जो बाकी सभी नगर निगमों के कुल बजट से भी ज्यादा है. बीजेपी लंबे समय से इसे हर हाल में जीतना चाहती थी और आखिरकार इसमें सफलता मिली.
हालांकि चुनाव के दौरान धनबल और बाहुबल के इस्तेमाल, बिना मुकाबले 66 सीटें जीतने और स्याही से जुड़ी गड़बड़ियों जैसे कई आरोप लगे, फिर भी बीजेपी अपने रास्ते से नहीं डगमगाई. पार्टी के पुराने समर्थकों में नाराजगी और बाहरी चेहरों को टिकट देने को लेकर असंतोष भी नतीजों पर ज्यादा असर नहीं डाल सका. पुणे, पिंपरी-चिंचवड और नवी मुंबई जैसे शहरों में महायुति के घटक दलों के बीच आपसी आरोप-प्रत्यारोप भी बीजेपी की जीत में बाधा नहीं बने.
ठाकरे बंधुओं के साथ आने से भी नहीं बनी बात
ठाकरे बंधुओं का साथ आना भी कोई खास असर नहीं दिखा सका. करीब दो दशक बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक मंच पर आए और ठाकरे ब्रांड को फिर से खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन बीजेपी ने शिवसेना यूबीटी को सिर्फ 65 और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को आठ सीटों पर सीमित कर दिया. बीजेपी ने जानबूझकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को प्रचार से दूर रखा, ताकि मराठी मानुष के मुद्दे पर ठाकरे बंधुओं को अतिरिक्त फायदा न मिले.
मुंबई में उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने शिंदे गुट से बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन 2017 की तुलना में उसकी सीटें 19 घट गईं. मराठी मानुष का मुद्दा मराठी मतदाताओं को पूरी तरह साध नहीं पाया, हालांकि गैर मराठी वोटरों का झुकाव पहले से ही बीजेपी की ओर माना जा रहा था. ठाकरे बंधुओं की सीमित सफलता का एक कारण उनका देर से साथ आना भी माना जा रहा है.
शिंदे गुट की शिवसेना ने राज्य में 397 सीटें जीतीं. कांग्रेस को 324 सीटें मिलीं. अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को 160 सीटें मिलीं, जबकि शरद पवार की पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा और वह सिर्फ 36 सीटों पर सिमट गई.
AIMIM ने सभी को चौंकाया
इन चुनावों में एक चौंकाने वाला पहलू असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM का प्रदर्शन रहा. पार्टी ने 2017 की तुलना में अपनी सीटें 81 से बढ़ाकर 126 कर लीं. इससे कई जगहों पर बीजेपी को अप्रत्यक्ष फायदा हुआ. मुंबई में मुस्लिम बहुल इलाकों से आठ सीटें जीतकर इस पार्टी ने शिवसेना यूबीटी, कांग्रेस और शरद पवार गुट के वोट काटे. पार्टी को सबसे ज्यादा 33 सीटें छत्रपति संभाजीनगर में और 21 सीटें मालेगांव में मिलीं.
बीएमसी में बीजेपी का प्रदर्शन कुल मिलाकर शानदार रहा, लेकिन सीटों के लिहाज से बढ़त सिर्फ सात सीटों की ही रही. आठ साल के अंतराल को देखते हुए यह बढ़त बहुत बड़ी नहीं मानी जा रही. बीजेपी और शिंदे गुट मिलकर 227 सदस्यीय बीएमसी में बहुमत से सिर्फ चार सीटें ज्यादा हासिल कर पाए. इसका मतलब है कि बीजेपी को बीएमसी में सत्ता बनाए रखने के लिए उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को साथ रखना जरूरी होगा. अगर शिंदे महापौर पद को लेकर कड़ा रुख अपनाते हैं, तो बीजेपी को समझौता करना पड़ सकता है.
लातूर में कांग्रेस का सम्मानजनक प्रदर्शन
कांग्रेस ने प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी के साथ गठबंधन किया, लेकिन यह कदम देर से उठाया गया. इसके बावजूद लातूर जैसे कुछ नगर निगमों में गठबंधन ने सम्मानजनक प्रदर्शन किया. लेकिन सबसे बड़ा झटका पवार परिवार को लगा, जो तीन साल बाद फिर साथ आया था. पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ जैसे गढ़ों में उन्हें बीजेपी से करारी हार मिली.
सबसे बड़ी जीत देवेंद्र फडणवीस की
इन सबके बीच सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व को लेकर सामने आया है. उन्होंने अकेले दम पर पूरे राज्य में प्रचार किया, मीडिया और विपक्ष के सवालों का सामना किया और मोदी व शाह जैसे बड़े नेताओं के बिना ही चुनावी जीत दिलाई. नागपुर के एक स्थानीय नेता से लेकर पूरे राज्य के मजबूत नेता बनने तक का उनका सफर बेहद तेज रहा है. अब नजरें जिला परिषद चुनावों पर हैं. अगर वहां भी बीजेपी को जीत मिलती है, तो देवेंद्र फडणवीस भविष्य में पार्टी के सबसे बड़े चेहरों में गिने जा सकते हैं.