मध्यप्रदेश कांग्रेस में राज्यसभा उम्मीदवारों की लिस्ट में मीनाक्षी नटराजन का नाम सामने आना सिर्फ एक सामान्य फैसला नहीं है. यह एक बड़े जेनरेशन चेंज और कांग्रेस के काम करने के तरीके में आए यू-टर्न पर मुहर लगाता है. साफ है कि कांग्रेस अब अपने पुराने ढर्रे और कुर्ते-पायजामे वाली पारंपरिक पॉलिटिक्स से पूरी तरह छुटकारा पाना चाहती है.
एक दौर था जब कांग्रेस नेताओं के बीच आपसी खींचतान और तलवारें खिंची रहती थीं, और हर गुट दिल्ली दरबार (हाईकमान) के सामने अपनी ताकत दिखाने में जुटा रहता था. लेकिन अब यह सब बदलने जा रहा है. अब सूबे के नेता दिल्ली में बैठे अपने 'आका' खुद नहीं चुनेंगे, बल्कि हाईकमान ही सीधे तय करेगा कि जमीन पर लीडरशिप किसे सौंपनी है.
ट्रांजिशन और 'टीम राहुल'
2023 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने शिवराज सिंह चौहान की 'लाडली बहना' योजना के दम पर हारी हुई बाजी को बड़ी जीत में बदल दिया. इसके बाद बीजेपी ने बिना किसी खींचतान के सत्ता की कमान मोहन यादव को सौंप दी. उधर कांग्रेस में पुरानी बनाम नई पीढ़ी की जंग चलती रही.
लेकिन इस बार राहुल गांधी ने कड़े फैसले लेते हुए पूरी तरह से नई पीढ़ी को कमान सौंपने का मन बना लिया है. आदिवासी नेता और पूर्व डिप्टी सीएम जमुना देवी के भतीजे उमंग सिंघार को नेता प्रतिपक्ष बनाना, जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी सौंपना और अब मीनाक्षी नटराजन को राज्यसभा उम्मीदवार बनाना -ये सारे फैसले इसी रणनीति का हिस्सा हैं. ये तीनों ही नेता राहुल गांधी की खोज माने जाते हैं, जिन्हें उन्होंने खुद आगे बढ़ाया है. दिलचस्प बात यह है कि तीनों की उम्र 52 वर्ष है, और वो प्रदेश के दो 79 वर्षीय दिग्गजों दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की जगह लेने जा रही है.
मध्यप्रदेश कांग्रेस में अब पूरी तरह से 'टीम राहुल' का राज आ चुका है. कोई नेता ऐसा नहीं है, जिसके पास सोनिया गांधी का वीटो हो. लेकिन, नई पीढ़ी के लिए अगला कदम आसान नहीं है. इस पर हम आखिर में बात करेंगे.
एक समय की बात है...
एक समय था जब मध्यप्रदेश में कांग्रेस का राज अलग-अलग क्षत्रपों के भरोसे चलता था. छत्तीसगढ़ के अलग होने से पहले पूरब में विद्याचरण शुक्ला और अजीत जोगी का दबदबा था, तो छिंदवाड़ा में कमलनाथ का. बघेलखंड में अर्जुन सिंह, चंबल में माधवराव सिंधिया और पश्चिम में दिग्विजय सिंह की अपनी तूती बोलती थी. दिल्ली दरबार में इन सभी के अपने गॉडफादर थे.
इन नेताओं के बीच मुकाबला और कंपटीशन इतना कड़ा था कि जब एक नेता दूसरे के इलाके में जाता, तो शक्ति प्रदर्शन कई बार हिंसक झड़पों में बदल जाता था. मोतीलाल वोरा और सुरेश पचौरी जैसे नेता भले ही किसी एक इलाके तक सीमित नहीं थे, लेकिन दिल्ली में उनकी पैठ बहुत गहरी थी. इन आपसी लड़ाइयों के बावजूद कांग्रेस का संगठन जमीन पर इतना मजबूत था कि आरएसएस और भाजपा की पूरी ताकत लगाने के बाद भी बीजेपी हमेशा उनके सामने संघर्ष करती दिखती थी.
डाउनफॉल
नई सदी आने के साथ ही एमपी कांग्रेस का स्वरूप बदलने लगा. छत्तीसगढ़ अलग हो चुका था. कमलनाथ, अर्जुन सिंह और माधवराव सिंधिया जैसे बड़े चेहरे केंद्र की राजनीति में चले गए और राज्य की पूरी कमान दिग्विजय सिंह के हाथों में आ गई. यहीं से कांग्रेस का डाउनफॉल शुरू हुआ. साल 2003 में भयंकर एंटी-इनकंबेंसी के कारण दिग्विजय सिंह चुनाव हार गए. उमा भारती ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की. वे खुद तो ज्यादा समय सीएम की कुर्सी पर न रह पाईं, लेकिन उन्होंने बीजेपी के लिए एक ऐसी मजबूत जमीन तैयार कर दी, जिसे कांग्रेस आज तक हिला नहीं पाई है.
विधानसभा चुनाव हारने के बाद दिग्विजय सिंह 10 साल के स्वघोषित राजनीतिक संन्यास पर चले गए. बाकी बचे नेता दिल्ली की राजनीति में बड़े मंत्रालयों का मजा लेते रहे. 2001 में पिता माधवराव सिंधिया के हेलिकॉप्टर हादसे में निधन के बाद उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जरूर ग्वालियर-चंबल से मोर्चा संभाला, लेकिन उनका फोकस भी दिल्ली पर ही रहा. राज्य में कांग्रेस की कमान अर्जुन सिंह के बेटे राहुल सिंह जैसे नेताओं के बीच उलझी रही और बीजेपी के लिए कोई बड़ा चैलेंज नहीं बन सकी.
टर्निंग पॉइंट
साल 2018-19 में इन सभी पुराने नेताओं ने मिलकर एक आखिरी कोशिश की और कांग्रेस को सूबे में एक बारीक कामयाबी (सत्ता) मिल भी गई. लेकिन पुरानी आदतें कहां जाती हैं. आपसी खींचतान और ईगो क्लैश के चलते पार्टी का यह महल ताश के पत्तों की तरह ढह गया. ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने समर्थक विधायकों के साथ बीजेपी में शामिल हो गए और कांग्रेस सरकार गिर गई.
इस 'टर्निंग पॉइंट' के बाद दिग्विजय सिंह राज्यसभा सीट लेकर दिल्ली चले गए. अकेले पड़े कमलनाथ को बीजेपी ने उनके गढ़ छिंदवाड़ा तक सीमित कर दिया. जिसे वे सुरक्षित नहीं रख पाए. बाद में हालात यहां तक बिगड़े कि कमलनाथ के बीजेपी में जाने की अफवाहें भी उड़ीं. वे बीजेपी में तो नहीं गए, लेकिन पूरी तरह से निष्क्रिय जरूर हो गए. अब दिग्विजय सिंह का राज्यसभा टिकट कटना इस बात का साफ संकेत है कि कांग्रेस के अपने इन पुराने नायकों के प्रति क्या नजरिया रखती है.
दिग्विजय सिंह को राज्यसभा का एक्सटेंशन नहीं मिला और कमलनाथ भी संसद के उच्च सदन जाने की आस लगाए बैठे रह गए. इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर से राजनीति की बुलंदियों को छूने वाले ये नेता कभी सोनिया गांधी के बेहद करीबी हुआ करते थे. लेकिन आज की तारीख में, पार्टी में बड़ा बदलाव लाने की कोशिश में जुटे राहुल गांधी के लिए ये पुराने नेता 'चले हुए कारतूस' जैसे साबित हो रहे हैं, जिनके पास न तो अब कोई नया राजनीतिक 'बारूद' बचा है और न ही वे किसी नए जातिगत समीकरण में फिट बैठ रहे हैं.
लास्ट चैलेंज
मीनाक्षी नटराजन राहुल गांधी के कोर ग्रुप का हिस्सा रही हैं, लेकिन मध्यप्रदेश की सियासत में उनकी पकड़ दिग्विजय सिंह या कमलनाथ जैसी नहीं बन पाई है. उनके नाम का ऐलान होते ही भोपाल से दिल्ली तक कांग्रेस विधायकों और क्षेत्रीय क्षत्रपों में असंतोष की खबरें आने लगी है. पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने तो सोशल मीडिया पर खुलकर इसे शीर्ष नेतृत्व की 'बड़ी भूल' करार दिया है. आंकलन किया जा रहा है कि यदि दिग्विजय सिंह को दोबारा टिकट मिलता या कमलनाथ को ही उम्मीदवारी मिल जाती तो सीट शायद सुरक्षित रहती, क्योंकि विधायकों पर उनकी व्यक्तिगत पकड़ है, जबकि नटराजन के नाम पर विधायकों में ऐसी सर्वसम्मति नहीं है.
आंकड़ों के खेल में कांग्रेस के पास अपनी सीट बचाने, यानी मीनाक्षी नटराजन को जिताने के लिए जरूरी वोटों से सिर्फ 7 वोट अतिरिक्त हैं. कांग्रेस की इसी अंदरूनी खींचतान और कमजोरी को भांपते हुए बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय ने 'तीसरा उम्मीदवार' मैदान में उतारने के संकेत दे दिए हैं. यदि बीजेपी अपनी रणनीति के तहत तीसरा प्रत्याशी खड़ा करती है, तो नाराज कांग्रेस विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग की पूरी आशंका है, जिससे कांग्रेस के हाथ से यह राज्यसभा सीट ही नहीं, बल्कि मीनाक्षी नटराजन के बहाने राहुल गांधी के मिशन को भी बड़ा झटका लगेगा.
18 जून को होने वाला राज्यसभा चुनाव दिलचस्प होगा, क्योंकि दिग्विजय सिंह और कमलनाथ जैसे नेता इतने नीरस ढंग से तो पॉलिटिकल सीन से विदाई नहीं लेंगे.