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सीएम उम्‍मीदवारी को लेकर बड़े-बड़े दावे कर रहे अरविंद केजरीवाल की काट क्या BJP को मिल गई है?

अरविंद केजरीवाल को तिहाड़ जेल से जमानत देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह का फैसला सुनाया उससे उनके फिर से सीएम बनने की राह में कुछ परेशानियां तो हैं पर ऐसा नहीं है जिसका कोई हल नहीं है.

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प्रवेश वर्मा, अरविंद केजरीवाल और संदीप दीक्षित
प्रवेश वर्मा, अरविंद केजरीवाल और संदीप दीक्षित

नई दिल्ली सीट पर चुनाव लड़ रहे आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल के फिर से सीएम बनने के दावे पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं. हालांकि ये सवाल उनके खिलाफ नई दिल्ली सीट पर चुनाव लड़ने वाले बीजेपी के उम्मीदवार प्रवेश वर्मा, और कांग्रेस उम्मीदवार संदीप दीक्षित ही कर रहे हैं. पर वर्मा और दीक्षित जो तर्क रख रहे हैं उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता है. सोमवार को वर्मा ने कहा कि अरविंद केजरीवाल एक दिन के लिए भी सीएम नहीं बन सकते हैं. वर्मा ने वही तर्क दुहराए हैं जो पिछले मंगलवार को कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने दिए थे. संदीप दीक्षित ने इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया था. उन्होंने कहा कि जैसे ही अरविंद केजरीवाल किसी प्रशासनिक फाइल को साइन करेंगे, वे जेल जाएंगे. अब सवाल उठता है कि क्या आम आदमी पार्टी के सत्ता में फिर से आने से क्या वास्तव में ऐसी स्थिति आ सकती है, जिसके चलते उन्‍हें सीएम पद से इस्‍तीफा देना पड़ा था. सुप्रीम कोर्ट की जमानत शर्तों के चलते अरविंद केजरीवाल के लिए मुख्यमंत्री के तौर पर काम करना क्या वाकई नामुमकिन है?

द‍िल्‍ली शराब घोटाले में आरोपी होने की वजह से पिछले साल तत्कालीन मुख्यमंत्री अ‍रविंद  केजरीवाल को जेल जाना पड़ा था. चार महीने बाद जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली तो उन्‍होंने सीएम पद से इस्‍तीफा दे द‍िया और आत‍िशी को मुख्‍यमंत्री पद की कमान सौंप दी. बड़ी मशक्‍कत के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्‍हें दोनों ही मामलों में अंतर‍िम जमानत दी थी. पर मुकदमा खत्‍म नहीं हुआ है. जमानत देते हुए कोर्ट ने कई ऐसी शर्तें थोप दी. ज‍िसके आधार पर अब प्रवेश वर्मा कह रहे हैं क‍ि अरविंद केजरीवाल कभी सीएम नहीं बन सकते. मीडिया से बात करते हुए वर्मा कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल के नाम के आगे 'आरोपी' भी कहा जाना चाहिये. क्‍योंकि, वे अब भी आरोपी हैं.

अरविंद केजरीवाल पर शराब घोटाले में जेल जाने के बाद से ही दबाव था कि वो त्यागपत्र दे दें. पर उन्होंने ये नहीं किया. उन्होंने कुर्सी तभी छोड़ी जब उन्हें लगा कि संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा हो सकती है. दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि अरविंद केजरीवाल कभी मुख्‍यमंत्री कार्यालय और द‍िल्‍ली सच‍िवालय नहीं जाएंगे. जब तक बहुत जरूरी न हो, अरविंद केजरीवाल द‍िल्‍ली सरकार से जुड़ी क‍िसी भी फाइल पर हस्‍ताक्षर नहीं करेंगे. वे द‍िल्‍ली शराब घोटाले से जुड़े क‍िसी भी मामले पर सार्वजन‍िक तौर पर कभी बयानबाजी नहीं करेंगे. अरविंद केजरीवाल शराब घोटाले से जुड़ी कोई भी फाइल नहीं देख पाएंगे, उससे जुड़े अफसरों से नहीं मिलेंगे. अगर इन नियमों को अरविंद केजरीवाल तोड़ते हैं, तो बड़ी बेंच को यह अध‍िकार होगा क‍ि उनकी जमानत रद्द कर दे.

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लिहाजा, अरविंद केजरीवाल ने मौका देखकर मुख्यमंत्री पद से रिजाइन कर दिया. और खुद को आम आदमी के रूप में प्रचारित करने में जुट गए. एक ओर वे खुद को पीडि़त बताते, वहीं दूसरी ओर आतिशी को अस्‍थायी मुख्‍यमंत्री. पूरी तरह प्रचार में डूबे केजरीवाल ने खुद को दिल्‍ली की जनता असली हिमायती बताते हुए एक के बाद एक चुनावी ऑफर देने शुरू कर दिये. आखिर में जब उनसे सवाल हुआ कि आम आदमी पार्टी चुनाव जीती तो कौन मुख्‍यमंत्री होगा, केजरीवाल कहते हैं कि मैं ही बनूंगा सीएम. बस यहीं से कांग्रेस और भाजपा को मौका मिल गया केजरीवाल को घेरने के लिए.

यूं तो संदीप दीक्षित और प्रवेश वर्मा दोनों ही नई दिल्‍ली सीट पर केजरीवाल के प्रतिद्वंद्वी हैं. लेकिन जब प्रवेश वर्मा केजरीवाल के सीएम बनने के दावे पर सवाल उठाते हैं तो मामला गंभीर हो जाता है. शराब घोटाले में उन पर लगे आरोप सही हैं या गलत, यह तो अदालत बाद में तय करेगी. लेकिन वह पहले यह तय कर चुकी है कि केस चलने तक केजरीवाल न तो किसी फाइल पर साइन करेंगे और न सचिवालय जाएंगे. ऐसे में चुनाव जीत जाने के बाद भी उनके लिए कुछ बदल जाने जैसा नहीं है. यदि इसकी थोड़ी भी गुंजाइश होती तो जेल से सरकार चला रहे केजरीवाल सीएम पद से इस्‍तीफा नहीं देते.

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हालांकि, केजरीवाल को सीएम पद छोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नहीं कहा था. इसलिए यदि चुनाव जीतने की अवस्‍था में यदि वे दोबारा भी सीएम पद की शपथ लेते हैं तो उन्‍हें रोका नहीं जा सकेगा. लेकिन अदालत से कोई राहत न मिलने तक वे ऐसे पहले मुख्‍यमंत्री होंगे जिनके बारे में शपथ लेने के साथ यह तय हो जाएगा कि वे रबर स्‍टांप सीएम भी नहीं रहेंगे. क्‍योंकि ऐसा करने का अधिकार उनके पास नहीं होगा. हां, वे पर्दे के पीछे से जरूर सरकार चला सकेंगे, जैसे अभी चला रहे हैं. बिना किसी औपचारिकता के.

ऐसे में असली दारोमदार है दिल्‍ली के वोटरों पर. क्‍या वे इस बात की परवाह किये बिना कि केजरीवाल सीएम बने या ना बने, वे आम आदमी पार्टी को वोट करेंगे? या फिर केजरीवाल के सीएम न बनने की हालत देख उनका मन बदल सकता है. भाजपा और कांग्रेस दोनों ही केजरीवाल को लेकर दिये गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश को जनता के बीच ले जा रहे हैं. इससे आम आदमी पार्टी को दोहरी मार लग रही है. एक तो केजरीवाल के खिलाफ शराब घोटाले में लगे आरोपों का बार-बार जिक्र हो रहा है. दूसरा केजरीवाल को सीएम का चेहरा बनाने की आप की रणनीति को आघात लग रहा है.

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