बीएमसी चुनाव के नतीजों से बहुत सी बातें साफ हो गई हैं. 20 साल में पहली बार ठाकरे परिवार का दबदबा करीब करीब खत्म हो गया है. ठाकरे परिवार में भी पूरी तरह तो राज ठाकरे का ही खत्म माना जाएगा, उद्धव ठाकरे के मामले में अभी थोड़ा बहुत तो बाकी है ही.
महाराष्ट्र की राजनीति में अगर बीएमसी चुनाव कोई पैमाना है तो उद्धव ठाकरे बीजेपी से भले ही पिछड़ गए हों, लेकिन एकनाथ शिंदे से तो आगे ही नजर आते हैं. बीएमसी चुनाव में बीजेपी को 89 सीटें मिली हैं. बीजेपी के बाद उद्धव ठाकरे की पार्टी को 65, जबकि एकनाथ शिंदे को 29 सीटें ही मिल पाई हैं. फर्क ये जरूर है कि उद्धव ठाकरे 160 सीटों पर चुनाव लड़े थे, और एकनाथ शिंदे 65 सीटों पर ही चुनाव मैदान में थे.
बीएमसी चुनाव जीतने के लिए उद्धव ठाकरे ने नया जोखिम उठाया था. जैसे 2019 में बीजेपी को छोड़कर कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिलाया था, बीएमसी चुनाव के लिए कांग्रेस को भी छोड़ दिया और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना नेता राज ठाकरे से हाथ मिला लिया. उद्धव ठाकरे को लगा था, उनके फिर से मराठी मानुष के मुद्दे पर लौटते ही सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा, लेकिन प्रोजेक्ट फेल हो गया.
महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की राजनीतिक जुगलबंदी के इर्द गिर्द हुए घटनाक्रम को गौर से देखें तो कई बातें साफ हो जाती हैं - ऐसा लगता है जैसे महाराष्ट्र की जनता ने उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के बहाने बाकी राजनीतिक दलों को भी अपना संदेश दे दिया है.
1. अब सिर्फ भाषा, क्षेत्रीयता और धर्म के नाम पर वोट नहीं मिलेगा
ये सही है कि शिवसेना की स्थापना भाषाई आधार पर हुई थी. मराठी भाषी लोगों के पक्ष में, गैर मराठी लोगों के विरोध में. गैर मराठी लोगों के खिलाफ मराठी लोगों को एकजुट करने के लिए. मराठी लोगों के हक की लड़ाई के लिए.
नए दौर में भी उद्धव ठाकरे ने राज ठाकरे के साथ मिलकर बिल्कुल वैसे ही मराठी मानुष के हक के लिए मुहिम चलाई. गैर मराठी लोगों के खिलाफ राज ठाकरे के टेरर वाले ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए उद्धव ठाकरे ने मोर्चे पर आगे कर दिया. एमएनएस बनने के बाद से ही राज ठाकरे गैर मराठी लोगों, विशेष रूप से यूपी और बिहार के लोगों के खिलाफ तीखे बयान जारी करते रहे हैं. और, फिर उनके कार्यकर्ता बाहरी लोगों पर कहर बनकर टूट पड़ते थे.
राज ठाकरे में बाल ठाकरे की छवि देखी जाती रही है. जब उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे, और राज ठाकरे मस्जिदों से लाउडस्पीकर बंद कराने का अभियान चला रहे थे, तब भी ये चर्चा जोर पकड़ रही थी. और, दोनों भाइयों के तेवर को लेकर तुलना होने लगी थी.
उद्धव ठाकरे ने राज ठाकरे को साथ लेकर मराठी मानुष और हिंदुत्व का एजेंडा बढ़ाने की कोशिश की थी, लेकिन मुंबई के लोगों पर कोई प्रभाव नहीं देखा गया.
जमाना बदल चुका है, और नए दौर में लोगों को महज इन चीजों से बरगला कर वोट नहीं हासिल किया जा सकता. लोगों को ये भी चाहिए, लेकिन सिर्फ यही नहीं चाहिए. और भी चीजें चाहिए. बुनियादी चीजों को नजरअंदाज कर सिर्फ भाषा, क्षेत्रीयता और धर्म के नाम पर वोट नहीं मिलने वाला है.
2. लोक कल्याण और विकास पर जोर देना होगा
बीएमसी चुनाव के लिए शिवसेना (यूबीटी) और एमएनएस के संयुक्त घोषणा पत्र में लोकलुभावन कई वादे किए गए थे. ‘वचन नामा, शब्द ठाकरेंचा’, ये नाम दिया गया था, जिस पर उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के साथ शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे की तस्वीर थी.
चुनाव घोषणा पत्र में मुंबई की प्रमुख सड़कों पर महिलाओं के लिए अच्छे शौचालयों का भी वादा था. शिव भोजन थाली जैसी एक योजना के तहत नाश्ता और दोपहर का भोजन 10 रुपये में उपलब्ध कराने की बात थी. और, मुंबई की जमीन का इस्तेमाल केवल मुंबईवासियों के लिए ही आवास बनाने में किए जाने जैसे वादे भी थे.
चुनावी वादों में लोक कल्याण की बातें जरूरत थीं, लेकिन ठाकरे बंधुओं का सबसे ज्यादा जोर मराठी मानुष पर नजर आ रहा था. ठाकरे बंधुओं के बयानों की आक्रामकता के शोर में लोक कल्याण वाली बातें गुम गईं - चुनाव नतीजे यही संदेश देते हैं कि कैंपेन में भी लोक कल्याण और विकास की बातों पर भी जोर देना होगा. वरना, सबका वही हाल होगा, जो ठाकरे बंधुओं का हुआ है.
3. राजनीतिक विरोध के चलते किसी को गलत ठहरा देने भर से काम नहीं चलेगा, खुद भी भरोसा देना होगा
उद्धव ठाकरे पहली बार अपने राजनीतिक विरोधी और चचेरे भाई के साथ चुनाव लड़ रहे थे. ये भी सच है कि मराठी मानुष के मुद्दे पर ही ये चुनावी युति भी बनी थी. गुस्से से तो दोनों ही भाई भरे हुए हैं, बार बार मिलने वाली असफलता ऐसे मामलों में आग में घी जैसा असर दिखाती है.
हिंदुत्व की राजनीति की लड़ाई में तो उद्धव ठाकरे पहले ही बीजेपी से पिछड़ चुके थे, मराठी मानुष के मुद्दे से काफी उम्मीदें थीं. दोनों भाइयों ने मिलकर माहौल बनाने में कोई कसर बाकी भी नहीं रखी. तमिलनाडु के बीजेपी नेता के. अन्नामलाई का ही मामला लें, तो राज ठाकरे ने खूब बुरा भला कहा. अन्नामलाई के बयान से एक शब्द पकड़ लिया गया. मुंबई की जगह बॉम्बे - और लोगों को समझाने की कोशिश हुई कि बीजेपी मुंबई का नाम बदलना चाहती है, लेकिन लोगों ने अनसुना कर दिया.
चुनाव नतीजों में संदेश तो यही है कि सिर्फ राजनीतिक विरोध के चलते किसी को गलत ठहरा देने भर से काम नहीं चलेगा, अपनी बात में भी गंभीरता दिखाना होगा. खुद आगे बढ़कर भी भरोसा दिलाना होगा.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के त्रिभाषा फार्मले वाले आदेश की वापसी करा देने के बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे आत्मविश्वास से लबालब नजर आ रहे थे, और अति आत्मविश्वास के शिकार हो गए.
4. बिहार चुनाव भी एक मिसाल है
बिहार चुनाव के काफी पहले से ही वहां जातीय राजनीति को मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही थी. आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ सरकार में रहते बिहार में कास्ट सर्वे कराने का बड़ा मकसद यही था. तेजस्वी के पिता लालू यादव हर चुनाव से पहले अगड़ा बनाम पिछड़ा की लड़ाई को मुद्दा बनाने की तमाम तरह से कोशिश करते हैं, 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले भी प्रयास हुआ ही था.
बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे को काउंटर करने के लिए राम मंदिर उद्घाटन समारोह से लेकर प्रयागराज महाकुंभ तक हर मसले पर लालू यादव और राष्ट्रीय जनता दल ने स्टैंड लिया था. प्रयागराज महाकुंभ को फालतू बताया था. लेकिन, चुनाव में हालात ऐसे बने कि M-Y फैक्टर भी फेल हो गया.
महिलाओं के खातों में कैश ट्रांसफर के आगे सारी चीजें कमजोर पड़ गईं. सरकारी नौकरियों का वादा भी बिहार में बेदम साबित हुआ. तेजस्वी यादव जैसे तैसे बिहार में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी बचा पाए - और हाल, मायावती जैसा तो नहीं, लेकिन उसी दिशा में नजर आ रहा है.
जाति को भारतीय राजनीति का अकाट्य सत्य माना जाता है, लेकिन तेजस्वी यादव को न यादव वोट बैंक बचा पाया, न ही मुस्लिम वोटर - और ध्यान से देखें तो बीएमसी चुनाव में मराठी मानुष के रूप में भी यही पैटर्न दिखाई देता है.
5. 2026 के चुनावों में भी ये पैटर्न देखने को मिल सकता है
2026 में पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु सहित पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं. हर राज्य के अलग समीकरण हैं, और तैयारियां भी उसी हिसाब से चल रही हैं. पश्चिम बंगाल की बात करें, तो ममता बनर्जी पहले से ही भाषा आंदोलन चला रही हैं. प्रवासी मजदूरों के बांग्ला बोलने के कारण बीजेपी शासित राज्यों में टार्गेट किए जाने का आरोप लगा रही हैं.
भाषा आंदोलन के साथ साथ ममता बनर्जी SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण को भी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही हैं. बिहार में तो एसआईआर का मुद्दा चला नहीं, बंगाल या दूसरे राज्यों में चलेगा या नहीं, नतीजे ही बता पाएंगे - लेकिन, ये सारी बातें तो एक जैसे ही मैसेज दे रही हैं. और, सिर्फ ठाकरे बंधुओं के लिए ही नहीं, सभी राजनीतिक दलों के लिए.